शहरीकरण और संस्कृति के बदलते दौर में खोता रिश्तों का असली मर्म

(माता पिता ,रिश्तेदार,भाई बहन,पति पत्नी को रहना होगा सचेत)

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रेवाँचल टाईम्स – हाल ही में संसद में प्रस्तुत किए गए सरकारी आंकड़े एक भयावह तस्वीर पेश करते हैं:,देश भर की पारिवारिक अदालतों (Family Courts) में तलाक के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और लाखों केस लंबित हैं। अंतराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान मुंबई विश्विद्यालय के एलुमनाई शहरी प्लानिंग रिसर्चर एवं लाइफ कोच डॉ नयन प्रकाश गांधी बताते है कि यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि हमारे समाज के दरकते ताने-बाने का प्रमाण है। वर्तमान समय में प्रत्येक पारिवारिक समाज में महत्वपूर्ण परिवर्तन हो रहे हैं। जाति ,गौत्र से दूर आज की जनरेशन उच्च शिक्षा के समय ही मित्रता में फसते जा रहे है ।अधिकतर समाजों में अब रिश्ते पैकेज के आधार पर हो रहे है ,न कि नैतिक गुणों ,पारिवारिक मूल्यों के आधार पर ,पुरुष की तुलना में अब महिलाएं अपने जीवन में भौतिक सुख सुविधाओं से लैस होती जा रही है ,जो कि दिखावे परस्त जीवन ,सोशल मीडिया से एक दूसरे के जीवन तौर तरीकों ,ट्रेंड को फॉलो करने का नतीजा है ।
एक समय था जब रिश्ते, विशेषकर विवाह, पवित्रता, प्रेम और आपसी समर्पण की नींव पर टिके होते थे। लेकिन आज की तथाकथित ‘मॉडर्न’ सोच ने इस पवित्र बंधन की परिभाषा ही बदल दी है। आज परिवार और समाज में ‘अपनेपन’ की भावना खत्म हो रही है और उसकी जगह एक-दूसरे से हटकर दिखने की होड़ ने ले ली है। द्वेषपूर्ण नकल कर एक-दूसरे को नीचा दिखाना आम बात हो गई है। यह जलन अब घर की दहलीज़ भी लांघ चुकी है, जहाँ अक्सर ननदें अपनी भाभी की तरक्की या जीवनशैली से जलने लगी हैं। समाज में आज शादी-समारोहों में पारंपरिक रस्मों की जगह दिखावटी फूहड़ता ने ले ली है और रिश्तों के लेन-देन में भी अब प्यार नहीं, बल्कि व्यक्ति का ‘लेवल’ और ‘स्टेटस’ देखा जाने लगा है।इस समस्या की एक बड़ी जड़ माता पिता की दोहरी मानसिकता में है जिसे आज के आधुनिक दिखावटी युग ने बदलकर रख दिया है ,एक माता पिता ,ननदें अपनी बहुओं ,भाभी को तो अदब में ,कंट्रोल में रखना पसंद करते है और जब उनकी बेटी की बात आती है तो इसके उलट जीवन शैली की मानसिकता समाज में परोसी जाती है ,अब बताए समस्या दोहरी मानसिकता में है न कि आज के वातावरण , शिक्षा और पारिवारिक परवरिश में । हम अपनी बेटियों को आत्मनिर्भर बनने, अपने अधिकारों के लिए लड़ने की शिक्षा तो देते हैं, जो कि बहुत ज़रूरी है, लेकिन शायद हम उन्हें ज़िम्मेदारियों और समर्पण का पाठ पढ़ाना भूल जाते हैं। नतीजा यह होता है कि जब किसी रिश्ते में अपेक्षाएँ पूरी नहीं होतीं, तो उसे तोड़ने में एक पल भी नहीं लगता। यह केवल एक रिश्ते का अंत नहीं, बल्कि भरोसे और त्याग का अपमान है।क्या आत्मनिर्भरता का मतलब अहंकार या स्वार्थ है? जब कोई रिश्ता सिर्फ इसलिए टूट जाता है क्योंकि एक साथी अब ‘इंडिपेंडेंट’ हो गया है, तो यह आत्मनिर्भरता नहीं, बल्कि नार्सिसिज्म (आत्ममुग्धता) है।