कमीशन की ‘थ्योरी’ पर चल रहे अस्पताल

जबलपुर के स्वास्थ्य तंत्र ने दलालों के आगे टेक दिए घुटने

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कब जागेंगे जबलपुर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी?
कब रुकेगा सरकारी एंबुलेंस से प्राइवेट हॉस्पिटल तक ‘कमीशन सिंडिकेट’?

निजी अस्पताल कमीशन की थ्योरी पर चल रहे हैं। सच कहें तो जबलपुर में स्वास्थ्य सेवाएं बीमार नहीं, बल्कि गंभीर रूप से भ्रष्ट हो चुकी हैं। जिले के बड़े-बड़े प्राइवेट अस्पताल आज ‘सेवा’ का नहीं, ‘सेटिंग और कमीशन’ का केंद्र* बन चुके हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इस खुली लूट पर न स्वास्थ्य विभाग की आंखें खुलती हैं, और न ही मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) की कलम चलती है।

सरकारी एंबुलेंस, लेकिन मंज़िल प्राइवेट हॉस्पिटल – क्यों?

* सरकारी एंबुलेंस आज सरकारी अस्पतालों की जगह सीधे प्राइवेट अस्पतालों में पहुंच रही हैं।
* मरीजों को बरगला कर, भ्रमित कर, कभी-कभी डरा कर उन्हें संधिग्ध’ हालत में सीधे निजी अस्पतालों में भर्ती करवा दिया जाता है।
* इसके पीछे सक्रिय है एक संगठित कमीशन सिंडिकेट जो हर जांच, भर्ती, ICU और ऑपरेशन पर 20 से 50% तक का हिस्सा बांट रहा है।

कौन चला रहा है यह दलाली का खेल?

* हर बड़े अस्पताल में स्थायी दलाल/एजेंट सक्रिय हैं, जिनके संपर्क सीधे :

* सरकारी एंबुलेंस ड्राइवरों से,
* कुछ पंचायत और वार्ड स्तर के स्वास्थ्य कर्मचारियों से
और यहां तक कि कुछ सरकारी डॉक्टरों तक भी हैं।

कमीशन तय, इलाज तय — इंसानियत नदारद

* मरीज को कौन सा इलाज चाहिए , यह डॉक्टर नहीं, दलाल तय करता है।
* “कौन से कमरे में भर्ती किया जाए?”, “कौन सी जांच करवाई जाए?”, सब कुछ कमीशन प्रतिशत के हिसाब से तय होता है।
* कई मामलों में तो गंभीर न होने के बावजूद ICU में भर्ती करवा कर लाखों का बिल थमाया गया।

CMHO जी, कब तक मौन रहेंगे?

**मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) जो कि जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था के सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी हैं, उनकी निष्क्रियता और चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है:

1. क्या CMHO को इस कमीशन सिंडिकेट की जानकारी नहीं?
2. यदि जानकारी है, तो अब तक एक भी अस्पताल पर जांच क्यों नहीं?
3. जिले में आयुष्मान योजना के तहत हो रही फर्जीवाड़ा भर्ती पर अब तक कोई FIR क्यों नहीं हुई?
4. क्या प्रशासनिक पद पर बैठे अधिकारी भी इस खेल के हिस्सेदार हैं?

सत्य तथ्य और चौंकाने वाले आंकड़े :

* पिछले 6 महीनों में 80% एंबुलेंस केस सीधे प्राइवेट अस्पतालों को रेफर किए गए
* जांचों पर औसतन ₹2,000–₹10,000 कमीशन बांटा गया
* ICU के 60% केस फर्जी गंभीरता दिखाकर भर्ती किए गए

स्वास्थ्य सेवा या दलाली सेवा? अब जनता पूछे सवाल!

1. जबलपुर जिले में सभी प्राइवेट अस्पतालों की आयुष्मान, भर्ती व जांच रिकॉर्ड की जांच हो
2. सरकारी एंबुलेंस ड्राइवरों और संबद्ध कर्मचारियों की कॉल डिटेल्स और लोकेशन हिस्ट्री खंगाली जाए
3. CMHO कार्यालय द्वारा एक स्वतंत्र हेल्पलाइन और शिकायत पोर्टल शुरू किया जाए
4. फर्जी भर्ती और दलाली के मामलों में नामजद FIR दर्ज हो

5. भ्रष्टाचारियों पर NSA जैसे सख्त कानूनों में कार्यवाही हो

ये दलाली का धंधा नहीं रुका, तो गरीबों की जानें जाएंगी, ज़मीनें बिकेंगी और सिस्टम पूरी तरह गिर जाएगा।

रेवांचल टाइम्स इस मुद्दे को लगातार उजागर करता रहेगा — जब तक गुनहगार जेल नहीं जाते और व्यवस्था सुधरती नहीं!*

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