जलवायु सम्मेलन को वादे से क्रियान्वयन की ओर जाना होगा

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रेवाँचल टाईम्स – इस वर्ष 30 वां जलवायु सम्मेलन (काप- 30) 10 नवंबर से 21 नवंबर तक ब्राज़ील के बेलेम शहर में आयोजित हो रहा है। यह जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन पर केंद्रित है, जो जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए देशों और क्षेत्रों को एक साथ लाकर बातचीत और निर्णय लेने पर केंद्रित है। यह कोप-30 महत्वपूर्ण इसलिए भी है कि वैश्विक जलवायु कार्रवाई को तेज़ करना, जवाबदेही सुनिश्चित करना, नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना और पूरी दुनिया में जलवायु न्याय, अनुकूलन तथा सतत विकास को आगे बढ़ाने का फैसला लिया जाने वाला है।काप-30 वह सम्मेलन है जहां देशों को जलवायु लक्ष्यों पर कठोर और ठोस निर्णय लेने होंगे। पेरिस समझौता (2015) के 10 साल पूरे होने पर यह माना जा रहा है कि अब वादे नहीं, काम दिखाना होगा। क्योंकि विश्व में कार्बन उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है और दुनिया ने तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस के अंदर रोकने का वादा किया था, लेकिन आज दुनिया 2.4 से 2.8 डिग्री सेल्सियस की तरफ बढ़ रही है।
इसलिए उम्मीद है कि इस सम्मेलन में देशों पर नए और अधिक कड़े राष्ट्रीय जलवायु लक्ष्य घोषित किया जाएगा। कोयला, तेल और गैस से चरणबद्ध तरीके से बाहर निकलने की स्पष्ट समय-सीमा तय की जाएगी। विकासशील देशों (भारत, ब्राज़ील, अफ्रीका, छोटे द्वीप देश) को जलवायु बदलाव से लड़ने के लिए अधिक धन की जरूरत है।100 अरब डॉलर प्रति वर्ष से बढ़ाकर 300 से 400 अरब डॉलर प्रतिवर्ष किया जाने और इसे बाध्यकारी वित्त समझौता बनाये जाने पर फैसला लिया जाना है। फंड का वितरण ग्रांट के रूप में हो ना कि ऋण के रूप में दिया जाए। निजी कॉर्पोरेट प्रदूषकों पर कार्बन टैक्स या विंडफॉल टैक्स लगाने पर चर्चा किया जाएगा। मौसम आपदाओं से जो नुकसान हो चुका है, उसकी भरपाई के लिए फंड तो बना है, लेकिन पैसा नहीं आया है। फंड में निश्चित धनराशि डालने को बंधनकारी बनाना और सबसे प्रभावित समुदायों को सीधा लाभ देने की व्यवस्था पर चर्चा होगी।
यह सम्मेलन की मेजबानी में हो रही है, जहां अमेज़न वर्षावन स्थित है, जो पृथ्वी की 20% ऑक्सीजन और 10% विश्व जैव-विविधता का आधार है।इस बार वनीकरण का बड़ा एजेंडा है और जंगलों और आदिवासी समुदायों की भूमि अधिकार संरक्षण भी प्राथमिकता सूची में है।वन कटाई को 2030 तक शून्य करने का साझा लक्ष्य भी तय किया जाएगा। अब संकट “भविष्य” का नहीं, वर्तमान का है। इसलिए
बाढ़, सूखा, ताप लहरों के लिए स्थानीय सामुदायिक संरक्षण मॉडल को अपनाना है।अर्थात कृषि, जल, शहरी गर्मी पर जन-आधारित समाधान की ओर बढ़ने की दिशा में काम किया जाना है। ऊर्जा परिवर्तन ऐसा हो कि गरीब देश और श्रमिक पीड़ित न हों। जीवाश्म ईंधन से हरित अर्थव्यवस्था की ओर रोजगार-समर्थित बदलाव की दिशा को तय किया जाना है।यह केवल एक वार्ता सम्मेलन नहीं, जलवायु कार्रवाई की निर्णायक कसौटी है।
पेरिस जलवायु समझौता (2015) के बाद अपेक्षित सफलता नहीं मिली है।वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कुल मिलाकर बढ़ता रहा है। दुनिया अभी भी 1.5 डीग्री सेल्सियस सीमा से ऊपर जाने की राह पर है।पेरिस के तहत विकसित देशों ने वादा किया था कि वे विकासशील देशों को 100 अरब डॉलर प्रति वर्ष वित्तीय मदद देंगे। यह लक्ष्य आज तक पूरा नहीं हुआ है। कई देशों ने ऋण देकर अपना योगदान दिखाया, जबकि वादा अनुदान देने का था।छोटे द्वीप देशों और गरीब देशों को नुकसान का मुआवजा अभी भी बहुत कम मिलता है।नुकसान और क्षति का फंड बनाया गया।
लेकिन फंड लगभग खाली है, उसकी संरचना भी स्पष्ट नहीं है।पेरिस समझौते ने दुनिया की दिशा बदल दी, लेकिन गति नहीं। विचारधारा बदली है, पर उत्सर्जन और तापमान अभी भी बढ़ रहे हैं। इसलिए सम्मेलन को “क्रियान्वयन का निर्णायक सम्मेलन” माना जा रहा है, जहां केवल वादे नहीं, वास्तविक कदम अपेक्षित हैं।
जबकि ब्राज़ील के काप अध्यक्ष, आंद्रे कोर्रेआ डो लागो, जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए देशों को एक साथ मिलकर काम करने की बात को प्रेरित करने की प्रबल महत्वाकांक्षा रखते हैं।
राज कुमार सिन्हा
बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ

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