पंचायत दर्पण ऐप पर खुला फर्जीवाड़े का बड़ा खेल!

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धुंधले बिल, गायब विवरण और कोरे कागज – क्या पारदर्शिता सिर्फ दिखावा है? या फिर सरकारी धन लूटने के लिए

“पारदर्शिता और जवाबदेही का दावा करने वाला पंचायत दर्पण ऐप खुद बना अनियमितताओं का गढ़?”

दैनिक रेवांचल टाइम्स – मंडला, आदिवासी बहुल्य जिला मंडला में सरकार आदिवासियों के विकास और मुलभूत सुविधाओं के प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रही हैं, पर विकास आज भी वही की वही है कुछ भी फर्क नजर नही आ रहा हैं और सरकार आये दिन जनता और सरकार की बीच पारदर्शिता के चलते सभी कार्य ऑनलाईन और पोर्टल बना रही कि साथ ही निर्माण कार्यो के जियो टेक करके उन्हें पोर्टल में अप डेट करना होता फिर बिल के माध्यम सरकारी राशि आहरण कर ली जाती है पर आज वह ऑनलाइन पोर्टल ही ग्राम पंचायतों में लूट का अड्डा बन गया है।
प्रदेश की ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों की निगरानी और वित्तीय पारदर्शिता के उद्देश्य से तैयार किया गया पंचायत दर्पण ऐप अब खुद सवालों के घेरे में है। हाल ही में की गई पड़ताल में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं – कई पंचायतों ने खरीदी गई सामग्री के जो बिल अपलोड किए हैं, वे या तो धुंधले हैं, अपठनीय हैं या फिर सिर्फ कोरे कागज की तस्वीरें हैं।

फर्जी बिल अपलोड – घोटाले की बुनियाद तैयार?

ऐप पर अपलोड किए गए कई दस्तावेज़ इस हद तक धुंधले हैं कि उनमें सामग्री का नाम, रेट, मात्रा तक स्पष्ट नहीं दिखता। कुछ मामलों में तो दस्तावेज़ों में कोई जानकारी ही नहीं – केवल खाली पन्ने की तस्वीर लगाई गई है। यह तकनीकी गड़बड़ी नहीं, बल्कि जानबूझकर की गई छुपाने की कोशिश लगती है।

जब डिजिटल सिस्टम ही बन जाए भ्रष्टाचार का माध्यम

> “जिस ऐप का उद्देश्य ग्रामीण विकास की निगरानी और पारदर्शिता था, उसी का उपयोग अब गड़बड़ी छुपाने के लिए हो रहा है।”

यह सवाल भी उठता है कि इन सभी अनियमितताओं को देखने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी मौन क्यों हैं?

कहाँ हैं जनपद और जिला पंचायत अधिकारी?

जनपद सीईओ,
जिला पंचायत सीईओ,
और विभागीय मॉनिटरिंग टीमें,

इन सभी की जिम्मेदारी है कि वे पंचायत दर्पण ऐप की रिपोर्ट्स पर नजर रखें। फिर ऐसी बड़ी गड़बड़ी कैसे छूट रही है?
क्या यह अधिकारियों की लापरवाही है, या फिर पूरा तंत्र ही इस ‘खेल’ में शामिल है?

क्या जरूरी नहीं हो गया है सख्त नियंत्रण?

अब वक्त है कि राज्य सरकार और पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग गंभीरता से इस मामले में कार्रवाई करे:

सुधाव के लिए जरूरी कदम:

1. केवल स्पष्ट और पढ़ने योग्य बिल ही अपलोड हों, अन्यथा रिजेक्ट किए जाएं।
2. फर्जी या अस्पष्ट दस्तावेज पाए जाने पर संबंधित सचिव या सहायक पर आर्थिक दंड या निलंबन जैसी सख्त कार्रवाई हो।
3. हर त्रैमासिक रिपोर्ट में ऐप पर डाले गए दस्तावेजों की क्वालिटी चेक की जाए।
4. जनता के लिए ‘शिकायत’ बटन जोड़ा जाए, जिससे वे गलत दस्तावेज़ों पर आपत्ति दर्ज करा सकें।

अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई तो…?

यदि अब भी जिम्मेदार अधिकारी चुप रहते हैं, तो साफ है – यह सिर्फ एक तकनीकी गड़बड़ी नहीं, बल्कि एक संगठित घोटाले की शुरुआत है।

क्या आप भी उठाएंगे आवाज़?

पंचायतों की गड़बड़ी केवल ग्रामीण जनता का मुद्दा नहीं, यह जनता के पैसों की बर्बादी और ग्राम विकास में अवरोध है।
अब समय है, जब हम सब मिलकर पंचायत दर्पण जैसे ‘शासन के आईने’ को साफ और ईमानदार बनाने की मुहिम छेड़ें।

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