आखिर विचारधीन बंदी की मौत का जिम्मेदार कौन, जिला जेल प्रबंधन या जिला अस्पताल प्रबंधन जाँच होगी या फिर फाइल तक ही सीमित रह जाऐगी।

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रेवांचल टाइम्स – मंडला, जिला जेल मंडला में यह मौत या बन्दियों को प्रताड़ित करने जैसा पहला मामला नही है जिला जेल वह कैद खाना है जहाँ केवल जेल अधिकारी कर्मचारी जो करेगे वह सही है बाहर तक किसी की आवाज न सुनाई पड़ती है न ही दिखाई पड़ती है अपराधी हो या न हो पर उन के साथ अपरधियों के जैसे सलूख करते है, जेल में सजा यापता हो फिर विचाराधीन बंदी हो सब पर जेल प्रशासन अपने नियंम कानून थोपती है और जब कोई बड़ा अधिकारी जाँच या निरीक्षण करने पहुँचता है तो पहले ही सभी को कह दिया जाता है अगर कोई मुंह खोला तो सोच लेना और पीड़ित शोषित सब अपना मुंह बंद रखते हैं जिम्मेदार अधिकारी निरीक्षण करते है और चुप चाप चले जाते हैं।
वही जेल परिसर के अंदर अजीत पटेल की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने न केवल जेल प्रशासन बल्कि जिला अस्पताल की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रशासनिक स्तर पर जारी किए गए प्रेस नोट्स में जहां दोनों विभागों ने अपनी-अपनी सफाई देकर पल्ला झाड़ लिया है, और अपनी अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली है । अगर दोनो विभाग सही है तो फिर मौत की जिम्मेदारी किसकी है क्यों और कैसे हुई मौत जब जेल जेल अभिरक्षा में तो जिम्मेदारी कौन लेगा वहीं घटना की तह में झांकने पर कई ऐसे तथ्य सामने आते हैं जो यह इशारा करते हैं कि यह मौत केवल संयोग नहीं, बल्कि जेल प्रशासन की लापरवाही और अव्यवस्था की विफलता का परिणाम है।

वही सूत्रों से जानकारी के अनुसार दिनांक 27 अक्टूबर 2025 को सुबह लगभग 11:41 बजे जिला जेल मंडला से आरक्षक के साथ विचाराधीन बंदी अजीत पटेल (आयु 36 वर्ष, पिता जगदीश पटेल, निवासी बिनेका थाना मंडला) को इलाज के लिए जिला अस्पताल भेजा गया। जानकारी के अनुसार मरीज को सांस लेने में तकलीफ और पूरे शरीर में सूजन की शिकायत थी। अस्पताल पहुंचते ही डॉक्टरों ने उसे मेडिसिन ओपीडी से सीधे आईसीयू में भर्ती किया। डॉक्टरों द्वारा की गई जांच में पता चला कि मरीज को खून की भारी कमी (एनीमिया) है और ईसीजी में हृदय की कार्यप्रणाली में भी अनियमितता पाई गई। स्थिति गंभीर थी, तत्काल ब्लड की जरूरत बताई गई। लेकिन ब्लड बैंक में मरीज का ग्रुप एबी पॉजिटिव उपलब्ध नहीं था।
अस्पताल प्रशासन के अनुसार, खून की अनुपलब्धता और लगातार बिगड़ती हालत को देखते हुए अजीत पटेल को मेडिकल कॉलेज जबलपुर रेफर कर दिया गया इलाज के दौरान शाम 3:40 बजे उसकी मौत हो गई।

पहले भी बिगड़ी थी तबीयत मृतक अजीत पटेल जिला जेल मंडला में पॉक्सो एक्ट के तहत विचाराधीन बंदी था। उसे 17 जून 2024 को जेल में दाखिल किया गया था।
सूत्रों के मुताबिक, उसकी तबीयत पहले भी बिगड़ चुकी थी। 18 अक्टूबर 2025 को भी जेल चिकित्सक की सलाह पर उसे जिला अस्पताल भेजा गया था, लेकिन शाम तक वापस लौटा दिया गया।
प्रश्न यह उठता है कि जब बंदी की तबीयत बार-बार खराब हो रही थी, तो जेल परिसर में संचालित किलिनिक और जेल विभाग में पदस्थ डॉक्टर कहाँ थे और उनके द्वारा अजित पटैल का कब कब और क्या क्या इलाज किया गया अगर जेल में पदस्थ डॉक्टर के द्वारा समय समय अजित पटेल का ईलाज मुहैया कराया जाता तो वह इस स्थिति नही पहुँच सकता था और उसके स्थायी इलाज या स्वास्थ्य की निगरानी के लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए?
जेल प्रशासन और अस्पताल का प्रेस नोट जारी कर ‘जिम्मेदारी से बचने का प्रयास’ कर रहें है
वही घटना के बाद जेल प्रशासन और जिला अस्पताल दोनों ने अलग-अलग प्रेस नोट जारी कर अपनी-अपनी जिम्मेदारी से किनारा करने की कोशिश की।

