ये वर्दी अब इंसाफ नहीं, इशारों पर नाच रही है! घुघरी थाना प्रभारी की हिटलरशाही, सवाल पूछने पर पत्रकार को धमकाने का शर्मनाक प्रयास

ये है वो खबर जिससे मैडम तिलमिला गयी 

जब कानून की वर्दी वफ़ादारी से उतरकर अहंकार ओढ़ ले, जब संविधान की शपथ लेने वाला “मैं कौन हूं ये मत भूलना” की भाषा बोलने लगे …. तब समझ लीजिए लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को कुचलने की साजिश शुरू हो चुकी है।
मंडला के घुघरी थाना प्रभारी पूजा बघेल का रवैया भी कुछ ऐसा ही है …. सत्ता और ठेकेदारों के गठजोड़ में लिपटी पुलिस, जिसे न कानून की परवाह है, न पत्रकारों के अधिकार की।
खबर छपी, तो गरज उठीं थाना प्रभारी
24 जुलाई को रेवांचल टाइम्स में एक खबर प्रकाशित होती है …. जिसमें स्थानीय शराब ठेकेदारों द्वारा खुलेआम गाड़ियों में भर-भरकर गांव-गांव शराब पहुंचाने की बात उजागर की जाती है। यह खबर घुघरी थाना क्षेत्र की पोल खोलती है, उस पुलिस की नाकामी उजागर करती है, जो कागजों पर शराबबंदी की मुहिम चला रही थी और जमीन पर नशे का साम्राज्य फैलने दे रही थी।
खबर छपी तो होना यह चाहिए था कि थाना प्रभारी जांच करतीं, दोषियों पर कार्रवाई करतीं।
लेकिन घुघरी थाना प्रभारी ने चुना डराने-धमकाने का रास्ता।
“तुम कौन होते हो बताने वाले?”
26 जुलाई को शाम करीब 6 बजे, पत्रकार को कॉल आता है …. “क्या अनाप-शनाप खबरें छाप रहे हो… थाने आओ।”
28 जुलाई को जब पत्रकार थाने पहुंचा, तो थाना प्रभारी पूजा बघेल अपने केबिन में बुलाकर धमकी देने पर उतर आईं।
पूछा गया …. “तुम्हें कैसे पता कहाँ-कहाँ शराब बिक रही है?”
और फिर सीधे धमकी …. “अगर जो नाम तुम बताओगे, वहां शराब नहीं मिली, तो तुम पर झूठा केस बनेगा।”
यहां तक कहा गया कि “हम वहीं जाकर कहेंगे कि इस पत्रकार ने ही तुम्हारा नाम दिया है। जो होगा, तुम्हीं भुगतना!”
ये कैसी पुलिस है?
क्या अब पत्रकार का काम खबर छापना नहीं, पुलिस के लिए मुखबिरी करना है?
क्या थाना प्रभारी अब “खबर मत छापो” के बदले “जेल भेज देंगे” की भाषा बोलेंगे?
यह घटना सिर्फ एक पत्रकार को धमकाने की कोशिश नहीं, ये पुलिसिया तंत्र की उस गंदी सोच की नुमाइश है जो आज भी वर्दी को सत्ता का हथियार समझती है।
पूजा बघेल का रवैया बताता है कि खबर छापने वाले को अपराधी घोषित करना, और ठेकेदारों से आँख मूंद लेना …. घुघरी थाने की नीति बन चुकी है।
पत्रकार को बना दिया टारगेट
थाना प्रभारी का कहना …. “बाकी कोई पत्रकार शराब पर खबर नहीं लगाता, सिर्फ तुम क्यों?”
क्या अब खबर छापने का भी कोटा बांटा गया है?
क्या पत्रकार अब सिर्फ वही छापेंगे, जो वर्दीधारी चाहें?
और अगर कोई पत्रकार जनता के हक़ में, नशे के खिलाफ, ज़मीन की सच्चाई छापता है …. तो उसे झूठे केस में फंसाने की धमकी दी जाएगी?
गृहमंत्रालय के आदेश भी ताक पर
मध्यप्रदेश पुलिस मुख्यालय का साफ निर्देश है कि पत्रकारों पर अगर कोई मामला बनता है, तो उसकी जांच एसपी और डीआईजी स्तर पर होनी चाहिए।
लेकिन घुघरी थाना प्रभारी के लिए ये आदेश शायद सिर्फ रद्दी कागज़ हैं।
वरना क्या ऐसा होता कि एक खबर छापने के बदले, रिपोर्टर पर थाने में बैठाकर “सबक सिखाने” की धमकी दी जाती?
सवाल जनता से है
क्या हम एक ऐसा समाज बनने जा रहे हैं, जहाँ ठेकेदारों की अवैध शराब पर रिपोर्ट करने वाला डर कर चुप हो जाए?
क्या हमारी पुलिस अब माफिया की ढाल बन गई है?
क्या लोकतंत्र में चौथा स्तंभ अब थाना प्रभारी के इशारे पर काम करेगा?
जिम्मेदार चुप क्यों हैं?
रेवांचल टाइम्स की टीम ने पुलिस अधीक्षक मंडला से संपर्क किया …. लेकिन उन्होंने कॉल तक रिसीव नहीं किया।
बालाघाट रेंज के आईजी संजय सिंह ने ज़रूर भरोसा दिया कि “झूठी कार्रवाई नहीं होगी” …. लेकिन क्या एक बयान से पत्रकार सुरक्षित हो जाएगा?
ये सिर्फ धमकी नहीं, ये लोकतंत्र पर हमला है
जब भी कोई पुलिस अफसर “खबर छापने से पहले सोच लेना” की भाषा बोलता है …. समझ लीजिए वो वर्दी नहीं, डर का कारोबार चला रहा है।
घुघरी थाना प्रभारी पूजा बघेल की इस पूरी हरकत ने यह साफ कर दिया है कि अब पत्रकारिता करने का मतलब है …. खुद को झूठे केस के लिए तैयार रखना।
रेवांचल टाइम्स इस भय और दबाव की संस्कृति के खिलाफ खड़ा रहेगा।
क्योंकि एक पत्रकार अगर डर गया …. तो समाज का सच दम तोड़ देगा।
“पूछते रहो, छापते रहो, डरना मना है…”
मुकेश श्रीवास

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