सीमांकन में खुली मनमानी आरआई पटवारी की लापरवाही से किसान त्रस्त जनसुनवाई तक पहुँच गया मामला

रेवांचल टाइम्स मंडला राजस्व विभाग में बैठी कुर्सियों की ताकत किस तरह आम किसानों की जिंदगी पर भारी पड़ती है, इसका ताजा उदाहरण मंडला तहसील के ग्राम फूलसागर से सामने आया है। यहां एक वैध कृषक अपनी ही निजी कृषि भूमि के सीमांकन के लिए महीनों से अधिकारियों के आगे हाथ जोड़ता रहा, लेकिन आरआई और पटवारी की लापरवाही, टालमटोल और मनमानी के चलते उसे आखिरकार कलेक्टर जनसुनवाई का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
यह मामला न सिर्फ एक किसान की पीड़ा का है, बल्कि पूरे राजस्व तंत्र की कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है।आवेदक अरविंद पाण्डे पिता गणेश पाण्डे, निवासी ग्राम सागर पोस्ट फूलसागर, तहसील मंडला, अपनी कृषि भूमि खसरा क्रमांक 436/6/1 एवं 436/6/2, रकबा 0.0900 हेक्टेयर एवं 0.0100 हेक्टेयर के सीमांकन के लिए पिछले महीनों से भटक रहा है। यह भूमि राजस्व रिकॉर्ड में विधिवत दर्ज है और भूमि स्वामी के रूप में श्यामकली बाई पति गणेश प्रसाद का नाम दर्ज है, जो कि आवेदक की सगी माता हैं। इसके बावजूद भी अधिकारियों द्वारा इसे “विवादित” बताकर लगातार टाल दिया गया।
आवेदक ने दिनांक 15 अक्टूबर 2025 को तहसील कार्यालय मंडला में सीमांकन हेतु विधिवत आवेदन प्रस्तुत किया था। नियमों के अनुसार सीमांकन एक समय-सीमा में किया जाना चाहिए, लेकिन इस मामले में नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई गईं। नाप-जोख के लिए लगभग 5 से 6 बार नोटिस जारी किए गए, लेकिन हर बार सीमांकन की तारीख केवल कागजों तक सीमित रह गई।
कभी कहा गया कि जमीन विवादित है, कभी पुलिस बल की जरूरत बताई गई। जब पुलिस व्यवस्था की बात सामने आई तो तहसीलदार मंडला द्वारा पुलिस बल उपलब्ध भी करा दिया गया। इसके बावजूद भी संबंधित आरआई जित्तू बैरागी एवं पटवारी प्रज्ञा पाण्डे मौके पर नहीं पहुंचे और सीमांकन नहीं किया गया। सवाल यह है कि जब प्रशासन ने पुलिस व्यवस्था तक कर दी, तो फिर किस दबाव या स्वार्थ में सीमांकन रोका गया?
सूत्रों से प्राप्त जानकारी अनुसार सीमांकन में जानबूझकर देरी की जा रही है। आवेदक का स्पष्ट आरोप है कि अधिकारी बार-बार तारीख देते हैं, लेकिन न तो मौके पर पहुंचते हैं और न ही कोई ठोस कारण बताते हैं। यह स्थिति केवल लापरवाही नहीं, बल्कि अपने पद का दुरुपयोग प्रतीत होती है।सीमांकन में हो रही इस अनावश्यक देरी से आवेदक को यह आशंका सताने लगी है कि कहीं भूमि के नक्शे और राजस्व अभिलेखों में छेड़छाड़ न कर दी जाए। ग्रामीण क्षेत्रों में यह कोई नई बात नहीं है कि देरी का फायदा उठाकर रिकॉर्ड में हेरफेर की जाती है। यही कारण है कि आवेदक मानसिक तनाव में है और अपनी ही जमीन को लेकर असुरक्षित महसूस कर रहा है।
यहां यह समझना जरूरी है कि सीमांकन केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं है। यह किसान के अधिकार, उसकी जमीन की सुरक्षा और उसकी आजीविका से जुड़ा विषय है। सीमांकन नहीं होने से किसान न तो अपनी जमीन पर निश्चिंत होकर खेती कर सकता है और न ही कोई अन्य कार्य कर सकता है। इस मामले में भी आवेदक को आर्थिक नुकसान के साथ-साथ गहरी मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ रही है।
लगातार अनदेखी और व्यवहार से तंग आकर आखिरकार आवेदक अरविंद पाण्डे को कलेक्टर जनसुनवाई में शिकायत दर्ज करानी पड़ी। जनसुनवाई में अधिकारियों ने औपचारिकता निभाते हुए “जल्द कार्यवाही” का आश्वासन जरूर दिया, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह आश्वासन भी बाकी आश्वासनों की तरह हवा में ही रहेगा।
सूत्रों की माने तो कि यह कोई एक मामला नहीं है। क्षेत्र में आए दिन सुनने को मिलता है कि किसानों को जमीन से जुड़े कार्यों के लिए कई-कई बार तहसील कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ते हैं। आवेदन, निवेदन और समय लेने के बावजूद कार्य नहीं होते। इससे साफ जाहिर होता है कि राजस्व विभाग में जवाबदेही नाम की कोई चीज नहीं बची है।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि जब एक साधारण सीमांकन के लिए महीनों तक एक किसान को भटकना पड़े, तो फिर प्रशासन आम जनता को क्या संदेश दे रहा है क्या आरआई और पटवारी खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं क्या नियम और समय-सीमा केवल आम जनता के लिए हैं, अधिकारियों के लिए नहीं
आवेदक ने कलेक्टर से स्पष्ट मांग की है कि उसकी भूमि का तत्काल सीमांकन कराया जाए और इस पूरे मामले में संबंधित आरआई एवं पटवारी की भूमिका की जांच की जाए। साथ ही भविष्य में इस तरह की मनमानी पर रोक लगाने के लिए कड़े निर्देश जारी किए जाएं।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रशासन इस मामले में वास्तव में सख्ती दिखाता है या फिर यह मामला भी फाइलों में दबाकर किसान को उसके हाल पर छोड़ दिया जाएगा। यदि समय रहते सीमांकन नहीं किया गया, तो यह सिर्फ एक किसान के अधिकारों का हनन नहीं होगा, बल्कि यह साबित करेगा कि राजस्व विभाग में बैठी कुर्सियां आज भी आम जनता से ज्यादा ताकतवर हैं।