आखिर कब तक परंपरा के नाम पर खूनी खेल चलता रहेगा
रेवांचल टाइम्स छिदवाड विश्वप्रसिद्ध गोटमार मेले में एक दुसरे पर को पत्थर मारने का खेल आज सुबह 10बजे से पांढुर्ना जिला मुख्यालय में शुरू हुआ और शाम 7:30 बजे समाप्त हुआ भारी पुलिस बल ओर धारा 144 पुरी शहर लगने के बाद भी पुलिसकर्मी के बीच ये खेल चलता है इस मेले में हजारों लोगों का खून बहेता है….
यह मेला सदियों पुराना बताया जाता है..
इस मेले में पांढुर्णा शहर के लोग और सावरगांव के लोग जाम नदी पर पलाश का पेड़ बांध कर उसकी पूजा अर्चना कर एक दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं.
इस गोटमार मेले में कई लोग घायल होते हैं और लोगों की जान भी चली गई है..
प्रशासन के सामने बरसते हैं पत्थर
प्रशासन ने कई बार इस खूनी खेल को रोकने का प्रयास भी किया लेकिन यहां के लोग परंपरा का हवाला देकर इस खेल को बंद नहीं करना चाहते.. पूर्व जिला छिंदवाड़ा के कलेक्टर ने पहल भी की थी और पत्थर की जगह गेंद का उपयोग किया गया नदी तट पर गेंद की व्यवस्था की गई लेकिन सुबह होते-होते गेंद तो गायब हो गई और वहां पर पत्थर ही पत्थर नजर आए दोनों गांव के लोग परंपरा का हवाला देकर वही खूनी खेल खेलने लगे
प्रशासन ने की थी पूरी तैयारी
घायलों के उपचार के लिए अलग-अलग सामुदायिक कैंप बनाए गए
सिवनी,छिंदवाड़ा और बैतूल से चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई गई पर्याप्त संख्या में एंबुलेंस एवं डॉक्टर की व्यवस्थाएं की गई थी
पांढुर्ना पुलिस अधीक्षक ने बताया
सुंदर सिंह कनेश ने दूरभाष में जानकारी देते हुए बताया कि मेला क्षेत्र में सुरक्षा की पर्याप्त व्यवस्था की गई थी इस खूनी खेल में लगभग 900 से लोग घायल हुए हैं और तीन-चार लोगों को फैक्चर है
पांढुर्ना में गोटमार के नाम से कब तक बेहतर रहेगा खून
प्रति वर्ष सैकड़ों लोगों का खून बेवजह वहता है ओर प्रशासन खिलाडियों के जुनून के सामने कुछ नहीं कर पाता आज भी प्रति वर्ष की तरह आयोजन शुरू हुआ पलास का पेड़ रूपी झंडा जामनदी में लगाया गया औऱ साबरगांव व पांढुर्णा के खिलाडियों के बीच गोटमार यानी एक दुसरे पर पत्थर चलाने का सिलसिला शुरू हुआ दोनों पक्षों जुनून देखते ही बन रहा था इनमें से कई पत्थर मारने वाले खिलाड़ी को गभीर हलात मे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पांढुरना भेजे गये, ढोल नगाड़े बजते रहे मां चंडी के जयकारो के साथ दोनों पक्ष एक दुसरे बैखोफ होकर पथराव करते रहे ।
इस खूनी परंपरा का नियम दोनों गांव के लोगों ने बनाया
इस खूनी परंपरा का नियम दोनों गांव के लोगों ने सबारगांव वाले झंडा बधाते है तथा पाढुर्णा वाले तोड़ने के लिये एक दुसरे पर पत्थर की बारिश करते है इस पंरापरा की शुरू राजा भोसले की एक समय सैन्य छावनी रहे पाढुर्णा के सबारगांव मे पिडारी सैनिक रहते थे बहा यादव समुदाय के लोग भी रहते थे जिन्हें हर समय पिडारी सैनिक परेशान करते थे उन्हें दिनों सबारगांव की लडकी एंव पाढुर्णा का लडका मैं प्रेम हो गया एक दोनो भगाकर ले जा रहे युवक पर पत्थर से हमला किया गया दोनों जाम नदी मे कूद गये और बचाने का प्रयास कर रहे थे ले किन पीछा कर लोग समीप आ गये दोनों पर हुई बेइंतहा पत्थर की बारिश के कारण मौत हो गई दोनों शवों को माता चंडी के मंदिर लाया गया किवदंती हैं कि दोनों देवी की कृपा से जीवित हो गये तब से उनकी याद मैं यह गोटमार शुरू हुआ जो अब भी निरंतर जारी है