सहायक आयुक्त कार्यालय में भ्रष्टाचार का चल रहा है अजब गज़ब का खेल
लोकायुक्त ट्रैप के बाद भी भ्रष्टाचार बेखौफ

सहायक आयुक्त कार्यालय में ‘भ्रष्ट संरक्षण’ का खुला खेल….
दैनिक रेवांचल टाईम्स – मंडला। आदिवासी बाहुल्य जिले में भ्रष्टाचार भ्रस्ट तंत्र में जाँच एजेंसी अपना काम तो लगातार कर रही है पर उन भ्रस्टो पर ऊपर बैठे आकाओं ने अभयदान दे रहे हैं और भ्रस्टो को भ्रष्टाचार करने खुला छोड़ दिया जा रहा है जिससे वह शासकीय धन को लूट कर उन्हें भी उस धन से कुछ टुकड़े मिल सके ऐसा ही एक मामला मंडला जिले के सहायक आयुक्त कार्यालय में सामने आया है।
जहाँ सहायक आयुक्त कार्यालय में पदस्थ सहायक यंत्री नरेन्द्र श्रीगुप्ता को रिश्वत लेते जबलपुर की लोकायुक्त की टीम रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा और उनपर कार्यवाही भी की गई और प्रतिवेदन बनाकर जिला कलेक्टर को भी दिया पर चार माह बीतने के बाद भी श्री गुप्ता जी अपनी जड़ें मजबूत बनाये हुए है और आज भी चल रहे निर्माण कार्यों के बिल के भुगतान पर धड़ल्ले से अपने हस्ताक्षर कर अपना और अपने आकाओ के लिए ठेकेदार से कमीशन बटोरन के आरोप की विभाग में कानाफूसी जोरो पर चल रही हैं।
ये सवाल यह है कि ये कैसी कार्यावाही जो भ्रष्ट तंत्र के साथ जिला प्रशासन और सहायक आयुक्त मैडम कंधे से कन्धा मिलाकर चल रही है और उन्हें आज भी उनकी जिम्मेदारी से मुक्त नही किया जा रहा हैं आख़िर क्यों, जब बीते कुछ महीने पहले ही एक भ्रष्ट सहायक यंत्री को लोकायुक्त जबलपुर द्वारा रिश्वत लेते रंगेहाथ पक लिया गया है और जब शासन उनका स्थानंतरण (ट्रांसफार्मर) बुरहानपुर कर दिया है तो सहायक आयुक्त और कलेक्टर महोदय उन पर क्यों मेहरबानी बनाये हुए है और क्या नरेन्द्र गुप्ता के खिलाफ कार्रवाई के दावे कागजों तक ही सीमित नजर आ रहे हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि ट्रैप के बावजूद बीते तीन–चार महीनों में लगभग 10 करोड़ रुपये के बिल पास होने की जानकारी सामने आ रही है। लोकायुक्त जबलपुर ने इस संबंध में आधिकारिक पत्र भी जारी किया, फिर भी मंडला के सहायक आयुक्त कार्यालय में नियमों को खुलेआम ताक पर रखा जा रहा है।
नियम क्या कहते हैं, हकीकत क्या है?
नियमों के अनुसार लोकायुक्त ट्रैप के पश्चात संबंधित अधिकारी/कर्मचारी किसी भी शासकीय बिल, भुगतान या कार्य में संलग्न नहीं रह सकता। लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट है—चार महीने बाद भी बिलों का भुगतान धड़ल्ले से जारी है। सवाल यह है कि जब लोकायुक्त का पत्र मौजूद है, तो फिर किसके इशारे पर भुगतान हो रहे हैं?
सहायक आयुक्त का ‘अजीब मोह’
कार्यालय में चर्चा आम है कि सहायक यंत्री के प्रति सहायक आयुक्त का अतिरिक्त संरक्षण ही इस पूरे खेल की जड़ है। यही कारण है कि अन्य सहायक आज भी कार्यालय में बैठकर भ्रष्टाचार की जड़ें और मजबूत कर रहे हैं। इससे न सिर्फ शासन की साख पर सवाल उठ रहे हैं, बल्कि ईमानदार कर्मचारियों में भी भारी रोष है।
जिला प्रशासन की चुप्पी क्यों?
सबसे बड़ा प्रश्न जिला प्रशासन की भूमिका पर है। लोकायुक्त की कार्रवाई के बाद भी यदि भुगतान जारी हैं, तो यह प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि संरक्षण का मामला बनता है। क्या यह सब बिना शीर्ष स्तर की सहमति के संभव है?
कानूनी पहलू
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत ट्रैप के बाद कार्य/भुगतान में संलिप्तता दंडनीय।
मध्यप्रदेश वित्तीय नियम व विभागीय परिपत्रों के अनुसार, ट्रैप पश्चात किसी भी प्रकार का वित्तीय अधिकार प्रयोग तत्काल निलंबन/वर्जित।
लोकायुक्त के निर्देशों की अवहेलना अवमानना की श्रेणी में भी आ सकती है।
वही जबलपुर लोकायुक्त की कार्रवाई के बाद भी यदि करोड़ों के बिल पास हो रहे हैं, तो यह सिर्फ एक अधिकारी का नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की विफलता है। अब जरूरत है कि लोकायुक्त, संभागीय आयुक्त और राज्य शासन तत्काल हस्तक्षेप करें, भुगतान पर रोक लगे, जिम्मेदार अधिकारियों पर निलंबन व आपराधिक कार्रवाई हो—ताकि संदेश जाए कि भ्रष्टाचार पर शून्य सहनशीलता सिर्फ नारा नहीं, हकीकत है। अब देखना यह बाकी है कि क्या जिला प्रशासन और भ्रष्ट अधिकारियों के आका कब तक उन पर आशीर्वाद बनाये रखते हैं । जब शासन के आदेश से बरहानपुर ट्रांसफर होने के बाद भी रिलीव क्यों नहीं किया जा रहा है ये सवाल बना हुआ है।