इलाज की जगह दिखावा, करोड़ों खर्च फिर भी जनता बेहाल

बुरी तरह चरमराई सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था ढप्प

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बुरी तरह चरमराई सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था ढप्प

रेवांचल टाईम्स – मंडला मध्य प्रदेश के मंडला जिले में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह आईसीयू में पहुंच चुकी है, लेकिन उसे बचाने वाला कोई नजर नहीं आ रहा। सरकार हर साल स्वास्थ्य सेवाओं पर लाखों–करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रही है, फिर भी सरकारी अस्पताल जनता के लिए उपयोगी साबित नहीं हो पा रहे।
हकीकत यह है कि सरकारी अस्पतालों में इलाज के नाम पर सिर्फ औपचारिकता निभाई जा रही है। डॉक्टर सरकारी वेतन लेकर अस्पताल में नाममात्र की उपस्थिति दर्ज कराते हैं और असली समय निजी डिस्पेंसरी और क्लीनिकों में बिताते हैं। परिणाम यह कि मरीज सरकारी अस्पताल से निराश होकर निजी अस्पतालों की महंगी लूट का शिकार होने को मजबूर हैं।
ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त
ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित प्राथमिक व उपस्वास्थ्य केंद्रों की हालत और भी बदतर है। कई स्वास्थ्य केंद्र तो अधिकतर समय ताले में बंद रहते हैं। एएनएम और महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता मुख्यालय से गायब रहती हैं, जिससे ग्रामीणों को न टीकाकरण का लाभ मिल पाता है और न ही बुनियादी उपचार।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन केंद्रों के लिए भेजी जाने वाली दवाइयां आखिर जाती कहां हैं?
यह रहस्य बन चुका है, लेकिन न तो जांच होती है और न ही जिम्मेदारों पर कार्रवाई।
आशा कार्यकर्ताओं की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में है। लापरवाही और उदासीनता के चलते ग्रामीण स्वास्थ्य तंत्र पूरी तरह बर्बाद हो चुका है।
आयुर्वेदिक अस्पताल भी उपेक्षा के शिकार
आयुर्वेदिक अस्पतालों की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है। मरीज न के बराबर, फिर भी शासन से मिलने वाली दवाइयां कहां खपाई जा रही हैं, इसका कोई हिसाब नहीं। इसके बावजूद वर्षों से भौतिक सत्यापन और जांच से बचाया जा रहा है।
अस्पतालों की साफ-सफाई, रंग-रोगन, मरम्मत और बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान न देना यह साबित करता है कि स्वास्थ्य सेवाएं सरकार की प्राथमिकता में ही नहीं हैं।
जनता के तीखे सवाल
अब जनता सवाल कर रही है—
क्या सरकारी अस्पताल सिर्फ बजट खर्च करने का जरिया बन गए हैं?
क्या डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों की मनमानी पर कोई लगाम नहीं?
क्या गरीब की जान की कीमत शून्य हो चुकी है?
जन अपेक्षा
लोगों की स्पष्ट मांग है कि—
सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों का तत्काल भौतिक सत्यापन कराया जाए
अनुपस्थित डॉक्टरों, एएनएम और कर्मचारियों पर कड़ी कार्रवाई हो
दवाइयों की स्वतंत्र जांच कर सच्चाई जनता के सामने लाई जाए
ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों को वास्तव में सक्रिय और उपयोगी बनाया जाए
नगरीय सरकारी अस्पतालों को भी जनहित में प्रभावी रूप से संचालित किया जाए
यदि अब भी शासन-प्रशासन नहीं जागा, तो यह साफ हो जाएगा कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं सिर्फ फाइलों और आंकड़ों में जिंदा हैं, जमीन पर नहीं।

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