DFO विवाद ने पकड़ा तूल, वन मंडल कार्यालय में हंगामा, आंदोलन की चेतावनी

DFO क़े खिलाफ खोला मोर्चा
वन मंडल कार्यालय मे हंगामा वन कर्मियों ने डी एफ ओ क़े खिलाफ लगाए गंभीर आरोप लगाए दिया 7 दिनो का दिया अल्टीमेटम नही तो करेगे धरना प्रदर्शन कर उग्र आंदोलन की दी चेतावनी
रेवांचल टाईम्स – मंडला, जिले के वन मंडल मंडला में कार्य वातावरण को लेकर उबाल, दमनकारी नीति के विरोध में कार्य बंद आंदोलन की चेतावनी
वही सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार उत्पादन वन मंडल में इन दिनों कार्य वातावरण को लेकर गंभीर असंतोष की स्थिति बन गई है। वन मंडल के अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने वन मंडल अधिकारी सुश्री पूजा नांगले पर दमनकारी नीति अपनाने, मानसिक प्रताड़ना करने और नियमों के विरुद्ध कार्य कराने के आरोप लगाए हैं। इसी के विरोध में कर्मचारियों ने वन संरक्षक, मध्यवन वृत्त जबलपुर को पत्र लिखकर अपनी व्यथा रखी है और चेतावनी दी है कि यदि एक सप्ताह के भीतर स्थिति में सुधार नहीं हुआ या संबंधितअधिकारी का स्थानांतरण नहीं किया गया, तो वे कार्य बंद आंदोलन और सामूहिक हड़ताल पर जाने के लिए विवश होंगे।
वही कर्मचारियों द्वारा लगाए गए आरोपों के अनुसार वन मंडल अधिकारी द्वारा समीक्षा बैठकों, क्षेत्रीय भ्रमण एवं व्यक्तिगत मुलाकातों के दौरान अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया जाता है। कर्मचारियों और युवा अधिकारियों को “शासन का पैसा खाने वाला” जैसे शब्द कहे जाते हैं तथा उनकी योग्यता पर सवाल उठाकर नौकरी से हटाने या स्वयं त्यागपत्र देने के लिए उकसाया जाता है। इससे कर्मचारियों के स्वाभिमान और आत्मसम्मान को गहरी ठेस पहुंच रही है।पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि वन मंडल अधिकारी द्वारा कर्मचारियों से उनका मोबाइल फोन मांगकर संदेशों की जांच की जाती है, जिससे उनकी व्यक्तिगत और पारिवारिक गोपनीयता भंग होती है। कर्मचारियों का कहना है कि यह न केवल नियमविरुद्ध है, बल्कि उनके मौलिक अधिकारों का भी उल्लंघन है। इस प्रकार की कार्यशैली से कर्मचारियों में भय और असुरक्षा का माहौल बन गया है।कर्मचारियों ने यह भी आरोप लगाया है कि कुशल श्रमिकों के साथ अकुशल श्रमिकों को मिलाकर कार्य करने के निर्देश दिए जा रहे हैं, जिससे दुर्घटनाओं और जनहानि की आशंका बनी रहती है। इसके बावजूद सुरक्षा मानकों और श्रमिकों की क्षमता पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा।
वन मंडल अधिकारी द्वारा दिसंबर 2025 तक लगभग 50 प्रतिशत वृक्ष कटाई एवं लॉगिंग/हंपीकरण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जबकि विलंब से अनुमति मिलने के कारण अधिकांश मजदूर पहले ही अन्य स्थानों पर काम करने चले गए हैं। वर्तमान में श्रमिकों की भारी कमी है, ऐसे में इतने कम समय में लक्ष्य पूरा करना कर्मचारियों के अनुसार असंभव है। इसके बावजूद गूगल शीट के माध्यम से साप्ताहिक समीक्षा की जा रही है, जिससे क्षेत्रीय प्रभारी एवं कर्मचारियों पर अत्यधिक मानसिक दबाव पड़ रहा है और उनकी कार्यक्षमता प्रभावित हो रही है।
