खतरे में धार्मिक नगरी की गरिमा ….? हवा में उड़ रहा मुख्यमंत्री का पहला आदेश
रेवांचल टाईम्स – मंडला, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव द्वारा पदभार ग्रहण करते ही जारी किए गए प्रथम आदेश— खुले में मांस-मछली विक्रय पर प्रतिबंध और धार्मिक स्थलों के आसपास निर्धारित सीमा से अधिक ध्वनि प्रदूषण पर रोक— मंडला जिले में पूरी तरह ठंडे बस्ते में पड़े हुए हैं। पारित आदेश होने के दो वर्ष पूरे हो गए, परंतु मंडला जिला प्रशासन की लापरवाह, निष्क्रिय और अकर्मण्य कार्यशैली ने मुख्यमंत्री के निर्देशों को मानो कूड़ेदान में डाल दिया है।
जहाँ मुख्यमंत्री ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि—खुले में मांस-मछली विक्रय पूर्णतः प्रतिबंधित होगा।
प्रशासन अपने-अपने क्षेत्र में निर्धारित बंद व्यवस्था/आड़-पर्दे वाले स्थान विकसित करे, ताकि व्यापारियों का व्यवसाय भी प्रभावित न हो और आमजनता वीभत्स दृश्यों से मुक्त रह सके।धार्मिक स्थानों के आसपास लाउडस्पीकर की आवाज निर्धारित सीमा से अधिक नहीं बजेगी।
लेकिन मंडला में इन निर्देशों का पालन नाम मात्र का भी नहीं हुआ।
धार्मिक नगरी घोषित, पर व्यवस्था ‘शून्य’
साल 2008 में मध्यप्रदेश शासन ने मंडला नगर को धार्मिक नगर घोषित किया था। 2010 में चतुर्सीमा भी निर्धारित की गई। उद्देश्य था—शहर की धार्मिक पहचान को मजबूत करना बाहर से आने वाले पर्यटकों के मन में आस्था बढ़ाना धार्मिक नगरी के अनुरूप स्वच्छता और सांस्कृतिक मर्यादा स्थापित करना लेकिन इसके बाद भी प्रशासन इस घोषणा को जमीनी हकीकत नहीं बना पाया। धार्मिक नगरी की छवि कागजों से आगे नहीं बढ़ सकी।
वही दूसरी ओर सूर्यकुण्ड धाम जाने वाले श्रद्धालु विवश — झूला पुल क्षेत्र ‘वीभत्स दृश्यों’ का केंद्र हर मंगलवार और शनिवार श्रद्धालु सूर्यकुण्ड धाम पहुंचते हैं। किंतु झूला पुल के दोनों ओर और मटन-मछली बाजार के आसपास खुले में कटिंग और बिक्री के और ढाबों में शराब खोरी के नज़ारे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाते हैं। ग्लानि, दुर्गंध और अस्वच्छता की शिकायतें वर्षों से उठ रही हैं, पर नगर पालिका प्रशासन ‘कोमे में पड़ा हुआ है। और केवल उन जगहों पर ध्यान दिया जा रहा है जहाँ से निजी स्वार्थ सिद्ध होते है नगर पालिका की कार्यप्रणाली से व्यापारी, राहगीर, स्थानीय जनता—सभी त्रस्त नजर आ रहें हैं जहाँ मटन-मछली दुकानों के आसपास की दुकानों को व्यापार में गिरावट झेलनी पड़ रही है।
दुर्गंध और गंदगी से स्थानीय नागरिक लंबे समय से परेशान।
अनेक बार शिकायत, ज्ञापन, जनसुनवाई—पर कार्रवाई शून्य।
बुद्धिजीवियों का सवाल—जब मुख्यमंत्री का आदेश ही नहीं माना जा रहा, तो जनता किसके पास जाए?नगर के प्रबुद्ध नागरिकों का कहना है—मुख्यमंत्री का आदेश दो वर्ष में लागू न हो सके, तो यह सीधा-सीधा प्रशासनिक अक्षमता का प्रमाण है। नगर पालिका उपयुक्त स्थान का चयन तक नहीं कर सकी— यह दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक है।कलेक्टर और SDM की भूमिका पर उंगली—क्या शासन के आदेशों के पालन की जिम्मेदारी नहीं?कलेक्टर एवं SDM राजस्व क्षेत्र में शासन के प्रतिनिधि माने जाते हैं। ऐसे में यह प्रश्न और गंभीर हो जाता है।
क्या उन्हें मुख्यमंत्री के आदेशों के पालन की सूचना नहीं?
या वे भी नगर पालिका की तरह इस मुद्दे को हल्के में ले रहे हैं?
क्या मंडला में शासन का आदेश केवल औपचारिकता बनकर रह गया है?जनता की गुहार—कौन सुनेगा?मुख्यमंत्री के निर्देशों की इस तरह अनदेखी से प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।जनता पूछ रही हैयदि मुख्यमंत्री का पहला आदेश ही हवा में उड़ता रहे, तो आम नागरिक न्याय के लिए किसके दरवाज़े जाए?