जनसुनवाई में ललिता धुर्वे ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल, खुद आम नागरिक की तरह दिया आवेदन

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रेवांचल टाईम्स – मंडला, जिले में प्रति मंगलवार होने वाली जनसुनवाई में सैकड़ो आवेदन प्रतिवेदन आते है पर निराकरण शुन्य नजर आ रहे है और या जनसुनवाई केवल एक सरकारी कार्यवाही जैसे ही सामने आ रही है जहाँ पर अधिकारी आते है और लोगों के आवेदन लेकर उन्हें एक नजर देख कर फाइल बना कर रख दिया जाता है और वह फाइल फिर धूल खाते रहती है ये केवल एक फार्मेलिटी बन कर रह गई हैं,
वही इस मंगलवार में हुई जनसुनवाई के दौरान एक अलग ही दृश्य देखने को मिला जब मंडला जिला पंचायत सदस्य एवं सभापति सहकारिता एवं उद्योग विभाग श्रीमती ललिता धुर्वे स्वयं अपनी समस्याओं को लेकर आम नागरिक की तरह आवेदन देने पहुंचीं। उन्होंने विभागीय अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि जब एक चुनी हुई जनप्रतिनिधि के पत्रों और शिकायतों का जवाब अधिकारी नहीं देते, तो फिर आम नागरिक की सुनवाई की क्या उम्मीद की जा सकती है।

श्रीमती धुर्वे ने कहा कि वह लंबे समय से अपने विभाग से संबंधित विभिन्न विषयों पर अधिकारियों से जानकारी मांग रही हैं ताकि विभागीय कार्यों की समीक्षा की जा सके। किंतु विभाग के अधिकारी उनके पत्रों का जवाब देने से बचते हैं और केवल मौखिक रूप से भ्रमक जानकारी प्रदान करते हैं। उन्होंने बताया कि जब उनसे लिखित जवाब मांगा जाता है तो अधिकारी टालमटोल करने लगते हैं और कोई ठोस उत्तर नहीं देते।

उद्योग विभाग के अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि विभाग में पारदर्शिता का अभाव है। उद्योग विभाग के अंतर्गत आने वाली विभिन्न यूनिटों की स्थिति और कार्यों के संबंध में लगातार पत्राचार करने के बावजूद कोई ठोस जानकारी नहीं दी गई। इस रवैये से स्पष्ट है कि विभागीय अधिकारी जनप्रतिनिधियों के प्रति भी जवाबदेही महसूस नहीं कर रहे हैं।

श्रीमती धुर्वे ने यह भी बताया कि उन्होंने अल्प बचत सहकारी केंद्रीय मर्यादित बैंक में हुए बड़े वित्तीय घोटालों के संबंध में भी कई बार पत्र लिखकर ध्यान आकर्षित कराया है, किंतु अब तक किसी भी प्रकार की जांच या कार्यवाही नहीं की गई है। उन्होंने कहा कि यह अत्यंत गंभीर विषय है क्योंकि इस बैंक के अध्यक्ष स्वयं कलेक्टर होते हैं, ऐसे में जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है।

उन्होंने कहा कि अगर विभाग के प्रमुख अधिकारी और संबंधित प्रशासनिक अधिकारी अपने स्तर पर ऐसी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लेते, तो जनता का भरोसा सरकारी व्यवस्था से उठना स्वाभाविक है। एक चुनी हुई जनप्रतिनिधि होने के बावजूद यदि उन्हें आवेदन देने और जवाब के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, तो आम नागरिकों की स्थिति सहज ही समझी जा सकती है।

वही जनसुनवाई के दौरान उपस्थित नागरिकों ने भी इस मुद्दे पर सहमति जताई कि अधिकारियों की उदासीनता और जवाबदेही की कमी आज बड़ी प्रशासनिक समस्या बन चुकी है। श्रीमती धुर्वे ने प्रशासन से आग्रह किया कि विभागीय जवाबदेही सुनिश्चित की जाए और सहकारिता एवं उद्योग विभाग के अधिकारियों के कार्यों की जांच की जाए, ताकि जनता और प्रतिनिधियों दोनों का विश्वास बहाल हो सके।

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