भुआबिछिया में नेशनल लोक अदालत आयोजित, कई वर्षों पुराने विवादों का हुआ समाधान

दैनिक रेवांचल टाइम्स – मंडला/बिछिया।राष्ट्रीय स्तर पर न्यायालयों में लंबित मामलों के त्वरित निराकरण और आपसी समझौते को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शनिवार को भुआबिछिया में नेशनल लोक अदालत का आयोजन किया गया। यह आयोजन राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण नई दिल्ली एवं मध्यप्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण जबलपुर के मार्गदर्शन तथा प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश एवं अध्यक्ष जिला विधिक सेवा प्राधिकरण मंडला कमल जोशी के आदेशानुसार तहसील विधिक सेवा समिति बिछिया के तत्वावधान में संपन्न हुआ।
कार्यक्रम का शुभारंभ न्यायिक मजिस्ट्रेट मीनल गजबीर द्वारा मां सरस्वती के तैल चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर किया गया। लोक अदालत में न्यायालय में लंबित राजीनामा योग्य प्रकरणों को रखा गया, जिनका आपसी सहमति से निराकरण कराया गया।
लोक अदालत के दौरान 7 सिविल एवं 13 आपराधिक प्रकरणों का सफलतापूर्वक निपटारा किया गया, जिससे 57 पक्षकारों को राहत मिली। इसके अलावा बैंकों और नगर परिषद भुआबिछिया से संबंधित प्री-लिटिगेशन प्रकरण भी लोक अदालत में रखे गए, जिनका निराकरण करते हुए कुल 9,08,620 रुपये की राशि का अवार्ड पारित किया गया।
इस अवसर पर अध्यक्ष अधिवक्ता संघ विजय चौरसिया, सचिव पीयूष पांडेय, बलराम शर्मा, जेपीएन मिश्रा, थानेश्वर तेकाम, संदीप पटेल, मिलाप धुर्वे, दिलीप कोरवे, विनय यादव, योगेश तेकाम, कमलवती यादव, राजेंद्र बंजारा सहित अन्य अधिवक्तागण, एडीपीओ कामेंद्र सिंह परस्ते, विभिन्न विभागों के अधिकारी तथा न्यायालय के कर्मचारी उपस्थित रहे।
वर्षों पुराना पड़ोसियों का विवाद भी हुआ समाप्त
लोक अदालत के दौरान नगर पंचायत भुआबिछिया के वार्ड क्रमांक 14 के दो पड़ोसी अनिल यादव और रोहित यादव के बीच लंबे समय से चल रहा विवाद भी आपसी समझाइश से समाप्त हो गया। बताया जाता है कि दोनों के बीच 2 मई 2024 को विवाद हुआ था, जिसके बाद न्यायालय में प्रकरण क्रमांक 207/24 विचाराधीन था।
नेशनल लोक अदालत में न्यायिक मजिस्ट्रेट मीनल गजबीर, एडीपीओ कामेंद्र परस्ते तथा अभियुक्त पक्ष के अधिवक्ता विजय चौरसिया द्वारा दोनों पक्षों को समझाइश दी गई। इसके बाद दोनों पक्षकारों ने आपसी सहमति से राजीनामा कर लिया और भविष्य में सौहार्दपूर्ण ढंग से रहने का संकल्प लिया।
लोक अदालत के माध्यम से वर्षों पुराने विवादों का शांतिपूर्ण समाधान होने से न्यायालय का समय बचा, साथ ही पक्षकारों को त्वरित न्याय भी प्राप्त हुआ।