जबलपुर की रात और खेल का मैदान: जहां बैट-बॉल नहीं, डंडे चले
जबलपुर। शहर का रानीताल स्टेडियम हमेशा से खेल का मैदान रहा है। रविवार की देर रात यह मैदान धीरे-धीरे अखाड़े में बदलता दिखा। और फिर अचानक, यह अखाड़ा किसी युद्धक्षेत्र जैसा हो गया। फर्क बस इतना था कि यहां बैट और हॉकी स्टिक के बीच कानून, व्यवस्था और तर्क दम तोड़ते नज़र आए।
एक ओर स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के हॉस्टल में रहने वाले युवा खिलाड़ी थे। दूसरी ओर शहर के वकील, जिन्हें आमतौर पर अदालतों में तर्क और कानून से लड़ते देखा जाता है। लेकिन इस रात अदालतें बंद थीं, तर्क खामोश थे, और संवाद की जगह आरोपों और लकड़ी के डंडों ने ले ली।
वकील कहते हैं – शुरुआत उधर से हुई
वकीलों का पक्ष साफ़ और ठोस था। क्रिकेट लीग चल रही थी। मैच समाप्त हुआ। अधिवक्ता अंशुल पटेल बाहर निकल रहे थे। तभी शराब के नशे में धुत कुछ युवकों ने हमला किया, पैसे छीने और विवाद शुरू किया। वकीलों का तर्क है कि यह कोई अचानक हुई भिड़ंत नहीं थी, बल्कि हॉस्टल प्रबंधन की लापरवाही से पैदा हुई स्थिति थी।
वकील सम्पूर्ण तिवारी कहते हैं … हम मैदान में खेलने आते हैं, कानून को जानते हैं, किसी से भिड़ने नहीं। लेकिन मैदान के एक कोने में शराब की बोतलें टकरा रही थीं और दूसरी तरफ खिलाड़ी नहीं, आवारा तत्व खड़े थे। यही असली खतरा था।
इस सवाल का जवाब आज भी हवा में लटका हुआ है कि आखिर हॉस्टल में बाहरी लोग रात देर तक क्यों थे। कौन उन्हें अंदर ला रहा था। किसकी अनुमति से वहां शराब पी जा रही थी। और सबसे बड़ा सवाल … खेल के नाम पर सरकारी परिसर में यह सब कब से चल रहा है।
हॉस्टल की कहानी – हमला हुआ, तोड़फोड़ हुई
हॉस्टल प्रबंधन की कहानी दूसरी है। मैनेजर आर.के. परिहार बताते हैं कि रात करीब 10 से 11 बजे के बीच भीड़ गेट तोड़कर अंदर घुसी। कमरों में मारपीट हुई, कूलर उखाड़े गए, कांच टूटे, और हॉस्टल लगभग जंग के मैदान में बदल गया। परिहार कहते हैं … अगर सामने आता, तो मुझे भी जान से मार देते।
उनका भय वास्तविक है। लेकिन सवाल यहां भी वही है … इतने लोग एक साथ कैसे इकट्ठा हो गए। और पुलिस किस समय पहुंची। दो घंटे तक अखाड़ा चलता रहा, लेकिन शहर की सुरक्षा व्यवस्था सोती रही।
कानून से जुड़े लोग अगर मैदान में हों और फिर भी कानून देर से पहुंचे, यह शहर के लिए भी सवाल है और प्रशासन के लिए भी।
CCTV बोलेगा, गवाह कोई नहीं
आजकल हर विवाद का आखिरी तर्क CCTV फुटेज होता है। पुलिस फुटेज खंगाल रही है। कुछ पहचान हो गई है। गिरफ्तारियां होंगी, और फिर राहत की सांस ली जाएगी।
लेकिन असली सवाल फुटेज में नहीं है, असली सवाल व्यवस्था में है।
फुटेज में दिखाई देंगे हमलावर, लेकिन दिखाई नहीं देगी वह लापरवाही, जिसकी वजह से यह हमला मुमकिन हुआ।
अंत में
इस पूरे विवाद में खेल हार गया। शहर हार गया। और सबसे ज्यादा कमजोर हुआ संवाद। वकील कानून के आदमी हैं, अदालतों में लड़ते हैं। खिलाड़ी मैदान में खेलते हैं। लेकिन जब राज्य की व्यवस्थाएं सो जाती हैं, तो दोनों ही समूह अपने-अपने औजारों से लड़ने पर मजबूर हो जाते हैं।
जबलपुर पूछ रहा है … खेल के मैदान को अखाड़ा किसने बनाया। और शराब को हॉस्टल तक किसने पहुंचाया।
कानून वकीलों के पास है। सुविधा हॉस्टल के पास है। लेकिन जिम्मेदारी आखिर किसके पास है … इस सवाल का जवाब अब भी अदालत के बाहर पड़े मैदान में घूम रहा है।
मुहम्मद अनवार बाबू
स्थानीय संपादक, रेवांचल टाइम्स