बेटी बचाओ से शराब लाओ तक… नैनपुर से लेकर मंडला तक नशे की आग में जलता बचपन

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रेवाँचल टाईम्स – मंडला, ज़िले की तहसील नैनपुर जो की मंडला से लगा हुआ ही बसा शांत और संस्कारी कस्बा नैनपुर ….. जहाँ कभी बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ की दीवारें समाज की चेतना जगाती थीं ….. आज उसी नगर में एक दृश्य ने पूरे क्षेत्र की आत्मा हिला दी। सरकारी शराब दुकान के बाहर, स्कूल ड्रेस में दो मासूम बच्चियाँ शराब खरीदती नज़र आईं। जिसकी फ़ोटो सोशल मीडिया में जम के वायरल हो रही है और कहीं न कहीं जिला प्रशासन पुलिस प्रशासन और आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली भी स्पष्ट करती नज़र आ रहीं है की जिला प्रशासन जिम्मेदार विभाग बच्चों युवा के भविष्य में कितना ध्यान दे रहें है और आज वह कर्त्तव्य के प्रति कितने संवेदनशील हैं।
हाँ, आपने सही पढ़ा ….. सरकारी शराब दुकान में, स्कूल की ड्रेस में, नाबालिग बच्चियाँ शराब ले रही थीं!
और शायद पहले से ही नशे में थीं।

विडंबना देखिए…

यह वही ज़मीन है जहाँ पतित पावनी मां नर्मदा की बहती हैं ….. जिसे हम जीवन दायनी पवित्रता का प्रतीक मानते हैं, जिसके किनारे शराबबंदी का ऐलान तो किया गया था।
लेकिन शराबबंदी अब सिर्फ़ सरकारी फाइलों का शब्द रह गई है।
हकीकत यह है कि सरकारी ठेकेदार अब मोबाइल ठेके चला रहे हैं ….. बाइक पर बैठकर गलियों तक में शराब बेचते नज़र आ रहें हैं।
और नतीजा ये ….. अब वही शराब, नैनपुर की गलियों में, मासूम बच्चियों के हाथों में पहुँच चुकी है।

एक पत्रकार की आँखों से सच्चाई

यह दृश्य किसी गुप्त कैमरे से नहीं, बल्कि एक जागरूक पत्रकार की आँखों से देखा गया है।
शाम का वक्त था ….. बाज़ार से घर लौटते हुए जब मैंने देखा कि तीन बच्चियाँ अंग्रेजी शराब दुकान के गेट पर खड़ी हैं।
पहले सोचा, शायद किसी को बुलाने आई हों।
पर अगले ही पल ….. एक बच्ची ने कंधे से लटका बैग खोला, और उसमें शराब की बोतल रख ली।
वो दृश्य किसी दिल को चीर देने वाले हादसे से कम नहीं था।
मैं रुका, बात करने की कोशिश की।
पता चला ….. तीनों बच्चियाँ स्कूल ड्रेस में थीं, घर से निकलीं तो स्कूल के लिए थीं, पर पहुँची शराब दुकान।
गांव और स्कूल का पता मैंने जुटा लिया है ….. पर बच्चियों की सुरक्षा को देखते हुए सार्वजनिक नहीं कर रहे है ।

सिस्टम की नाकामी या समाज की सुन्नता?

जब इस पूरे मामले की जानकारी प्रशासन को देने की कोशिश की गई …..
तो एसडीएम का मोबाइल नॉट रीचेबल निकला।
थाने और विकासखंड शिक्षा अधिकारी को सूचना दी गई,
लेकिन प्रतिक्रिया वही पुरानी सरकारी भाषा में ….. और बस एक रटा रटाया जबाब
जांच की जा रही है।

कलेक्टर मंडला श्री सोमेश मिश्रा ने कहा …..
आपके द्वारा जानकारी दी गई है। एसडीएम नैनपुर को जांच के निर्देश दिए गए हैं। तीनों बच्चियों के विषय में जानकारी जुटाई जा रही है कि वे स्कूल आई भी थीं या नहीं।

लेकिन सवाल यहाँ खत्म नहीं होते…

जब शराबबंदी वाला क्षेत्र है, तो ये सरकारी ठेके खुली चुनौती के साथ शराब कैसे बेच रहे हैं? और दुकानों से गांव गांव तक किसकी इजाजत से शराब पहुंचाई जा रही है विभाग को आखिर सरकार किस बात की तनख्वाह दे रही है।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ की सरकारी मुहिम क्या अब बेटी बहकाओ, बोतल पकड़ाओ बन चुकी है? नारे कुछ और सच्चाई आज सब के सामने

आज हालत ये हो गए है कि जो बच्चों के हाथों में किताब पेन होना था वह अब ख़ुद शराब की दुकान में पहुँच शराब की बोतल थाम रहीं है थू ये है येसे जिम्मेदारों पर जो बच्चियाँ स्कूल ड्रेस में शराब की दुकान तक पहुँचीं ….. रास्ते में किसी ने रोका क्यों नहीं? आख़िर कहाँ समाज के ठेकेदार

क्या प्रशासन तब तक एक्शन में नहीं आएगा जब तक कोई हादसा न हो जाए?

समाज के आईने में झाँकिए…

कभी-कभी कोई दृश्य सिर्फ़ घटना नहीं होता, बल्कि सभ्यता का आईना बन जाता है।
आज नैनपुर में देखा गया दृश्य, इस पूरे सिस्टम के सड़ चुके हिस्से को उजागर करता है। चीख चीख कर बता रहा है कि प्रशासनिक अमला अब किसी काम का नहीं रहा जिले में माफियाराज चल रहा हैं ।
जहाँ मां नर्मदा के किनारे
शुद्धता और संस्कार का प्रतीक मानी जाती हैं,
वहीं अब वही धरती शराब की गंध से भर रही है।

सोचिए…
बेटियाँ, जिन्हें हम देवी का रूप मानते हैं,
आज सिस्टम की लापरवाही के कारण शराब की बोतलें उठा रही हैं।
क्या अब भी हम चुप रहेंगे?
या फिर सवाल उठाने की हिम्मत करेंगे …..
क्योंकि जब समाज चुप रहता है, तो अपराध नंगा नाचता है।
मुकेश श्रीवास

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