स्मार्ट सिटी में संविदा का सिंडिकेट!

रवि राव के इशारे पर चल रहा सिस्टम, अधिकारियों की मिलीभगत से लाखों की फाइलें निपटाई जा रहीं!
दैनिक रेवांचल टाइम्स जबलपुर |मुख्यमंत्री की चेतावनी भी बेअसर: भ्रष्टाचार पर नहीं लग रही लगाम
प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री खुद जबलपुर स्मार्ट सिटी में हो रहे भ्रष्टाचार को उजागर कर चुके हैं। उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि इस पूरे मामले की जांच कर दोषियों पर कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए। लेकिन, हालात जस के तस हैं। स्मार्ट सिटी का सिस्टम अभी भी चंद संविदा कर्मियों और रसूखदार अधिकारियों के इशारों पर चल रहा है।
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‘संविदा सम्राट’ रवि राव: नोटिस भी जारी, वेतन भी पास!
नगर निगम आयुक्त की शिकायत के आधार पर 11 कर्मचारियों को सेवा समाप्ति का नोटिस भेजा जाना था। लेकिन, आफिस मैनेजर सौरभ दीक्षित को छोड़ दिया गया और 10 लोगों को नोटिस थमा दिया गया। जिन कर्मचारियों को नोटिस मिला, वे कोर्ट पहुंचे। कोर्ट ने इनमें से 7 को राहत दी, लेकिन रवि राव ने ऐसा भ्रम फैलाया कि जिन कर्मचारियों को कोर्ट से राहत नहीं मिली, उन्हें भी वेतन जारी करवा दिया गया।
कोर्ट के आदेश की अवहेलना? या भ्रष्ट गठजोड़ की कारस्तानी?
जिन तीन कर्मचारियों — सौरभ दीक्षित, कैलाश भाटी और केएल कांवरे — को कोर्ट ने कोई राहत नहीं दी, उन्हें भी वेतन भुगतान कर दिया गया। इस गलत भुगतान से स्मार्ट सिटी को लगभग 5 लाख रुपए की चपत लगी है। अब बड़ा सवाल ये है — इस राशि की वसूली किससे होगी? और क्यों रवि राव जैसे संविदा कर्मचारी को इतनी शक्ति प्राप्त है?
‘सुपर सीईओ’ रवि राव: किसे ठेका मिलेगा, कौन रहेगा बाहर – सब कुछ इनके हाथ में!
सूत्रों की मानें तो रवि राव तय करते हैं कि किसे कौन सा काम मिलेगा। कोई भी फाइल बिना उनकी जानकारी के नहीं चलती। हैरानी की बात ये है कि जिन फाइलों में उच्चस्तरीय स्वीकृति जरूरी है, वे भी रवि राव द्वारा सीधे ‘निपटा’ दी जाती हैं। ये संविदा कर्मचारी अब स्मार्ट सिटी के अधिकारियों पर भारी पड़ रहा है।
कन्वेंशन सेंटर चोरी मामला भी दबा दिया गया?
कभी सुर्खियों में रहा कन्वेंशन सेंटर चोरी प्रकरण — जिसमें हार्ड डिस्क से छेड़छाड़ के ठोस प्रमाण थे — आज पूरी तरह ठंडे बस्ते में है। रवि राव सहित अन्य अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगे थे, लेकिन कार्रवाई के नाम पर शून्य। स्मार्ट सिटी की छवि साफ करने की बजाय, इसे और गंदा करने में ही जुटे हैं कुछ रसूखदार नाम।
स्मार्ट सिटी या आरामगाह? सीईओ की गैरहाजिरी बना भ्रष्टाचार की ढाल
सीईओ अनुराग सिंह को गोरखपुर का एसडीएम भी बना दिया गया है। गोरखपुर में काम का दबाव अधिक होने के चलते वे शायद ही कभी स्मार्ट सिटी कार्यालय में दिखते हैं। नतीजा? स्मार्ट सिटी ऑफिस ‘बिना कप्तान की टीम’ जैसा बन चुका है, जहां कर्मचारी बेलगाम होकर काम कर रहे हैं।
दोहरी पोस्टिंग, दोहरी मलाई!
कुछ अधिकारी ऐसे भी हैं जो स्मार्ट सिटी में और नगर निगम में एक साथ तैनात हैं। यानी सरकारी मलाई दो तरफ से चट की जा रही है — जवाबदेही शून्य और भ्रष्टाचार असीम!
सवाल उठता है:
क्या संविदा कर्मचारी प्रशासन से ऊपर हो गया है?
क्या सीईओ की अनुपस्थिति ही भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रही है?
क्या नगर निगम और स्मार्ट सिटी के जिम्मेदार आंखें मूंद कर बैठे हैं?
जब शीर्ष स्तर से लेकर निचले पायदान तक जवाबदेही की बजाय सांठगांठ हो, तो स्मार्ट सिटी नहीं, “घोटाला सिटी” बन जाती है। शासन और प्रशासन को चाहिए कि तत्काल सख्त कार्रवाई करें — नहीं तो भ्रष्टाचार का यह जाल और गहराता जाएगा।