जेल प्रशासन का प्रेस नोट

“विचाराधीन बंदी को स्वास्थ्य खराब होने पर तुरंत जिला अस्पताल भेजा गया। डॉक्टरों के निर्देशानुसार उपचार कराया गया। सभी जरूरी कदम उठाए गए।”
जिला अस्पताल का प्रेस नोट
मरीज को अत्यंत गंभीर हालत में भर्ती किया गया था। जांच में खून की भारी कमी और हृदय की अनियमितता मिली। ब्लड बैंक में आवश्यक ब्लड ग्रुप उपलब्ध न होने के कारण रेफर किया गया। इलाज के दौरान मरीज की मृत्यु हो गई।”
दोनों विभागों के इन बयानों में एक समान बात साफ दिखती है जिम्मेदारी किसी ने नहीं ली। सवाल यह है कि क्या किसी की जवाबदेही तय की जाएगी या यह मामला भी अन्य मौतों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।अगर समय पर खून मिल जाता, तो क्या जान बचाई जा सकती थी डॉक्टरों के अनुसार, मरीज की हालत गंभीर जरूर थी, लेकिन ब्लड ट्रांसफ्यूजन मिलने पर कुछ सुधार की संभावना थी। मंडला ब्लड बैंक में उस समय एबी पॉजिटिव ब्लड उपलब्ध नहीं था।
यह प्रश्न अब प्रशासन के लिए चुनौती बन गया है कि आखिर छोटे जिलों के ब्लड बैंक अक्सर स्टॉक खाली क्यों बताते हैं क्या आपात स्थितियों के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होती ब्लड डोनेशन कैम्प और एनजीओ द्वारा बार-बार अपील के बावजूद भी कई बार जरूरतमंद मरीजों को समय पर रक्त नहीं मिल पाता।
जेल में भोजन और स्वास्थ्य सुविधाओं की सच्चाई
मृत बंदी के साथियों और सूत्रों से जानकारी अनुसार, मंडला जिला जेल की स्थिति चिंताजनक है। जहाँ बंदियों को भरपेट भोजन गुणवत्ता युक्त भोजन नहीं दिया जाता हैं।
बंदियों और कैदियों को “पानी वाली दाल”, “पतली सब्जी”, “चार रोटी” और “छोटा डिब्बा चावल” परोस दिया जाता है।पेट भर पाए या नही न ही सुबह का नाश्ता में पोषक युक्त होता है न खाना शासन द्वारा निर्धारित मैन्यू, का तो कभी उपयोग किया ही नही जाता हैं शासन के द्वारा जारी मीनू में पोषक तत्वों से भरपूर भोजन का प्रावधान है, पर वह कागजों तक ही सीमित है।
सुबह और दोपहर की चाय में मात्र नाम मात्र की शक्कर होती है वह केवल गर्म पानी जैसी दी जाती है। भोजन की गुणवत्ता इतनी खराब होती है कि बंदीयो को पोषण आहार न मिलने के करण जेल में बंद कैदी और विचाराधीन का आये दिन वजन घटता चला ही जाता हैं जिस कारण अक्सर बीमार पड़ते हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी दयनीय है। जेल में डॉक्टर हर रोज उपलब्ध नहीं रहते है। वह केवल सोमवार को अधीक्षक के साथ परेट मे देखे जाते है जब कोई बंदी बीमार होता है, तो सहबंदी ही उसे दो-चार गोलियां देकर टाल देते हैं। कई बार दवाइयां एनजीओ या सरकारी स्वास्थ्य शिविरों से आती हैं, लेकिन वे भी कैदियों तक नहीं पहुंचतीं। गायब हों जाती हैं
कागजों में हर बंदी का वजन 60 किलो से ऊपर दिखाया जाता है, जबकि वास्तव में कई बंदियों का वजन 45-50 किलो से भी कम है। वजन नापने वाली मशीन भी खराब बताई जाती है।

