आदिवासी जिले में जारी भ्रष्टाचार का बोलबाला कोन करेगा जाच,डिंडौरी कृषि विभाग में महाघोटाला

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रेवाँचल टाईम्स – डिंडौरी, बेगा आदिवासी बाहुल्य जिले में किसान कल्याण विभाग के द्वारा किसानो के हक में खुलेआम डाका डाला जा रहा हैं औरजिम्मेदार मोन साधे हुए है आख़िर क्यों कोन दिलाएगा किसानो को न्याय ये बड़ा सवाल क्योंकि हर डाल में गिद्द बैठे हुए हैं और किसान बेचारा जाए तो कहाँ जाच के नाम पर केवल खानापूर्ति
वही सूत्रो से जानकारी के अनुसार किसान कल्याण विभाग ‘बीज’ के नाम पर ‘लूट’ मचाये हुए हैं और किसानों के हक पर डाका, डाल कर सरकार को दिखाने फर्जी सूची बना कर लाखों का गबन कर लिए है महीने बाद खुली जांच की पोल
डिंडौरी जिस अन्नदाता की मेहनत से देश का पेट भरता है, उसके हिस्से का बीज ही अगर सिस्टम के “दीमक” खा जाएं, तो उस किसान पर क्या गुजरती होगी? मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले डिंडौरी से एक ऐसा ही मामला सामने आया है, जिसने कृषि विभाग (Agriculture Department) की कार्यप्रणाली और ईमानदारी को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
जिला मुख्यालय स्थित किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग के अंतर्गत विकासखंड समनापुर और अमरपुर में चना बीज वितरण (Chana Seed Distribution) के नाम पर एक बड़ा सुनियोजित घोटाला उजागर हुआ है। यह मामला सिर्फ लापरवाही का नहीं, बल्कि एक संगठित गिरोह द्वारा किए गए भ्रष्टाचार का है, जिसमें मैदानी अमले से लेकर उच्च अधिकारियों तक की संलिप्तता के संकेत मिले हैं।
रूपभान पाराशर द्वारा की गई शिकायत इस घोटाले की परतों को उधेड़ कर रख दिया है। 32 महीने के लंबे इंतजार के बाद जो कथन के माध्यम से सच सामने आया है, वह चौंकाने वाला है।
भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस मामले की शिकायत 24 जनवरी 2023 के आसपास की गई थी (संदर्भित पत्र के अनुसार)। शिकायतकर्ता रुपभान सिंह पाराशर का आरोप है कि किसानों के साथ चना बीज वितरण में भारी धोखाधड़ी की गई है। शिकायतकर्ता का कहना है कि जांचकर्ता अधिकारियों ने मामले की गहराई में जाने के बजाय केवल औपचारिकता पूरी की है। जांच केवल दो विकासखंडों तक सीमित रही, जबकि अनियिमितता का दायरा पूरे जिले में फैला है।समनापुर ब्लॉक: बीज गायब, सरकारी आदेश हवा में इस घोटाले का सबसे बड़ा केंद्र समनापुर विकासखंड बना हुआ है।
1. वरिष्ठ अधिकारी का दावा:
वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी (SADO) श्री एस. एच अठया ने अपने बयान में स्पष्ट किया है कि वर्ष 2021-22 में किसानों को वितरण के लिए 1175.10 क्विंटल चना बीज प्राप्त हुआ था। इसमें से ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी (RAEO), श्रीमती सकुन धुर्वे को वितरण के लिए 469.20 क्विंटल बीज दिया गया था।
2. मैदानी अधिकारी का चौंकाने वाला खुलासा:
ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी श्रीमती सकुन धुर्वे का बयान पूरी कहानी को पलट देता है। उन्होंने कथन में बताया कि उन्हें मात्र 255 क्विंटल (कुल 850 बोरी) बीज ही प्राप्त हुआ। वरिष्ठ अधिकारी ने 469.20 क्विंटल बीज भेजा, तो मैदानी अधिकारी को सिर्फ 255 क्विंटल ही मिला? शेष 214 क्विंटल से अधिक बीज कहां गायब हो गया? क्या इसे हवा में उड़ा दिया गया या फिर इसे बाजार में बेचकर कालाबाजारी की गई? पत्र के अनुसार, यह बीज किसानों तक पहुंचा ही नहीं, बल्कि बीच में ही इसका भ्रष्टाचार कर लिया गया।
“मौखिक निर्देश” का खेल और अवैध वसूली
श्रीमती सकुन धुर्वे ने अपने बयान में भ्रष्टाचार की एक और परत खोली है। उन्होंने स्वीकार किया कि उच्च अधिकारियों के “मौखिक निर्देशानुसार” बीजों की कालाबाजारी की गई। सुश्री अभिलाषा चौरसिया और हरिशरण अठ्या का नाम प्रमुखता से लिया गया है, जिनके मौखिक आदेशों पर यह खेल खेला गया।श्री अठया के बयान के अनुसार, एक प्रदर्शन (Demonstration) का मतलब एक किसान को 75 किलो चना बीज देना था, जिसके लिए कृषक अंश (Farmer Share) के रूप में 775 रुपये लिए जाने थे।
