आख़िर कब होगी आयुर्वेदिक अस्पतालों की जांच? मंडला से जबलपुर तक फैलती एक चुप्पी और मनमानी का खेल

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मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचलों में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली कोई नई बात नहीं है, लेकिन अब आयुर्वेदिक अस्पतालों में जो हो रहा है वह सिर्फ लापरवाही नहीं, सुनियोजित धांधली की आशंका को जन्म देता है। मंडला जिले की बात करें या उससे जुड़े जबलपुर जैसे संभागीय केंद्र की—हर जगह एक अदृश्य ढर्रा चल रहा है, जिसमें न तो कोई जवाबदेही है, न पारदर्शिता।

ग्राम डीठौरी (तहसील नैनपुर, जिला मंडला) में स्थित आयुर्वेदिक अस्पताल की स्थिति इसका जीवंत उदाहरण है। यहां का हाल देखकर किसी भी जागरूक नागरिक के मन में यही सवाल उठता है कि जब मरीज ही नहीं आ रहे, तो फिर शासन से आने वाली दवाइयों का क्या हो रहा है? वे किस गोदाम में दम तोड़ रही हैं, या कौन सी जेब में समा रही हैं?

मरीज नहीं, फिर भी दवाइयां गायब… कैसे?

स्थानीय ग्रामीणों की मानें तो अस्पताल में महीने भर में गिनती के मरीज आते हैं। फिर भी दवाइयों का भंडारण नियमित रूप से होता है और कागजों पर भारी खपत भी दिखाई जाती है। यह साफ तौर पर दर्शाता है कि सरकारी औषधियों का या तो दुरुपयोग हो रहा है या उनका कोई अवैध बाजार तैयार हो चुका है। इस पर अब तक किसी भी जिम्मेदार अधिकारी ने संज्ञान नहीं लिया, यह और भी गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।

जांच तो दूर, निरीक्षण तक नहीं

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस अस्पताल में वर्षों से कोई आकस्मिक निरीक्षण नहीं हुआ। न स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारी आए, न कोई संभागीय टीम। आखिर किसके संरक्षण में यह सब चल रहा है? क्या मंडला जिले के आयुर्वेदिक विभाग की चुप्पी, मिलीभगत की ओर इशारा नहीं करती?

जबलपुर में भी गूंजती रही आवाजें, लेकिन…

मंडला की यह कहानी अकेली नहीं है। जबलपुर, जो कि क्षेत्रीय नियंत्रण का केंद्र है, वहां भी हालात कुछ खास बेहतर नहीं हैं। कई आयुर्वेदिक औषधालयों में संसाधनों की भरमार है, लेकिन मरीज नहीं। तो फिर यह सब किसके लिए? किसकी जेबें भरने के लिए जनता के स्वास्थ्य बजट का दुरुपयोग हो रहा है?

जन अपेक्षा बनाम सरकारी उदासीनता

ग्रामीणों की एक ही मांग है – इन अस्पतालों की नियमित, निष्पक्ष और कड़ी जांच हो। लेकिन जिला प्रशासन और आयुष विभाग इस दिशा में उदासीन बना हुआ है। यह उदासीनता अब प्रशासनिक अक्षमता नहीं, बल्कि मिलीभगत का प्रतीक लगने लगी है।

क्या सिर्फ फाइलों में चल रहे हैं ये अस्पताल?

ऐसा प्रतीत होता है कि ये आयुर्वेदिक अस्पताल अब ‘कागजी स्वास्थ्य केंद्र’ बनकर रह गए हैं, जिनका वास्तविक उपयोग सिर्फ सरकारी बजट निकालने और औषधियों की कालाबाजारी के लिए हो रहा है। जब जनता अस्पताल तक नहीं पहुंच रही, तो सुविधाएं किन्हें दी जा रही हैं?

 

समाप्ति में सवाल — जांच कब?
मंडला हो या जबलपुर, दोनों जगहों की जनता को अब सिर्फ जवाब नहीं, कार्यवाही चाहिए। इन आयुर्वेदिक अस्पतालों में क्या चल रहा है, इसका पर्दाफाश जरूरी है। अन्यथा यह संदेह जल्द ही विश्वासघात में बदल जाएगा।

 

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