हर चौराहा अपना, दारू के साथ शोर मचा रहा चकना!

अहाते में लगा ताला, सड़कें बन गई मधुशाला, रगों में नशा भरकर आतंक मचा रही अपराधियों की टोली
दारू, चखना और अपराध — एक ही ठिकाने पर बिक रहा नशा और हिंसा
“ठेके के नाम पर बना अपराध का अड्डा, प्रशासन मौन”
शराब दुकानों के सामने खुलेआम अवैध चखना दुकानों का धंधा
दैनिक रेवांचल टाइम्स जबलपुर
..अतुल कुमार..
जबलपुर के विभिन्न इलाकों में शराब दुकानों के आसपास खुलेआम अवैध चखना दुकानें चल रही हैं, जहां पर शराब के साथ-साथ पानी के पाउच, डिस्पोजल ग्लास, नमकीन, अंडा, मटन, मछली से लेकर गांजा तक की अवैध बिक्री धड़ल्ले से हो रही है। यह सब हो रहा है दारू ठेकेदारों की मिलीभगत और पुलिस की चुप्पी के बीच।
दारू ठेके पर बन रहे ‘क्राइम स्पॉट’
इन शराब ठेकों पर न सिर्फ नशा बेचा जा रहा है, बल्कि झगड़ा, गाली-गलौज, छेड़छाड़ और मारपीट जैसी घटनाएं रोजमर्रा का हिस्सा बन चुकी हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि शाम होते ही इन ठेकों के आसपास का माहौल अपराध का अड्डा बन जाता है।
मदिरा + माहौल = अपराध
* शराब पीने वाले वहीं ठेके के सामने ही बैठकर चखना खा रहे हैं।
* बहस, लड़ाई-झगड़ा और हाथापाई आम हो गई है।
* कई मामलों में महिलाओं से बदसलूकी और राह चलते लोगों के साथ झगड़े की घटनाएं दर्ज हुई हैं।
* शराब ठेकेदार अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए खुद चखना, डिस्पोजल और पानी की अवैध बिक्री करवा रहे हैं।
पुलिस की भूमिका पर सवाल – दिखती है, लेकिन देखती नहीं
पुलिस थाने और चौराहों से चंद कदम की दूरी पर चल रहे इन ठेकों और अवैध गतिविधियों पर कोई रोक नहीं लगाई जा रही है। स्थानीय नागरिकों की शिकायत के बावजूद पुलिस अक्सर अनदेखी करती है या सिर्फ औपचारिकता में नोटिस देकर फाइल बंद कर देती है।
प्रशासन का दोहरा रवैया – राजस्व चाहिए, कानून नहीं?
एक तरफ सरकार शराब बिक्री से राजस्व कमाना चाहती है, लेकिन इस नशे के व्यापार से उपजने वाले सामाजिक और आपराधिक संकट की अनदेखी कर रही है। बच्चों, महिलाओं और युवाओं पर इसका बुरा असर साफ़ नजर आता है।
स्थानीय जनता का फूटा गुस्सा – “हम जाएं तो जाएं कहां?”
रिहायशी इलाकों में खुले इन शराब ठेकों की वजह से वहां रहने वाले लोग, खासकर महिलाएं और बुजुर्ग, बेहद परेशान हैं।
एक महिला निवासी ने बताया –
“शाम होते ही हमारे दरवाजे पर शराबी झूमते हैं, लड़ाई करते हैं, गाली गलौज होती है। बच्चों को बाहर निकालना मुश्किल हो गया है।”
सवाल उठते हैं…
1. शराब के साथ चखना बेचने की अनुमति किसने दी?
2. ठेके के सामने बैठकर पीने की इजाजत क्यों दी जा रही है?
3. बार-बार शिकायतों के बावजूद पुलिस क्यों नहीं कर रही कार्रवाई?
4. क्या शराब की दुकानें अब अपराध की फैक्ट्री बन गई हैं?
जरूरत है सख्त कार्रवाई की – वरना समाज को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी
यदि प्रशासन और पुलिस समय रहते सख्ती नहीं बरतते, तो यह नशे और अपराध का गठजोड़ जबलपुर जैसे शहरों में कानून व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बन जाएगा। शराब की दुकानें सिर्फ राजस्व का स्रोत नहीं, जनजीवन और सामाजिक संरचना को बिगाड़ने का माध्यम भी बनती जा रही हैं।