अधिकारियों ने किसानों को 75 किलो की जगह मात्र 30 किलो बीज दिया और 775 रुपये की जगह 900 रुपये वसूले। यानी, बीज आधा और दाम ज्यादा। यह सीधे तौर पर गरीब आदिवासियों और किसानों के साथ ठगी है।भ्रष्टाचार की आग सिर्फ समनापुर तक सीमित नहीं थी, बल्कि अमरपुर विकासखंड में भी इसकी लपटें महसूस की गईं। यहाँ वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी, श्री मानसिंह परस्ते ने जो खुलासा किया है, वह विभाग के तत्कालीन शीर्ष नेतृत्व पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
श्री परस्ते ने अपने बयान में बताया कि वर्ष 2021-22 में 353.25 क्विंटल चना बीज उन्हें प्राप्त ही नहीं हुआ था। लेकिन, तत्कालीन उपसंचालक कृषि (DDA), श्री अश्विनी कुमार झारिया द्वारा उन पर अनुचित दबाव बनाया गया।उन किसानों की फर्जी सूची (Fake List) बनवाई, जिन्हें वास्तव में बीज दिया ही नहीं गया था। यह न केवल प्रशासनिक कदाचार है, बल्कि दस्तावेजों में हेराफेरी (Forgery) का एक आपराधिक कृत्य भी है। जिन किसानों के खेतों में बीज पहुंचना चाहिए था, उनके नाम सिर्फ कागजों पर चढ़ाकर सरकारी खजाने को चूना लगाया गया।
7 लाख 59 हजार का रहस्यमयी जमावाड़ा
घोटाले की पुष्टि इस बात से भी होती है कि इस पूरी प्रक्रिया में भारी नकद राशि का लेन-देन हुआ। पत्र में उल्लेख किया गया है कि श्री एच.एस. अठ्या के पास “टर्फा योजनांतर्गत” चना बीज के कृषक अंश के नाम पर 7 लाख 59 हजार रुपये जमा कराए गए, जिसकी पावती भी मौजूद है।
जब बीज किसानों को नियमानुसार बंटा ही नही तो यह लाखों रुपये की राशि किस मद में जमा हुई? क्या यह राशि किसानों से अवैध रूप से वसूले गए 900 रुपये प्रति बोरी का हिस्सा है? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब जिला प्रशासन को देना होगा।
सामूहिक घोटाला या सुनियोजित षड्यंत्र?
“इसी प्रकार जिले के अन्य विकासखंडों में भी सामूहिक घोटाला किया गया है।”
यह एकतरफा या मानवीय भूल नहीं है। यह एक “सिंडिकेट” की तरह काम करने वाला तंत्र है, जहां ऊपर से लेकर नीचे तक सबकी मिलीभगत नजर आती है।
* वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी: बीज की मात्रा में हेरफेर और विरोधाभासी बयान।
* विस्तार अधिकारी: मौखिक आदेशों का हवाला देकर अवैध बिक्री और वसूली।
* जांच अधिकारी: 32 महीने की देरी और तथ्यों को दबाने का प्रयास।
किसानों पर क्या गुजरी?
डिंडौरी जैसे जिले में, जहां आजीविका का मुख्य साधन कृषि ही है, वहां बीज न मिलना किसी आपदा से कम नहीं है।
* जिन किसानों को 75 किलो बीज मिलना था, उन्हें 30 किलो मिला। इससे उनकी बुवाई का क्षेत्रफल घट गया।
* बीज के अभाव में उत्पादन गिरा, जिससे उनकी वार्षिक आय प्रभावित हुई।
* जिन्हें बीज मिला ही नहीं, और उनका नाम फर्जी सूची में डाल दिया गया, वे सरकारी योजनाओं से पूरी तरह वंचित रह गए।प्रशासन के सामने सवाल
यह व्यवस्था के मुंह पर एक तमाचा है। 32 महीने बाद कथन रिपोर्ट में पाई गई “भारी अनियमितता” के बावजूद अभी तक ठोस कार्रवाई का न होना संदेह पैदा करता है तत्कालीन उपसंचालक, संलिप्त अधिकारियों और फर्जी सूची बनाने वालों के खिलाफ नामजद एफआईआर (FIR) दर्ज की जाए।अधिकारियों के वेतन से वसूल कर किसानों को लौटाई जाए।जिले के अन्य सभी विकासखंडों में वितरित बीज और लाभार्थियों की सूची का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) कराया जाए।
कृषि विभाग का नारा है “जय जवान, जय किसान”, लेकिन डिंडौरी के इस मामले ने इसे “जय बेईमान, जय गुमान” में बदल दिया है। अब देखना यह है कि शासन इस “सामूहिक घोटाले” पर क्या हंटर चलाता है, या फिर यह फाइल भी सरकारी दफ्तरों की धूल फांकने के लिए छोड़ दी जाएगी
डिंडौरी का यह बीज घोटाला यह साबित करता है कि निगरानी तंत्र पूरी तरह से विफल हो चुका है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो किसान कहां जाए?

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