व्यवस्था की पोल खोलते तथ्य
स्वास्थ्य लापरवाही

जेल में नियमित स्वास्थ्य परीक्षण नहीं होते। चिकित्सक की अनुपस्थिति सामान्य है। पोषण की कमी कैदियों को दिए जाने वाला भोजन पौष्टिकता से कोसों दूर है।
दवाइयों की अनुपलब्धता निःशुल्क दवाइयां और टॉनिक जो एनजीओ या अस्पताल से आते हैं, अक्सर जेल प्रशासन के पास ही अटक जाते हैं।

जेल में खुला हो रहा हैं मानवाधिकारों का हनन

वही विचाराधीन बंदी, जो अभी दोषी साबित नहीं हुआ, उसे भी पर्याप्त इलाज और भोजन का अधिकार है पर यह अधिकार सिर्फ कागजों में है। कानूनी और नैतिक प्रश्न भारत का संविधान और मानवाधिकार आयोग दोनों यह सुनिश्चित करते हैं कि हर कैदी को स्वास्थ्य और गरिमा के साथ जीवन का अधिकार मिले। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार अपने निर्णयों में कहा है कि जेल में बंद व्यक्ति की सुरक्षा, भोजन और चिकित्सा का उत्तरदायित्व राज्य का है।
ऐसे में सवाल उठता है जब एक विचाराधीन बंदी की मौत इलाज के अभाव में होती है, तो यह असल में किसकी विफलता है?
क्या जेल प्रशासन ने समय पर स्वास्थ्य रिपोर्ट और इलाज की व्यवस्था नहीं की क्या अस्पताल प्रशासन ने गंभीर मरीज के लिए तुरंत ब्लड की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की और क्या जिला प्रशासन ने जेल की नियमित जांच और निरीक्षण की जिम्मेदारी निभाई
इन तीनों सवालों के जवाबों से ही सच्चाई सामने आ सकती है।
मानवाधिकार आयोग से जांच की मांग शासन के आदेशों का पालन केवल कागजों में मध्यप्रदेश शासन द्वारा जेलों में कैदी कल्याण योजना और जेल स्वास्थ्य मिशन जैसी कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। इन योजनाओं के तहत हर जेल में साप्ताहिक स्वास्थ्य जांच, पोषक भोजन, और डॉक्टर की उपलब्धता अनिवार्य की गई है।
लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर है। मंडला जेल जैसी छोटी जिलों की जेलों में स्टाफ की कमी, चिकित्सक की अनुपलब्धता और भोजन की निम्न गुणवत्ता आम बात है।
वही विचाराधीन बंदी अजीत पटेल की मौत सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि एक पूरी प्रणाली की मौत है — उस प्रणाली की जो सुधार गृह कहे जाने वाले जेलों को सजा गृह बना चुकी है। जहाँ पर उन्हें केवल अपराधी की नजर से देखा जाता हैं और चाहे वह अपराध किया हो या न हो वह केवल अपराधी है बल्कि जो अपराधी नही होता वह इस जगह जाने से अपराधी बन जाता है और जेल के कर्मियों का एक चारागाह बन जाता है अगर समय पर इलाज मिलता, अगर ब्लड की व्यवस्था होती, अगर भोजन और स्वास्थ्य सुविधाएं मानकों के अनुसार दी जातीं,
तो शायद आज अजीत पटेल जीवित होता।

इनका कहना है…

इसी माह की 18 तारीख को बंदी को नियमित चेकअप के लिए जिला अस्पताल ले जाया गया था जिसमें जांच के दौरान अजीत पटेल का हीमोग्लोबिन 12.5 बतलाया गया था। जिसकी रिपोर्ट हमारे पास में हैं परन्तु कल जब फिर से अजीत पटेल ने परेड के दौरान कमजोरी होना बतलाया तो पुनः जिला चिकित्सालय ले जाया गया जहां पर जांच के दौरान हीमोग्लोबिन बहुत कम होना बतलाया गया। जब हमने डॉक्टरों से इस बारे में बात की हमको स्वास्थ्य विभाग वालों ने बतलाया कि हो सकता हैं ये कोई टेक्निकल फॉल्ट होगा अब यदि ऐसा हैं तो ये स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी हैं न कि हमारी जिम्मेदारी हैं।
संजय सहलाम
जेल अधीक्षक मंडला

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