आखिर कब सुधरेंगे हालात मवई के..??

 

सरकार की उपेक्षा से परेशान मवई के ग्रामीणजन

दैनिक रेवांचल टाइम्स मंडला/ डिजिटल इंडिया की बड़ी बड़ी बात करने वालों को शायद मंडला जिले की मवई के हालातों का पता नहीं पता होता तो शायद मवई विकासखंड के ग्रामीणों की बुनियादी सुविधाओं के लिए यहां वहां भटकना न पढ़ता केंद्र की सरकार से लेकर प्रदेश सरकार चाहे जितनी भी हामी भरें लेकिन मध्य प्रदेश का अंतिम छोर जो छत्तीसगढ़ राज्य की सीमाओं से लगा हुआ हैं वो आज बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसना न पड़ता। शिक्षा स्वास्थ्य साफ  पानी और रोजगार जैसी अति महत्व पूर्ण बुनियादी सुविधाओं के लिए यहां के ग्रामीण जन तरसती आंखों से न देखते। मंडला जिले का मवई विकासखंड आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी आज बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। बीते दो दशकों से प्रदेश में लगातार भाजपा की सरकार हैं और मवई विकासखंड जो बिछिया विधानसभा के अंतर्गत आता हैं वहां पर पिछले तीसरी बार से कांग्रेस पार्टी से विधायक अपना वर्चस्व बनाए हुए हैं। लेकिन गांवों की हालत जस की तस बनी हुई है। स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और शुद्ध पेयजल जैसी आवश्यक सेवाएं आज भी आम ग्रामीण की पहुँच से कोसों दूर हैं।

स्वास्थ्य व्यवस्था — नाम मात्र की हैं ।

 

हॉस्पिटल हैं तो डॉक्टर नहीं..

 

मवई का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा है। महिला डॉक्टर तो दूर, यहां नियमित डॉक्टर और स्टाफ तक नहीं हैं। गांवों में बने उप-स्वास्थ्य केंद्र भी केवल भवन बनकर रह गए हैं। एक्स-रे मशीन उपलब्ध है। लेकिन ऑपरेटर नहीं है। छोटी-छोटी बीमारियों के इलाज के लिए ग्रामीणों को जिला मुख्यालय जो 100 किलोमीटर की दूरी पर मंडला जाना पड़ता है। जिससे ग्रामीण जन और गरीब तबके के लोगों लिए एक बड़ी चुनौती है। स्वास्थ्य सुविधाओं  के नाम पर यहां कागजी घोड़े दौड़ रहे हैं।

 

देश के ननिहालों का भविष्य अंधकार में

 

दूरस्थ ग्रामीण एरिया जो शिक्षा जैसी बुनियादी व्यवस्था के लिए तरस रहा हैं। और यहां के हालत बहुत ही चिंताजनक है। प्राइमरी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है। मॉडल और नॉर्मल स्कूलों में भी पर्याप्त शिक्षक नहीं है। निजी शिक्षा संस्थान ना के बराबर हैं।  जिससे गरीब बच्चों की पढ़ाई पर गहरा असर पड़ रहा है।

 

रोजगार नहीं — पलायन को मजबूर आदिवासी बैगा समाज

 

केंद्र सरकार के द्वारा चलाई जा रही मनरेगा जैसी योजनाओं की स्थिति यहां पर बेहद खराब है। पंचायतों को मिलने वाला बजट इतना कम है कि साल भर में केवल एक-दो छोटे कार्य ही हो पाते हैं। रोजगार के अवसरों की कमी से युवा दूसरे शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। निर्माण कार्यों में ठेकेदारों और जनपद पंचायत की मिलीभगत से घटिया गुणवत्ता का काम होता है, जिससे विकास की गति थम जाती है।

 

जल जीवन मिशन — अधूरी योजनाएं

 

 

जल जीवन मिशन के तहत कई पंचायतों में पाइपलाइन और पानी की टंकियां तो बन गई हैं, लेकिन आज भी लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है।  ठेकेदारों ने अधूरा काम करके पंचायत को हैंडओवर कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली।लेकिन पंचायत के पास न तकनीकी स्टाफ है और न ही संचालन के लिए बजट। जिससे सरकारी योजनाओं की धज्जियां उड़ती हुई नज़र आती हैं। जिससे यह भी प्रतीत होता हैं कि सरकार और सरकारी नुमाइंदों के पास में उसका कोई स्थायी समाधान नहीं हैं।

 

सरकारी योजनाएं ग्रामीण जन के लिए सिर्फ ऊंट के मुंह में जीरा

 

केंद्र से लेकर प्रदेश सरकार के द्वारा जहां सरकारी योजनाएं तो चलाई जा रही हैं इन योजनाओं में जैसे— 5 किलो मुफ्त राशन, लाडली बहना योजना, किसान सम्मान निधि — गरीबों के लिए राहत तो जरूर हैं, लेकिन दूरस्थ वनांचल ग्रामीणों के लिए ये योजनाएं कोई स्थायी समाधान प्रतीत नही होती हुई दिखाई देती। इसका एक मात्र समाधान यह हैं कि जब तक ग्रामीण वनांचल गांवों में बेहतर शिक्षा, मजबूत स्वास्थ्य सेवाएं और स्थानीय रोजगार उपलब्ध नहीं हों जाते तब तक ग्रामीण विकास सिर्फ कागजों तक सीमित रहेगा। यहां के आदिवासी और बेगा जनजाति के लोग अब इन सब बुनियादी सुविधाओं की नज़र अंदाजी को देखते हुए सरकार से सवाल करते हुए कहते हैं कि मवई जैसे वनांचल क्षेत्र वासियों की अनदेखी अब बर्दाश्त के बाहर है। यह समय है कि सरकार इस क्षेत्र की वास्तविक समस्याओं को समझे और इनके समाधान के लिए कोई ठोस और दीर्घकालिक योजनाएं बनाए। जिससे कि “विकास” केवल नारों और घोषणाओं तक ही सिमट कर न रह जायें।

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