समाज को यह समझना होगा कि रिश्ते कोई प्रतियोगिता नहीं हैं, जहाँ किसी एक को जीतना और दूसरे को हारना है। हमें अपनी युवा पीढ़ी को किताबी ज्ञान के साथ-साथ नैतिक मूल्य और ज़िम्मेदारी का पाठ भी पढ़ाना होगा। गांधी ने बताया पूरे देश भर के आंकड़ों पर गौर करते हुए बताया कि न्याय विभाग(Department of Justice), भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार, देश भर में पारिवारिक अदालतों में 11 लाख से भी ज़्यादा वैवाहिक मामले लंबित हैं, जिनमें तलाक, गुजारा भत्ता आदि शामिल हैं। राजस्थान में भी 52,341 से अधिक वैवाहिक मामले लंबित हैं, जो राज्य को देश के उन शीर्ष राज्यों में शामिल करता है जहाँ बड़ी संख्या में पारिवारिक विवाद अदालतों में चल रहे हैं। शहरीकरण, वैश्वीकरण और तकनीकी प्रगति ने पारंपरिक पारिवारिक मूल्यों और रिश्तों को प्रभावित किया है।आज के युवा पीढ़ी में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता और व्यक्तिगत विकास पर अधिक जोर दिया जा रहा है, जो कभी-कभी पारिवारिक बंधनों और रिश्तों की कीमत पर आता है। शहरीकरण ने शहरों में रहने वाले लोगों के पास अधिक अवसर और चुनौतियाँ पैदा की हैं, जो पारिवारिक रिश्तों को प्रभावित कर सकती हैं। वैश्वीकरण ने पारंपरिक मूल्यों और रिश्तों को बदल दिया है, और नए विचारों और मूल्यों को पेश किया है। तकनीकी प्रगति ने लोगों के संवाद और रिश्तों को बदल दिया है, जिससे रिश्तों में परिवर्तन आया है।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता पर अधिक जोर दिया जा रहा है, जो कभी-कभी पारिवारिक बंधनों और रिश्तों की कीमत पर आता है। अपेक्षाओं में वृद्धि और संवाद की कमी भी रिश्तों में समस्याएँ पैदा कर सकती है। आज माता-पिता को समझना होगा कि पहले वाले दौर से निकलकर सोच बदलनी होगी। ननद को भी नैतिकता से समझना होगा कि आज जो द्वेषता पूर्ण भाभी को नीचा दिखा रही है परिवारों में लड़ाई करवा रही है कल से उसकी बेटी के साथ भी वह होकर रहेगा । आज बहुओं को समझना होगा कि अगर वह अपने सास ससुर को बोझ समझती है तो स्वाभाविक है उनके माता पिता को भी उनकी भाभी बोझ रूपी सास ससुर मानेगी ।आज समय है परिवार के हर सदस्य मामा मामी ,चाचा चाची, भाई बहन, भाभी ,दादा दादी आज जो आप व्यवहार करोगे उसका परिणाम कर्म लौटकर जरूर आएगा । आज सालों साल से लाखों रिश्ते कोर्ट कचहरी में पड़े है ,अंत में रिश्ते को बनाना ही समाधान है ।जिसने रिश्ता तुड़वाया है न तो एक खुश है और जिसने रिश्ता तोड़ा न वो खुश है ,बाद में तनाव में रहकर जीवन लीला समाप्त ही उस रिश्ते की अंतिम गति होती है। हा आज के शिक्षित आधुनिक युग में पति को पत्नी का और पत्नी को पति का सम्मान करना ही होगा। समानता के समय में दोनों को साथ मिलकर आगे बढ़ना होगा घर व्यवसाय सभी में मिल कर हाथ बटाना होगा । ये भी देख गया है कि अगर कोई पति पत्नी हर कार्य को मिलकर करते हे हर स्तर पर एक दूसरे के सम्मान करते है ,समानता के साथ आगे बढ़ते है तो उनकी खुशी को आज की ननदें या अन्य खुरापाती रिश्तेदार जो कि लगभग हर परिवार में बिगाड़ने का काम करती है उन सभी को दोहरी मानसिकता को खत्म करना ही होगा । आज के युवा कपल को गलत संबंधों और मित्रता में पड़ जाने पर भी विनम्रता से शालीनता से मौका देकर रिश्तों को सहेजने में समझदारी रखनी होगी। एकल परिवार की वजह से और साझी संस्कृति की वजह से हर स्तर पर बच्चों और समाज में सभी को बदलाव लाना होगा। इन आंकड़ों को देखते हुए, यह स्पष्ट है कि शहरीकरण और आधुनिकता की दौड़ में हमारे रिश्ते तेजी से बदल रहे हैं। हमें अपनी युवा पीढ़ी को रिश्तों के प्रति जिम्मेदारी और समर्पण की शिक्षा देनी होगी ताकि वे मजबूत और स्वस्थ रिश्ते बना सकें।

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