वाराणसी में डॉ. अनुभूति शर्मा की पुस्तक का भव्य लोकार्पण: बाल साहित्य में पर्यावरणीय चेतना पर हुआ चिंतन

रेवांचल टाइम्स छिंदवाड़ा|देवभूमि वाराणसी में साहित्य, संस्कृति और पर्यावरण का संगम देखने को मिला, जहाँ डॉ. अनुभूति शर्मा की चर्चित शोधपरक कृति ‘परशुराम शुक्ल के बाल साहित्य में पर्यावरणीय चेतना’ का भव्य लोकार्पण समारोह सम्पन्न हुआ। इस गरिमामय आयोजन में देश-विदेश के प्रतिष्ठित विद्वान और साहित्यकार शामिल हुए, जिन्होंने बाल साहित्य के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण के महत्व पर गहन विचार-विमर्श किया।
यह अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी एवं पुस्तक लोकार्पण समारोह तारक सेवा संस्था, वाराणसी तथा अंतरराष्ट्रीय रामायण एवं वैदिक शोध संस्थान, अयोध्या एवं वृंदावन शोध संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया था।
*मुख्य आकर्षण और उपस्थिति*
कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व कुलपति एवं वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. बलदेव भाई शर्मा ने की। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’, मा. राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), आयुष एवं खाद्य सुरक्षा व औषधि प्रशासन, की गरिमामयी उपस्थिति रही।
विशिष्ट अतिथियों में डॉ. इंद्रजीत शर्मा (अमेरिका), डॉ. विद्युयोत्मा मिश्र, और प्रो. हर्वंश दीक्षित शामिल थे। कार्यक्रम के सफल सूत्रधार डॉ. उमापति दीक्षित रहे।
पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता पर बल
विद्वानों ने डॉ. अनुभूति शर्मा की पुस्तक की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि डॉ. शर्मा ने पर्यावरणीय चेतना जैसे गंभीर और सामयिक विषय को बच्चों के साहित्य के परिप्रेक्ष्य में गहन शोध और अत्यंत सहज भाषा के साथ प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक बच्चों में प्रकृति-प्रेम, पर्यावरण-संरक्षण और एक संवेदनशील सोच विकसित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी।
अपने संबोधन में लेखिका डॉ. अनुभूति शर्मा ने कहा कि:
”बाल साहित्य के माध्यम से पर्यावरण के प्रति जागरूकता विकसित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। हम अपनी भावी पीढ़ी को जागरूक कर ही भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं।”
सफल समापन
कार्यक्रम का संचालन सुप्रसिद्ध कवि डॉ. राहुल अवस्थी ने अत्यंत कुशलतापूर्वक किया। समारोह के अंत में, साहित्य और समाज के प्रति अमूल्य योगदान देने वाले सभी साहित्यकारों को सम्मानित किया गया। देश-विदेश से आए विद्वानों, साहित्यकारों और शोधार्थियों की बड़ी संख्या में उपस्थिति ने इस आयोजन को एक यादगार साहित्यिक पर्व बना दिया।