वित्तीय वर्ष 2025-26 में वन मंडल अधिकारी द्वारा नवीन पंजी संधारण जैसे अतिरिक्त कार्य कराए जा रहे हैं, जो मुख्यालय भोपाल के निर्देशों के बाहर बताए जा रहे हैं। कर्मचारियों का कहना है कि इससे समय और संसाधनों की बर्बादी हो रही है और विदोहन जैसे महत्वपूर्ण कार्य समय पर पूरे नहीं हो पा रहे।
सबसे गंभीर समस्या मजदूरों के भुगतान को लेकर बताई गई है।
परिक्षेत्र अधिकारियों एवं उप मंडल कार्यालयों से भेजे गए प्रमाणकों के बावजूद मजदूरी का भुगतान समय पर नहीं किया जा रहा, जिससे श्रमिकों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। सीएम हेल्पलाइन में शिकायत करने पर भी दबाव बनाकर शिकायतें वापस कराने या बंद कराने का प्रयास किया जाता है। कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें स्वयं के वेतन से भुगतान करने के लिए प्रेरित किया जाता है, जो पूरी तरह अनुचित है।
डिपो में भौतिक नीलामी, कार्यशालाओं एवं अन्य कार्यों के भुगतान पर भी कोई स्पष्ट निर्णय नहीं लिया जा रहा है। कई मामलों में कर्मचारियों को अपनी निजी आय से खर्च करना पड़ रहा है। वहीं, एरियर भुगतान, टीए-डीए और डायरी भुगतान लंबे समय से लंबित हैं, जबकि इसके लिए वरिष्ठ कार्यालय पर भी कोई दबाव नहीं बनाया जा रहा।
वही कर्मचारियों ने यह भी बताया कि अवकाश मांगने पर सामान्यतः मना कर दिया जाता है और जिला स्तर पर अन्य विभागों के अधिकारियों के साथ समन्वय का भी अभाव है। समकक्ष अधिकारियों के माध्यम से कार्य कराने के बजाय निचले स्तर के कर्मचारियों पर सीधा दबाव बनाया जाता है, जो प्रशासनिक प्रोटोकॉल के विपरीत है।
छोटी-छोटी बातों पर स्पष्टीकरण जारी करना, फील्ड मीटिंग में समझाइश देने के बजाय चिल्लाना, फोन पर तीखी डांट-फटकार और अपमानजनक शब्दों का प्रयोग अब आम बात हो गई है। कर्मचारियों का कहना है कि सही कार्य होने के बाद भी उसमें कमियां निकालकर मानसिक दबाव बनाया जाता है, जिससे उनका मनोबल पूरी तरह टूट चुका है। यहां तक कि “वन विभाग को मजदूर विभाग बना देना चाहिए” जैसी टिप्पणियां भी की जाती हैं।
वही पत्र के अंत में कर्मचारियों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते इन परिस्थितियों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में किसी भी प्रकार की अप्रिय या जनहानि की घटना हो सकती है, जिसकी जिम्मेदारी संबंधित वन मंडल अधिकारी की होगी। कर्मचारियों ने मांग की है कि एक सप्ताह के भीतर उचित कार्रवाई करते हुए अधिकारी का स्थानांतरण किया जाए, अन्यथा उत्पादन वन मंडल मंडला के समस्त क्षेत्रीय कर्मचारी विदोहन कार्य छोड़कर सामूहिक हड़ताल पर जाने को बाध्य होंगे।
फिलहाल यह मामला वन विभाग के उच्च अधिकारियों के संज्ञान में है। अब देखना यह होगा कि वन संरक्षक एवं शासन इस स्थिति को कितनी गंभीरता से लेते हैं और क्या कर्मचारियों की शिकायतों पर समय रहते कोई ठोस कदम उठाया जाता है या नहीं।