नशा मुक्ति को लेकर अभियान का आगाज और शराब बंदी को लेकर ग्राम वासियों एवं मातृ शक्तियों ने सौंपा ज्ञापन

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रेवांचल टाइम्स – मंडला, आदिवासी बाहुल्य जिला मंडला के जनपद पंचायत मोहगांव के ग्राम चाबी में शराबबंदी की मांग को लेकर गाँव गाँव में एक बड़ा जन आंदोलन का आकार दिन वि दिन लेता जा रहा है।
वही जहाँ मंडला बैगा आदिवासी बाहुल्य होने के चलते इस जिले में आदिवासियों को उनके देवी दिवाले वि ख़ुद के सेवन के लिए सरकार घर पर रखने के लिए पांच वाटल रखने की छूत दे रखी हुई है पर इनके आड़ लेते हुए देशी विदेशी लाइसेसी शराब ठेकेदार कुचियो के माध्यम से गांव गांव गली गली शराब पुलिस और आबकारी विभाग से गठजोड़ बनाते हुए बिचवा रहें जिससे बच्चे युवा नशे के आदि हो रहें है और इस शराब के कारण लोगो की असमय मौत के मुंह में समा रहें है और ग़रीब के घर बर्बाद हो रहें हैं पर अब नगर से लेकर ग्रामीण अंचलों में अबेध शराब की बिक्री को लेकर मातृ शक्ति आगे आकर विरोध कर रही हैं और शासन प्रशासन से माँग कर रही है की जो गली मोहल्ले में कुचियो के माध्यम से बिक रही शराब पर प्रतिबंध लाए और तत्काल प्रभाव से बंद करने आये दिन शिकवा शिकायत करते हुए ज्ञापन तक सोपा जा रहा हैं!
वही जिले के मोहगांव के ग्राम चावी में भी मातृ शक्तियों ने अबेध देशी विदेशी शराब के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया है जहाँ नशा मुक्ति के उद्देश्य से ग्रामवासियों और मातृशक्ति ने मिलकर अब प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। हाल ही में ग्रामीण महिलाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने चाबी की पुलिस चौकी पहुँच कर प्रशासन के नाम ज्ञापन सौंपा, जिसमें गाँव-गाँव में फैलते शराब के अवैध कारोबार पर तत्काल रोक लगाने तथा गाँव मे पूर्ण शराबबंदी लागू करने की माँग की गई।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार शासन द्वारा आदिवासी समाज को पाँच बॉटल शराब रखने की जो छूट दी गई है, वही अब शराब माफियाओं के लिए वरदान बन गई है। निजी उपयोग के लिए दी गई यह छूट धीरे-धीरे व्यवसायिक रूप ले चुकी है। पाँच बॉटल की अनुमति अब पचास बॉटल तक पहुँच गई है, जिससे गाँव-गाँव में खुलेआम शराब का कारोबार फल-फूल रहा है। प्रशासनिक मिलीभगत के बिना संभव नहीं हो सकता।
आबकारी और पुलिस विभाग पर सवाल
ग्रामीणों ने खुलकर कहा कि आबकारी विभाग और पुलिस की साठगाँठ से ही यह अवैध कारोबार चल रहा है। नियम के अनुसार, शराब विक्रय केवल लाइसेंसी दुकान से ही किया जा सकता है, लेकिन हकीकत इसके उलट है। मोहगांव चाबी क्षेत्रों के गाँवों में शराब ठेकेदारों ने अपने कुचियों यानी एजेंटों के माध्यम से गांव में शराब पहुँचाने का नेटवर्क बना लिया है। शराब अब गाँव के चौपालों खेतों और यहाँ तक कि स्कूलों के पास तक आसानी से पहुँच रही है।
वही मोहगाँव और चाबी जैसे ग्रामीण इलाकों में स्थिति और भी गंभीर यहाँ न केवल अंग्रेजी शराब का अवैध कारोबार हो रहा है, बल्कि कच्ची शराब और हाथ भट्टी से बनी देसी शराब भी खुलेआम बेची जा रही है। कई जगहों पर महिलाएँ खुद अपने घर के सदस्यों को नशे से बचाने के लिए पुलिस के पास शिकायत लेकर गईं, लेकिन कार्रवाई के नाम छोटी मोटी कार्यवाही कर केवल खानापूर्ति कर दी जाती है।
मातृशक्ति की अगुवाई में आंदोलन
गाँवों की महिलाएँ अब इस आंदोलन की अगुवाई कर रही हैं। मातृशक्ति ने एक स्वर में कहा कि शराब ने समाज की जड़ें खोखली कर रही हैं। शराब के कारण घर टूट रहे हैं, परिवार बिखर रहे हैं, युवाओं का भविष्य अंधकार में जा रहा है। महिलाएँ अब यह ठान चुकी हैं कि चाहे जो भी हो, गाँव में शराब नहीं बिकने देंगी। उन्होंने कहा कि शासन द्वारा शराबबंदी लागू नहीं की गई तो वे सड़क पर उतरकर उग्र आंदोलन करने को मजबूर होंगी।
पुरूष और युवा वर्ग नशे के आदी बनते जा रहे हैं। घर की सारी कमाई शराब में खर्च हो रही है। अगर यही हाल रहा तो आने वाली पीढ़ी बरबाद हो जाएगी। तत्काल गाँव-गाँव में शराब की बिक्री बंद करे और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करे।”
युवाओं में बढ़ती लत और सामाजिक असर शराब की आसानी से उपलब्धता के कारण अब युवा वर्ग तेजी से नशे की चपेट में आ रहा है। पहले केवल कुछ लोग ही शराब पीते थे, लेकिन अब यह सामाजिक समस्या बन चुकी है। गाँवों में झगड़े, घरेलू हिंसा, चोरी जैसी घटनाएँ बढ़ गई हैं। शिक्षा पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ा है कई युवा स्कूल और कॉलेज छोड़कर नशे में लिप्त हो रहे हैं।शराबबंदी सिर्फ एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार का अभियान होना चाहिए। जब जनता जागरूक हो चुकी है ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि आबकारी विभाग को सब कुछ मालूम होने के बावजूद कार्रवाई नहीं की जा रही है। पुलिस और ठेकेदारों के बीच सांठगाँठ के चलते अवैध शराब व्यापारियों को खुली छूट मिल गई है। शराबबंदी कानून को सख्ती से लागू करने तथा शराब ठेकों के नवीनीकरण पर पुनर्विचार की भी माँग की गई है।
नशा मुक्ति अभियान की शुरुआत
इस आंदोलन के साथ ही ग्रामीणों ने नशा मुक्त जिला अभियान का भी आगाज़ किया है। गाँवों में जनजागरूकता रैलियाँ निकाली जा रही हैं, नुक्कड़ नाटक और सभाएँ आयोजित कर लोगों को नशे के दुष्परिणामों से अवगत कराया जा रहा है। महिलाओं के साथ-साथ युवक मंडल और सामाजिक संस्थाएँ भी इसमें सहयोग कर रही हैं।
मोहगांव और चाबी क्षेत्रों में चल रहा यह शराबबंदी आंदोलन अब केवल सामाजिक नहीं, बल्कि जनआंदोलन का रूप ले चुका है। ग्रामीणों और मातृशक्ति की यह पहल बताती है कि जब समाज स्वयं अपनी बुराइयों के खिलाफ खड़ा होता है, तो बदलाव निश्चित होता है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस जनआवाज़ को कितनी गंभीरता से लेते हैं और शराबबंदी की दिशा में क्या ठोस कदम उठाते हैं।

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