लगातार बाघो की मृत्यु पर कान्हा टाइगर प्रबंधन पर प्रश्न चिन्ह, ?
रेवांचल टाईम्स – मंडला, जिले में संचालित जो पूरे विश्व मे प्रख्यात नेशनल पार्क कान्हा वन्य प्राणी प्रबंधन के लिए विख्यात कान्हा टाइगर रिजर्व में एक वर्ष के अंदर लगभग 9 बाघो की मृत्यु के संदर्भ में कान्हा टाइगर रिजर्व के वन्य प्राणी प्रबंधन पर प्रश्न चिन्ह अंकित हो गया है, तथा मध्य प्रदेश शासन एवं भारत शासन के लिए यह गंभीर चिंता का विषय बन गया है।
वही वर्षा काल के चतुर्मास पूर्ण करने एवं हाथियों की खुशामत पर वाहवाही लूटने के बाद अक्टूबर की पहली तारीख को स्थानीय विधायक एवं केबिनेट मंत्री श्रीमती संपतिया उइके, सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते, कान्हा टाइगर रिजर्व के वरिष्ठ अधिकारियों तथा नगर के कुछ मीडिया रिपोर्ट की उपस्थिति में हरी झंडी दिखाकर नवीन सत्र् में वन्य प्राणी दर्शन एवं पर्यटन सुविधा का उद्घाटन कर राज्य स्तर पर वाहवाही लूटी गई परन्तु उस दुर्भाग्य वंश उसके तत्काल बाद एक वयस्क बाघ एवं दो बाघ शावकों की मृत्यु के समाचार वन्य प्राणी प्रबंधन की पोल खोल दी तथा वन्य प्राणी को अपनी कार्यप्रणाली के प्रति कितनी जागरूकता है तथा वह माने या ना माने एक वर्ष के दौरान कान्हा टाइगर रिजर्व में लगभग नौ बाघो की मृत्यु प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिन्ह अंकित करता है। तथा यह प्रश्न वन्य प्राणी प्रबंधन, मध्य प्रदेश शासन एवं भारत शासन को गंभीरता से चिंतन के लिए आमंत्रित करता है, उपरोक्त अनुसार तीन बाघो की मृत्यु पर कान्हा प्रबंधन द्वारा मृत बाघो के शवों का वन्य प्राणी शल्य चिकित्सक से शव विच्छेद कराकर प्रोटोकॉल अनुसार तीन शवों का अग्नि संस्कार पूर्ण कर दिया गया तथा सदैव की भाती बाघो की मृत्यु पर रटा-रटाया जवाब की वर्चस्व की लड़ाई ही बाघों की मृत्यु का कारण है। वन्य प्राणियों के जानकार सूत्रों से स्पष्ट हुआ कि केट फैमिली में जिसमें बाघ भी शामिल है,को विरासत में यह गुण प्राप्त होता है कि बाघ नर शावकों को मार डालता है तथा मादा शावकों को अपने भविष्य के लिए जिन्दा छोड़ देता है, परन्तु प्रस्तुत प्रकरण में मादा शावकों को नर बाघ द्वारा मृत्यु पारित किया जाना गंभीर प्रश्न खड़ा कराता है। टाइगर रिजर्व का वन क्षेत्र ऐसा वन क्षेत्र है जिसमें आम आदमी तथा पत्रकारों का बिना अनुमति के प्रवेश निषेध है तथा वर्तमान में प्रचलित प्रवेश शुल्क एवं अन्य शुल्कों को देखते हुए टाइगर रिजर्व के अंदर की गतिविधियों को जनता के सामने लाने हेतु आम पत्रकार की हैसियत के बाहर की बात है, जहां तक कान्हा टाइगर वन प्रबंधन के पत्रकारों को आमंत्रित कर वन्य प्राणी प्रबंधन की वास्तविकता से जनता को अवगत की सुविधा मात्र कुछ मीडिया के सदस्यों को प्राप्त है तथा कान्हा टाइगर रिजर्व के अधिकारियों द्वारा कम से कम दैनिक अखबारों के प्रतिनिधियों को वन्य प्राणी प्रबंधन की वास्तविकता से अवगत कराने हेतु वन्य प्राणी दर्शन हेतु आमंत्रित करने पर विचार करना चाहिए। भारतीय वन सेवा एवं राज्य वन सेवा के अधिकारियों को वन्य प्राणी प्रबंधन एकडेमी देहरादून में वन्य प्राणी प्रबंधन का एक वर्षीय डिप्लोमा कोर्स संचालित किया जाता है जिसका मंतव यह है कि प्रशिक्षण उपरांत यह अधिकारी वन्य प्राणी प्रशिक्षण की कमान संभालकर प्रशिक्षण में प्राप्त बारिकियों के साथ उत्कृष्ट वन्य प्राणी प्रबंधन व्यवस्थित कर सकें परन्तु प्राप्त जानकारी के अनुसार वन्य प्राणी प्रबंधन में एक वर्षीय डिप्लोमा प्रशिक्षण प्राप्त भारतीय वन सेवा एवं राज्य वन सेवा अधिकारी को वन्य प्राणी प्रबंधन पदस्थ ना किया जाकर ऐसे अधिकारियों को वन्य प्राणी प्रबंधन की कमान सौंपी गई है, जिन्होंने वन्य प्राणी प्रबंधन का डिप्लोमा प्रशिक्षण नही किया है, जिसमें वर्तमान फील्ड डायरेक्टर भी शामिल है।
जहां तक वन्य प्राणी प्रबंधन के अंतर्गत प्राप्त सुविधाओं में रेंजर स्तर तक चार पहिया वाहन, वायरलैस आदि अन्य सुविधाएं शामिल हैं। इसके बावजूद भी वन्य प्राणी प्रबंधन में कारगर उपलब्धि ना होना चिन्ता का विषय है। आज लगभग चालीस पचास वर्ष पूर्व वन्य प्राणी प्रबंधन के भीष्म पितामह पदभूषण श्री एच, एस पवार क्षेत्र संचालक कान्हा के कार्यकाल में उत्कृष्ट वन्य प्राणी प्रबंधन के परिणाम सामने आते थे। जिसका मुख्य कारण वन क्षेत्रों में सधन गस्त था स्वयं श्री पवार क्षेत्र संचालक अपने प्रवास के दौरान 25-30 किलोमीटर प्रति दिन पैदल चलकर वन्य संरक्षण को मुल्तरुप दिया करते थे, आज कौन रेंजर, डिप्टी रेंजर, वनपाल, वनरक्षक एवं वरिष्ठ अधिकारी 25-30 किलोमीटर पैदल गश्त करता है इसका जवाब वर्तमान उच्चाधिकारियों से ही अपेक्षित है,देर आये दुरस्त आये अभी भी कान्हा टाइगर रिजर्व के वरिष्ठ अधिकारियों से उत्कृष्ट वन्य प्राणी प्रबंधन की जनापेक्षित है।