शहीद अब्दुल हमीद मंडल…नो एंट्री… कोई जान से गया, कोई जहान से गया
जबलपुर की सियासत के मैदान में एक ऐसा मंडल है, जो अब लोगों की ज़बान पर मनहूस मंडल कहलाने लगा है….शहीद अब्दुल हमीद मंडल। नाम महान शहीद का, मगर किस्मत कुछ ऐसी कि हर बार मंडल अध्यक्ष का अंजाम किसी “नो एंट्री” फिल्मी गीत जैसा ही हुआ….कोई जान से गया, कोई जहान से गया।
पहला अध्याय: मौत की एंट्री
सन 2013 में बना यह मंडल। पहला अध्यक्ष बने शब्बीर अहमद। दूसरी बार भी रिपीट शब्बीर अहमद… किस्मत ने ऐसी करवट ली कि एक सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई। मंडल अध्यक्ष की कुर्सी की पहली किस्त ही जान लेकर चली गई।
दूसरा अध्याय: संघर्ष और सज़ा
इसके बाद आए मंगन सिद्दीकी।
काम अच्छा किया। नशेबाज़ इंजेक्शन माफिया के खिलाफ आंदोलन किया, व्यापार बंद कराया। नतीजा….खंजर उनके जिस्म पर चला। लेकिन असली खंजर राजनीति ने चलाया। जब एक मस्जिद टूटने से बचाने के लिए उन्होंने आवाज़ उठाई तो भाजपा ने उन्हें ही निकाल बाहर किया। संगठन की नीतियों से टकराना भारी पड़ा। अच्छे काम की स्याही राख में बदल गई।
तीसरा अध्याय: सवालों की बौछार
अब आते हैं अकील अहमद अंसारी पर। 18 साल भाजपा के लिए पसीना बहाया। मंडल अध्यक्ष बने। लेकिन इस बार कहानी और भी अजीब थी।
न कोई जांच, न कोई सुनवाई….बस पुलिस अधीक्षक को दिए गए एक ज्ञापन के आधार पर उन्हें 24 घंटे का जवाब देने का समय मिला और तुरंत भाजपा से बाहर कर दिया गया। अध्यक्ष की कुर्सी गई, प्राथमिक सदस्यता भी गई।
अब सवाल यही उठता है….क्या भाजपा जैसे अनुशासनप्रिय संगठन में इतनी जल्दबाज़ी सही है? क्या एक ऐसे सदस्य को जिसने डेढ़ दशक संगठन को दिया, इस तरह से “नो एंट्री” दिखा देना न्याय कहलाता है?
मंडल के लिए नई नूरा कुश्ती
आज इस मंडल की राजनीति किसी अखाड़े से कम नहीं।
पूर्व जिला अध्यक्ष जी.एस. ठाकुर निष्कासित सदस्य की तारीफ़ों में कसीदे पढ़ रहे हैं ताकि उन्हें किसी तरह पार्टी में वापसी दिलाई जा सके। उनकी एक सोशल मीडिया पोस्ट हम जस की तस शेयर कर रहे है
रंग से, कार्य से, निष्ठा से, भावना से लबरेज इस राष्ट्रवादी चेहरे को पीड़ा और अपमान देकर भी “वक़्त” ने आजमाया किंतु “अडिग” मंगन सिद्दकी ने साबित किया कि बिना पद और पहचान के भी कर्तव्य पथ पर चला जा सकता है, अनुज मंगन आप अद्वितीय हो, आपके साथ होने से मुझे और सामान्य भाजपा कार्यकर्ता को शक्ति और गर्व का अहसास होता है, ईश्वर आपको नव चेतना, नव उल्लास, नवीन शक्ति का संचार करते रहने की सामर्थ्य दे, जनसेवा के माध्यम राष्ट्रसेवा का आपका व्रत सफल हो, जन्म दिवस की अनंत शुभकामनायें, स्वस्थ्य रहें, निरोगी रहें, शतायु हों,
बड़ा सवाल क्या भाजपा में अब नीति बदल रही है? क्या वह दौर लौट रहा है जब मस्जिद के लिए आवाज़ उठाना अपराध नहीं, बल्कि जिम्मेदारी माना जाएगा?
जी.एस. ठाकुर की पहल और पूर्व मंडल अध्यक्ष के पक्ष में माहौल बनने से संकेत यही मिल रहे हैं। यह मुस्लिम भाजपा नेताओं के लिए राहत का संदेश है कि अब शायद उनकी आवाज़ सुनी जा रही है।
दूसरी ओर अंजुमन स्कूल वक्फ बोर्ड से जुड़े नेताओं के नाम चर्चा में हैं। पूर्व पार्षद रिज़वान अहमद अंसारी, ओवैस अंसारी और सईद कूलर जैसे भाजपा नेता जोर लगा रहे हैं कि नया अध्यक्ष उनकी पसंद से बने।
यानी मंडल अध्यक्ष की कुर्सी अब महज़ एक राजनीतिक शतरंज की गोटी बन चुकी है।
परदे के पीछे का ज़हर
लेकिन अंदरखाने की बात अलग है।
अकील अहमद अंसारी की कुर्सी जाने का असली कारण बताया जा रहा है….पूर्व विधायक अंचल सोनकर से उनकी नज़दीकी।
भाजपा में यह नज़दीकी “जहर” साबित हुई और नए जिला अध्यक्ष ने उन्हें पलभर में बाहर का रास्ता दिखवा दिया। कोई नही इल्जाम अपने ऊपर नहीं लिया… निष्कासन भोपाल से ही करवाया ये उनकी बड़ी जीत है साथ ही यह उनकी संगठन पे पकड़ भी दिखाती है
आखिर में…
इस मंडल की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं। पहला अध्यक्ष मौत से गया, दूसरा संघर्ष में गया, तीसरे को राजनीति ने निगल लिया।
अब सबकी नज़रें नए मंडल अध्यक्ष पर टिकी हैं….कि वह किस अंजाम को पाते हैं।
क्योंकि इस मंडल की परंपरा में लिखा है….“कुछ होना है, तो कुछ अनहोनी ही होगी।” या फिर कोई किस्मत वाला अनहोनी को होनी कर दे… अनहोनी को होनी एक जगह जब मिलकर बैठे अमर.. अकबर एंथोनी…
मुहम्मद अनवार बाबू
स्थानीय संपादक, रेवांचल टाइम्स