मंडला में राजस्व व्यवस्था बेलगाम: पटवारी की मनमानी से आदिवासी ग्रामीण हलकान, कलेक्टर के आदेश भी हवा में
दैनिक रेवांचल टाईम्स – मंडला — आदिवासी बाहुल्य मंडला जिले में राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। जिले के मुखिया (कलेक्टर) द्वारा राजस्व अमले को समय पर जनता की समस्याओं के निराकरण के निर्देश दिए जाते रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है।
वही सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार मवई विकासखंड के हल्का नंबर 156, ग्राम पंचायत खालोड़ी में पदस्थ पटवारी शिवम तेकाम बीते तीन महीनों से अपने हल्का से लापता बताए जा रहे हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि पटवारी न तो पंचायत मुख्यालय में उपस्थित रहते हैं और न ही शासकीय कार्यों के लिए गांव आते हैं। स्थिति यह है कि ग्रामवासियों द्वारा बार-बार फोन लगाने के बावजूद फोन तक नहीं उठाया जा रहा, जिससे जरूरी राजस्व कार्य पूरी तरह ठप पड़े हैं।
शासकीय रिकॉर्ड अटके, ग्रामीण परेशान
पटवारी की अनुपस्थिति के कारण नामांतरण, बंटवारा, सीमांकन, खसरा-खतौनी सुधार जैसे आवश्यक कार्य महीनों से लंबित हैं। शासकीय रिकॉर्ड के अभाव में ग्रामीण योजनाओं का लाभ लेने से भी वंचित हो रहे हैं। आदिवासी बहुल क्षेत्र होने के बावजूद प्रशासनिक संवेदनशीलता का अभाव साफ नजर आ रहा है।
पूर्व सरपंच समेत कई ग्रामीणों ने उठाई आवाज
पूर्व सरपंच देव सिंह धुर्वे, आशीष बंजारा, पवन भांडे, सुनील शिवहरे, राम सिंह मरावी सहित ग्राम पंचायत के अनेक ग्रामीणों ने प्रशासन से शिकायत करते हुए कहा है कि बार-बार अवगत कराने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। ग्रामीणों का कहना है कि यदि पटवारी की यही मनमानी जारी रही तो उन्हें आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होना पड़ेगा।
सवालों के घेरे में प्रशासन
तीन महीने तक पटवारी का हल्का से नदारद रहना और उच्च अधिकारियों की ओर से कोई कार्रवाई न होना, प्रशासनिक लापरवाही और संरक्षण की आशंका को जन्म देता है। सवाल यह है कि क्या पटवारी पर कार्रवाई होगी या फिर आदिवासी ग्रामीणों की समस्याएं यूं ही फाइलों में दबकर रह जाएंगी?
कानून क्या कहता है
मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता के तहत पटवारी का नियमित रूप से हल्का में उपस्थित रहना अनिवार्य है।
शासकीय कर्तव्यों में लापरवाही मध्यप्रदेश सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 का स्पष्ट उल्लंघन है।
लापता रहकर कार्य बाधित करना अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है, जिस पर निलंबन तक की कार्रवाई संभव है।
वही अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस मामले में कब तक संज्ञान लेता है, या फिर आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र की आवाज़ एक बार फिर अनसुनी कर दी जाएगी।