संम्बल कार्ड की लापरवाही बनी अभिशाप, मृत श्रमिक के परिजन दर-दर भटकने को मजबूर
जिम्मेदारों की उदासीनता पर उठे सवाल, जिला प्रशासन कटघरे में
दैनिक रेवांचल टाईम्स, मंडला:मंडला जिले के ग्राम घाघा से सामने आया एक मार्मिक मामला न सिर्फ व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर करता है, बल्कि यह भी सवाल खड़ा करता है कि आखिर गरीब और श्रमिक वर्ग के लिए बनी योजनाएं कागजों तक ही क्यों सीमित रह जाती हैं। एक मृत श्रमिक के परिवार को संबल योजना का लाभ न मिलना प्रशासनिक लापरवाही की गंभीर तस्वीर पेश कर रहा है।
पीड़ित पिता हरिचंद यादव ने कलेक्टर जनसुनवाई में आवेदन देकर बताया कि उनके पुत्र अनूप यादव ने संबल कार्ड के लिए आवेदन किया था और कार्ड बन भी चुका था, लेकिन ग्राम पंचायत स्तर पर पदस्थ रोजगार सहायक की लापरवाही के चलते वह कार्ड उन्हें कभी सौंपा ही नहीं गया।
विडंबना यह रही कि इसी बीच मजदूरी करने नागपुर गए अनूप यादव की एक दुर्घटना में मौत हो गई। अब परिवार के सामने दोहरी मार है—एक ओर जवान बेटे की मौत का गम, तो दूसरी ओर शासन की योजनाओं से वंचित रहने का दर्द।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब संबल कार्ड बन चुका था, तो उसे हितग्राही तक पहुंचाने में आखिर किसकी जिम्मेदारी थी? और क्यों यह जिम्मेदारी निभाई नहीं गई? क्या यह सीधी-सीधी लापरवाही नहीं, जिसने एक गरीब परिवार को उसके अधिकार से वंचित कर दिया?
परिजनों का आरोप है कि यदि समय रहते संबल कार्ड मिल जाता, तो उन्हें शासन की आर्थिक सहायता और अन्य लाभ मिल सकते थे, जिससे इस कठिन समय में कुछ सहारा मिल जाता। लेकिन जिम्मेदारों की बेरुखी ने इस परिवार को पूरी तरह असहाय बना दिया है।
यह मामला जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। क्या प्रशासन को ऐसी घटनाओं की जानकारी नहीं होती, या फिर जानबूझकर अनदेखी की जाती है? आखिर कब तक गरीब और जरूरतमंद योजनाओं के नाम पर ठगे जाते रहेंगे?
हरिचंद यादव ने प्रशासन से मांग की है कि उनके पुत्र का संबल कार्ड तत्काल उपलब्ध कराया जाए, मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और दोषी कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस गंभीर और संवेदनशील मामले में क्या कदम उठाता है—क्या पीड़ित परिवार को न्याय मिलेगा या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि योजनाएं भले ही बनाई जाती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर लापरवाही ही गरीबों की सबसे बड़ी दुश्मन बनी हुई है।