जनजातियों के नाम पर लूट की प्रयोगशाला …. अदृश्य भवन, बनावटी स्टेशनरी और बेखौफ अधिकारी!
रेवांचल टाईम्स – मंडला, आदिवासी बहुल जिला मंडला के सहायक आयुक्त कार्यालय में निर्माण के नाम पर निगल लिए 25,61,488 रुपए भवन, भवन का पता ही नही की आखिर कहा बना … छात्रावासों में स्टेशनरी के नाम पर उड़ाए लाखों… फिर भी जिम्मेदार कुर्सियों पर काबिज़!
सहायक आयुक्त कार्यालय मंडला अपने कार्यप्रणाली को लेकर आये दिन सुर्खियों में बना रहता है कभी संलग्नीकरण अटैच मेंट, भवन निर्माण कार्य मरम्मत कार्य या या फिर खरीदी को लेकर इस विभाग में भ्रष्टाचार चरम सीमा को पर कर चुका है पर दुर्भाग्य की ये जिला सीधे साधे और पिछड़े होने के कारण कोई आवाज उठती नही है और जो उठती है उसे जिम्मेदारो के द्वारा लीपापोती कर दबा दी जाती हैं।
देश जब डिजिटल इंडिया और स्मार्ट क्लास की बात कर रहा है,
मध्यप्रदेश के मंडला में आज भी भवन हवा में बनते हैं और पैसे फाइलों में डूबते हैं।
यह कहानी सिर्फ भ्रष्टाचार की नहीं है, यह उस भरोसे की मौत है जिसे आदिवासी समाज ने सरकार पर किया।
मंडला के पौड़ी लिंगा स्कूल में प्रयोगशाला और पुस्तकालय भवन के लिए शासन से 25.61 लाख स्वीकृत हुए।
और पैसा सरकारी खाते में पहुंचा।

प्राचार्य ने पूरे पैसे का आहरण भी कर लिया। लेकिन भवन? ज़मीन पर उसका नामोनिशान तक नहीं।
वही जब पत्रकार मुकेश श्रीवास ने सूचना अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी मांगी, तो प्राचार्य मौन, अधिकारी निष्क्रिय, और व्यवस्था बेजान दिखी।
आखिरकार याचिका उच्च न्यायालय जबलपुर में दाखिल की गई, जहां मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति विवेक जैन ने कलेक्टर मंडला को चार सप्ताह में जांच का आदेश दिया।
लेकिन ये कहानी सिर्फ यहीं तक नहीं है…
अब सुनिए “भवन घोटाले” से पहले का पन्ना…
तत्कालीन सहायक आयुक्त संतोष शुक्ला का नाम सिर्फ एक याचिका में नहीं, बल्कि एक लंबी भ्रष्टाचार की चेन में शामिल रहा है। जहाँ इनके द्वारा पिछड़े आदिवासी जिलो में गरीब लाचार बच्चों के हक में डाका डाला जा रहा है और जिम्मेदार मूकदर्शक बन बैठे है या कहे कि अपने स्वार्थ के लिए ये जिला प्रशासन में बैठें जिम्मेदार अधिकारी कर्मचारियों ने धृष्टराज की तरह न देखेने की कसम खाँ कर बैठे है इन्हें पता शिक़वा शिकायते होती है और होती रहेंगी पर उनकी जेब और ख्याल तो केवल सरकारी धन में सेंधमारी करने वाले ही रखते है।
वही सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार मंडला जिले में पदस्थ तत्कालीन सहायक आयुक्त सन्तोष शुक्ला के कार्यकाल के समय उनके अनेको कारनामें मीडिया की सुखियों में बने रहे साथ ही छात्रावास अधीक्षक राजकुमार सिंगौर ने खुलासा किया था कि आदिवासी विकास विभाग के हॉस्टल फंड में बड़े पैमाने पर हेराफेरी होती थी। और राशि केवल दिखावे की लिए भेजी जाती थी जो राशि आती थी वह आयुक्त महोदय के द्वारा स्वयं माँग लिया करने का आरोप मय शपथ पत्र में दिया गया था वावजूद इसके कोई कार्यवाही नही की गई जाँच के नाम पर कागजो के पेट भर के जाँच के आवेदन में आज धूल जम चुकी है और श्री शुक्ला जी अपने निशाना दूसरे जिले में लगा रहे है।
क्या होता था घोटाला?
हॉस्टल के लिए जो पैसा आता था, उसे या तो आंशिक या पूरा निजी नामों पर चेक बनाकर निकलवा लिया जाता था।
मार्च 2013 में दो ऐसे चेक सामने आए:
पहला चेक अधीक्षक के नाम
दूसरा चेक बाबू महादेव कछवाहा के नाम
कुल राशि 3,82,170
पावती दी गई किसी तीसरे – ‘वीरेन्द्र स्टेशनरी’ – के नाम पर।
सवाल यह है:
अगर भुगतान स्टेशनरी के लिए था तो चेक सीधे स्टेशनरी दुकानदार के नाम क्यों नहीं हुआ?
क्या हॉस्टल में वाकई इतनी स्टेशनरी आई?
या सिर्फ कागज़ पर खड़ी की गई बिलों की इमारत?
फाइलें भरीं, लेकिन एक्शन खाली!
सहायक आयुक्त कार्यालय के ही कर्मचारी दिलीप पटेल ने 18 लाख से अधिक के नियमविरुद्ध भुगतानों की सूची संभागायुक्त को भेजी।
20 ऐसे भुगतान सामने आए, जो निजी नामों और बिना कार्य के थे।
लेकिन तब भी कार्रवाई नहीं हुई।
छात्रावास अधीक्षक राजकुमार सिंगौर ने 2014 में पुलिस अधीक्षक मंडला एंव थाना कोतवाली मंडला में और शासन को शिकायतें भेजीं।
जवाब? वही पुरानी लकीर …. “जांच चल रही है”। पर आखिर कब होगी जाच पूरी बड़ा सवाल
अब अदालत ने दिया आदेश, लेकिन भरोसे में दरार है…
हाईकोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए कलेक्टर मंडला को 4 सप्ताह में जांच रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है।
अगर याचिकाकर्ता जांच से संतुष्ट नहीं, तो वो दोबारा अदालत का रुख कर सकता है।
लेकिन सवाल ये है ….
“क्या जिन हाथों ने पैसा निकाला, वही जांच करेंगे?”
“जो भवन कभी बना ही नहीं, उसकी जांच अब कागज़ों में कैसे जिंदा होगी?”
ये सिर्फ एक या दो घटनाएं नहीं हैं ….
ये पूरा सिस्टम सड़ा हुआ है।
जहां जनजातियों के हक, शिक्षा के नाम और बच्चों के भविष्य पर हक से डाका डाला जा रहा है।
पैसे निकलते हैं…
बिल बनते हैं…
पावती तीसरे के नाम जाती है…
और जवाबदेही? किसी के सिर नहीं।
वही यह लूट सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं है, यह सामाजिक बच्चों के साथ और उनके भविष्य के साथ विश्वासघात है।
जब न्याय भी ‘सूचना’ के सहारे खड़ा हो,
तो समझ लीजिए व्यवस्था अब सिर्फ चल नहीं रही…
बल्कि घिसट रही है …. एक घोटाले से दूसरे तक।
झबुआ से मंडला और मंडला से डिंडौरी जिले में हुए सहायक आयुक्त कार्यालय में घोटालों के शिल्पकार: संतोष शुक्ला की भ्रष्टाचार डायरी भाग- 1
अनुज कुमार बन्देवार