कोमा में पड़ा विकास बेहोशी में जवाबदार बदइंतजामी का कब्रगाह बना मंडला जिला, विकास की ताक रहा राह
रेवांचल टाईम्स – मंडला मध्यप्रदेश का यह आदिवासी मंडला मंडला जिला आज अव्यवस्था की आंधी में ऐसा उड़ रहा है कि लग रहा है मानो पूरा सिस्टम वेंटिलेटर पर हो। शासन–प्रशासन की नींद इतनी गहरी है कि उसे जगाने के लिए शायद भूकंप भी कम पड़ जाए। जनता कराह रही है, समस्याएं चीख रही हैं, और अफसर?मानो किसी और ग्रह पर रह रहे हों।
रेल से लेकर रोजगार तक—सिर्फ नारों का रेगिस्तान, हकीकत में ‘शून्य’
रेल विस्तार के झूठे जुलूस और घोषणाओं का ढोल कई साल से बज रहा है, पर धरातल पर हाल वही ढाक के तीन पात। रोजगार की हालत ऐसी कि युवा हाथ में डिग्री और चेहरे पर मायूसी लेकर चक्कर काट रहे हैं, जबकि अधिकारी और जनप्रतिनिधि विकास के नाम पर बस फोटो खिंचवाने में माहिर।
निर्माण कार्य सीधा सिंबल घोटाला
सड़क, पुलिया, भवन—सब जगह भ्रष्टाचार का नंगा नाच।
ठेकेदार ऐसे सामग्री डाल रहे हैं जैसे खेत में खाद डाल रहे हों।
निरीक्षण टीम?
जिले में कोई खोज सके तो पुरस्कार मिले!
शिक्षा विभाग ‘सोते हुए विभाग’ का राष्ट्रीय अवार्ड मिलना चाहिए
सरकारी स्कूलों में पढ़ाई गायब। शिक्षक मुख्यालय से गायब। व्यवस्था गायब।
निजी स्कूल फीस के नाम पर जनता की चमड़ी उधेड़ रहे हैं, लेकिन शिक्षा विभाग मुर्दाघर जैसी खामोशी ओढ़े बैठा है।स्वास्थ्य विभाग — मौत का सौदा, इलाज का छलावा
सरकारी डॉक्टरों को अस्पताल में ढूंढना मुश्किल, लेकिन उनके निजी क्लीनिक सुबह–शाम गुलजार।
गांवों में झोलाछापों की दूकानें धड़ल्ले से चल रही हैं—लोग इलाज कराने जाते हैं और अपने घर तक नहीं लौटते।
स्वास्थ्य विभाग?
भगवान भरोसे छोड़ दिया है जिले को।
राजस्व विभाग — फाइलों का कब्रिस्तान
पटवारी घर पर, किसान दफ्तर की धूल में दफन।
समस्याएं 100, समाधान 0।
लोग महीनों फाइलों का चक्कर लगाते हैं, लेकिन फाइलें वहीं की वहीं—जैसे किसी कालकोठरी में बंद हों।
अवैध शराब का साम्राज्य — सामने दूकानें, पीछे ‘भगवान’ अफसरगली–गली देसी, अंग्रेजी, देशी–विदेशी… सब बिक रहा है।
इतना खुलेआम कि लोगों को शक है कि कहीं यह मूक समर्थन तो नहीं?ना छापे, ना कार्रवाई—पूरा सिस्टम जैसे ‘ब्लैकआउट मोड’ में।झूठे अभियान, खोखले दावे—जमीन पर केवल गंदगी की सरकारस्वच्छ भारत का बैंड बज चुका है।कचरा उठाने की व्यवस्था खत्म, नालियां जाम, मोहल्लों में बदबूपूरा जिला कूड़ादान बन चुका है।कागजों में ‘ग्रेड ए’, असल में ‘ग्रेड धराशायी’।ऊपर से स्मार्ट मीटर की तेज तर्रार लूट—बिल देखकर जनता बेहोश होने की कगार पर।विरोध बढ़ रहा है, लेकिन विभाग के कानों में मोटी परत जमी है।सड़कें टूटी, ट्रैफिक बेहाल, बाजार अतिक्रमण से जाम’शहरी योजना’ नाम की चीज है भी?मंडला की सड़कें अब सड़क नहीं, ‘गड्ढों की गैलरी’ बन चुकी हैं।वाहन निकलते नहीं—उछलते हैं।बाजारों में अतिक्रमण का राज और ट्रैफिक पूरी तरह नंगा नाच।
सबसे बड़ा सवाल—मंडला को आखिर चला कौन रहा है?
क्या कोई कप्तान है भी या जहाज बिन चालक के बह रहा है?जिले की हालत बदतर, जनतापरेशान, व्यवस्थापंगु और अफसर–विधायक–प्रशासन सब जैसे ‘साइलेंट मोड’ में।
जनता की चीख—बस! अब बहुत हुआ!मंडला अब मुद्दों का नहीं, संकटों का शहर बन गया है।लोग पूछ रहे हैंकब जागेगा प्रशासन?कब सुधरेंगे विभाग?
या फिर मंडला को बदइंतजामी की कब्रगाह बनने दिया जाएगा