सिक्कों के अपमान का मुद्दा गरमाया: अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत ने कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन

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अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत में ज्ञापन सोपा जिला कलेक्टर के नाम

सिक्कों का अपमान और उपभोक्ताओं की आवाज़ क्या जिला प्रशासन सुन रहा है*
ग्राहक पंचायत की चेतावनी का अर्थ

दैनिक रेवांचल टाइम्स जबलपुर ग्राहक पंचायत की मांग मुद्रा बचाने आदेश जारी करें जिला कलेक्टर प्रशासन
अर्थव्यवस्था इन दिनों एक अनोखे, पर बेहद गंभीर संकट से गुजर रही है— अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत महाकौशल प्रांत एवं महानगर के पदाधिकारी जिला कलेक्टर को ज्ञापन सोपा 1और 2 के सिक्के चलन से गायब पर उठाए सवाल
1 और 2 रुपये के सिक्कों का संकट।
सुनने में भले मामूली लगे, पर यह समस्या उतनी ही गहरी है जितनी किसी बड़े आर्थिक असंतुलन की जड़ें होती हैं।
शहर के बाजारों में, दुकानों पर, चौराहों के पास चाय की थड़ियों से लेकर बड़े शोरूम तक…
एक ही स्थिति दिखाई देती ह
सिक्के नहीं लेंगे।
और यही अस्वीकार्यता, यही लापरवाही अब उपभोक्ताओं की जेब पर सीधा प्रहार बन चुकी है।
ग्राहक पंचायत की चेतावनी—यह सिर्फ सिक्कों का नहीं, ‘अधिकारों’ का प्रश्न है
अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत ने यह मुद्दा सिर्फ एक तकनीकी शिकायत के रूप में नहीं उठाया।
यह असल में उपभोक्ता सम्मान का प्रश्न है।
जब बाज़ार अपनी सुविधा के अनुसार मुद्रा स्वीकार करे और अस्वीकार भी—
तो फिर कानून, नियम, उपभोक्ता, सबके अस्तित्व पर सवाल उठ खड़े होते हैं।
ग्राहक पंचायत ने स्पष्ट रूप से याद दिलाया है कि—
RBI कहता है कि 1 से 1000 रुपये तक की हर मुद्रा ‘कानूनी निविदा’ है।
इसे लेने से इंकार करना अवैध है।

तो फिर सवाल सीधा है—
जब कानूनी निविदा मौजूद है, तो कानून मौन क्यों है?
और प्रशासन अनुपस्थित क्यों?

हजारों रुपये के सिक्के, लेकिन लोगों की जेब में ‘बेकार धातु’
जबलपुर में घरों, दुकानों, पेट्रोल पंपों, कैश काउंटरों और यहां तक कि निजी संस्थाओं के बैगों में भी हजारों रुपये के सिक्के जमा पड़े हैं।
क्यों?
क्योंकि कोई लेने को तैयार नहीं।

यह स्थिति केवल मनमानी नहीं—
यह आर्थिक असंतुलन है।
यह उपभोक्ताओं के साथ अन्याय है।
और यह प्रशासन के लिए एक चेतावनी है कि उसकी मौन नीति आमजन को नुकसान पहुँचा रही है।
छोटी खरीद में सिक्कों का न चलना,
बड़ी खरीद में छुट्टे की कमी,
और रोज़मर्रा में अनावश्यक खर्च—
इन सबका बोझ किस पर आ रहा है?
उपभोक्ता पर।

कीमतों पर बढ़ता दबाव—अनदेखा नहीं किया जा सकता

जब छोटे सिक्के बाजार में नहीं चलेंगे,
तो छोटे दाम कब तक टिकेंगे?
जब 2 रुपये का सिक्का अस्वीकार होगा,
तो 2 रुपये की वस्तु का दाम 5 रुपये होना तय है।

इसलिए ग्राहक पंचायत का यह कहना बिल्कुल तर्कसंगत है कि—
सिक्कों का संकट कीमतों को ऊपर धकेल रहा है।
और यह बढ़ोतरी बाजार की मजबूरी नहीं,
बल्कि अव्यवस्था की देन है।
प्रशासन की परीक्षा—सुनना ही काफी नहीं, कार्रवाई भी जरूरी
जिला प्रशासन के सामने अब दो विकल्प हैं—
या तो यह मुद्दा कागजों में दफ्न रहे,
या इसे वास्तविक समाधान मिले।

ग्राहक पंचायत ने तीन स्पष्ट मांगें उठाईं—

1. सिक्कों को कानूनी निविदा मानने का आदेश जारी किया जाए।

2. व्यापारियों में जागरूकता और अनुपालन सुनिश्चित किया जाए।

3. सिक्के अस्वीकार करने वालों पर कार्रवाई की जाए।
यह मांगें न केवल उचित हैं,
बल्कि समयानुकूल भी हैं।

क्योंकि प्रशासन का मौन अब उपभोक्ता अधिकारों पर चोट कर रहा है।

यह सिर्फ सिक्कों की लड़ाई नहीं—यह सम्मान और व्यवस्था की लड़ाई है

सिक्के छोटे जरूर हैं,
पर इनके पीछे खड़ी व्यवस्था बहुत बड़ी है।
एक समाज तभी सभ्य कहलाता है जब उसका प्रशासन छोटी-से-छोटी बात पर भी
न्यायसंगत और स्पष्ट रवैया रखे।

आज ग्राहक पंचायत ने वह आवाज उठाई है,
जो हजारों उपभोक्ताओं के मन की आवाज है।
अब सवाल जिला प्रशासन से है—
क्या वह इस चेतावनी को सुनेगा?
या सिक्कों की खनक तब सुनाई देगी जब समस्या और गहरी हो जाएगी?

अंत में…

1₹ और 2₹ के सिक्के भले छोटे हों,
पर उनका अपमान अर्थव्यवस्था के अनुशासन का अपमान है।

ग्राहक पंचायत की यह मांग सिर्फ समाधान नहीं,
बल्कि प्रशासन के लिए एक नैतिक दर्पण है—
जिसमें उसे अपना उत्तरदायित्व साफ-साफ दिखाई देना चाहिए

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