रुपया और गुड़ अब खेतों में उगता है…?
रेवांचल टाइम्स – कल सोशल मीडिया पर एक अद्भुत खोज देखी बताया गया कि गुड़ अब खेतों में उगता है। यह देखकर दिमाग का गुड़ तुरंत गोबर हो गया। दिन भर उसी गुड़ को मथता रहा, शाम ढलते-ढलते एक और रत्न मिल गया। नेता जी फरमा रहे थे कि रुपया बो दो और करोड़ों कमा लो। बस वहीं लगा कि देश सच में तरक्की कर गया है अब न खेती में पसीना चाहिए, न मेहनत, न नीति; बस बोवाई कर दो, नोट उग आएंगे।
इतनी वैज्ञानिक बात सुनकर मुझे अपना बचपन याद आ गया। कभी शरारत में एक रुपया ज़मीन में बो दिया था। सोचा था शायद पौधा उग आए। अब नेता जी कह रहे हैं कि करोड़ों मिलते हैं, तो मैं भी खोज में निकल पड़ा। देखा तो वहाँ करोड़ों… काटों से भरी सैकड़ों झाड़ियाँ उगी हुई थीं। लगा।वाह, फसल तो आ गई!
फिर सोचा, शायद असली फसल ज़मीन के नीचे हो। खुदाई की। बड़ी उम्मीद से मिट्टी हटाई तो वही पुराना सिक्का मिला। पर हालत देखिए, पूरा काला पड़ चुका था। ठीक वैसा ही, जैसे खेत में झाड़ पर लगे गुड़ के ढेले पक-पक कर काले पड़ गए हों मीठास खत्म, बदबू चालू।
तब अचानक समझ आया दिक्कत खेत की नहीं, फसल की नहीं, दिक्कत बीज की है। जब बीज ही खोखला हो, तो उपज कैसी? और जब सोच ही खोखली बोई जाए, तो न गुड़ मीठा रहता है, न रुपया चमकता है।
तभी एक पुरानी कहावत याद आई जैसा गुरु, वैसा चेला। जब गुरु ही दिमाग का गुड़ गोबर कर दे, तो चेले क्या गन्ना उगाएंगे? वे तो खेत में भी भ्रम बोएंगे और मंच से भी।
अब तो हाल ये है कि देश में नीतियाँ नहीं उग रहीं, न समाधान बस जुमले की खेती हो रही है। खेतों में गुड़ उग रहा है, भाषणों में रुपया बोया जा रहा है और जनता हर फसल के बाद यही सोच रही है हमने बोया क्या था… और काट क्या रहे हैं?
लेख – राजेन्द्र सिंह जादोन