विकास की पोल खोले मासूमों का संघर्ष, स्कूल जाने को नदी पार करने की मजबूरी

जान दाव पर लगा कर बच्चे पहुँच रहें स्कूल
खुली विकास की पोल
बोरिया गांव न पुल है न सड़क, नदी पार कर स्कूल जाना बच्चों की मजबूरी
विकास से कोषों दूर है गांव चुनाव के बाद मिस्टर इंडिया बने विधायक सांसद
रेवाँचल टाईम्स – मंडला, जिले के अधिकांश दूरस्थ वनाचल ग्रामीण क्षेत्र में आजादी के बाद भी बुरा हाल है और आज देश डिजिटल इंडिया के साथ साथ इक्कीसवी सदी में पहुँच चुका है पर विकास और लोगो को मिलनी वाली मूलभूत सुविधाएं आज भी लोग वंचित है और चुनाव के समय सरपंच विधायक सांसद सब के सब बड़े बड़े भाषण देते है पर चुनाव जीतने के बाद किए गए भाषण और वादे सब छू मंतर हो जाते है ।
वही जानकारी के अनुसार मंडला जिले के जनपद नारायणगंज के अंतर्गत आने वाले ग्राम बोरिया आज भी मूलभूत सुविधाएं से वंचित है और नदी नालो में पुल पुलिया और सड़क नहीं होने से ग्राणीण व छात्रों को नदी के अंदर से पार स्कूल जाना पड़ता है और लोगों को भी भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है.
बोरिया गांव के बच्चे जान जोखिम मे डाल कर नदी पार कर जाते है स्कूल
मंडला मानसून हर किसी के लिए खुशियां लेकर आता है. लेकिन मध्य प्रदेश के मंडला जिले के एक गांव में यह चिंता और भय लेकर आता है. बोरिया गांव के लोग आजादी के इतने साल बाद भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं. इतना ही नहीं गांव में पुल व सड़क नहीं होने से बारिश के दिनों में बच्चों को पढ़ने जाने के लिए नदी पार करनी पड़ती है. इसी वजह से गांव में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या में लगातार कमी आती जा रही है.
बच्चों की शिक्षा में बाधा
बुनियादी सुविधाओं का अभाव इन बच्चों की शिक्षा में बाधा बन रहा है. आजादी के अमृत महोत्सव के बाद भी देश के भविष्य बच्चों के लिए सुरक्षित सड़क और एक पुल अभी भी एक सपने जैसा लगता है.
स्कूल जाने बच्चों की संख्या में कमी:
दरअसल,मंडला जिला के नारायणगंज आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र ग्राम बोरिया में छात्रों की स्थिति अभी भी बहुत दयनीय है.
आजादी के 75 साल बाद भी इस गांव के छात्रों को बुनियादी सुविधाएं नहीं मिली हैं. यही वजह है कि हर साल मानसून के दौरान इस इलाके की नदी में बाढ़ आ जाती है, जिससे छात्रों का स्कूल जाना बेहद ख़तरनाक हो जाता है.
इतना ही नहीं स्कूल पहुंचने के लिए बच्चों को अपने माता-पिता की पीठ पर बैठकर नदी पार करना मजबूरी है. रोज के इस डर की वजह से कई माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल भेजने से कतराते हैं.
परिणामस्वरूप, स्कूल में छात्रों की संख्या दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है और ये छात्र शिक्षा के मूल अधिकार से वंचित हो रहे हैं. ग्रामीणों ने आशंका जताई है कि सुरक्षित परिवहन व्यवस्था के साथ ही पुल या वैकल्पिक मार्ग नहीं होने से शिक्षा से वंचित बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा.
बच्चों को आश्रम स्कूलों में भेजने का विकल्प
लगभग 500 की आबादी वाले बोरिया गांव में बच्चों को अभी भी स्कूल जाने के लिए सुरक्षित और सुविधाजनक सड़क नहीं है. मानसून के मौसम में यह समस्या और भी ज्यादा गंभीर हो जाती है. यदि नदी में बाढ़ आ जाए, तो छात्रों को स्कूल जाने के लिए अपने माता-पिता की पीठ पर नदी पार करनी पड़ती है.
यह सफर बेहद ख़तरनाक होता है. इसी वजह से कई माता-पिता अपने बच्चों को प्राथमिक स्कूलों में भेजने के बजाय सीधे आश्रम-विद्यालयों में दाखिला दिला रहे हैं. परिणामस्वरूप, बोरिया के प्राथमिक विद्यालयों में छात्रों की संख्या लगातार घटती जा रही है.
बच्चे को गोदी में लेकर नदी पार कराते पैरेंट्स
छात्रा ने बयां किया दर्द
बोरिया की छात्रा सपना उइके ने अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए कहा, हम मानसून के दौरान स्कूल नहीं जाते. हमारे इलाके में मानसून के दौरान बहुत बारिश होती है. इस वजह से नदी-नालों में पानी बहुत ज़्यादा होता है और पानी का बहाव भी बहुत तेज़ होता है. ऐसे में स्कूल जाना बहुत मुश्किल होता है. मानसून के लगभग तीन महीनों तक हम स्कूल नहीं पहुंच पाते.
उसने कहा, “बारिश के मौसम में, अगर हमारे साथ परिवार या गांव के बुजुर्ग नहीं होते हैं, तो हम स्कूल नहीं जाते हैं. क्योंकि नदी पार करना बहुत खतरनाक होता है. इससे हमारी पढ़ाई का बहुत नुकसान होता है. शिक्षक जो पढ़ाते हैं, वह हम तक समय पर नहीं पहुंच पाता. दूसरे बच्चे आगे निकल जाते हैं और हम पीछे रह जाते हैं. इससे मुझे बहुत दुःख होता है.”
सपना उइके का यह बयान सिर्फ उनका निजी अनुभव नहीं है, यह कई आदिवासी छात्रों की वास्तविकता है.
सालों से परेशानी
गांव के निवासी सूरज उइके ने भी इस दौरान अपना दुख व्यक्त किया. उन्होंने कहा, “पिछले कई सालों से हमारे गांव में सड़कें नहीं बनी हैं.
नदी पर कोई पुल नहीं है. इस वजह से हमें रोजगार पाने, बच्चों को स्कूल ले जाने और मरीजों को अस्पताल ले जाने में काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.ओर ग्रामीणों ने ये भी कहा की स्थानीय जनप्रतिनिधि ओर शासन प्रसासन से कई बार लिखित आवेदन निवेदन किये पर आज दिन तक किसी ने समस्या देखने नहीं पहुंचे,
बीमार मरीज को अस्पताल ले जाने के लिए इस तरह नदी पार करनी पड़नी है
वही गांव से अनेकों बार तो हमें गर्भवती महिलाओं को अस्पताल तक ले जाना पड़ता है.” बड़ी समस्या होती है पर कोई सुनने वाला नहीं है हम लोगो ने अनेकों बार विधायक सांसद और जिला प्रशासन से मांग की कि सरकार हमारे इलाके में सड़कों और पुलों की समस्या का जल्द से जल्द समाधान करें | पर इस जिले में कोई सुनने वाला नहीं है हमे सबसे ज़्यादा समस्याएं बारिश के समय होती है जब नदी नालों में पानी भरा होता है!