पौष पूर्णिमा 2026 : माघ स्नान, कल्पवास और चन्द्रबल प्राप्ति का दुर्लभ अवसर
पौष पूर्णिमा से ही माघ मास के पवित्र स्नान का शुभारम्भ होता है। माघ मास में संगम तट पर लोग एक महीने का कल्पवास करते हैं। सौ हजार गायों का दान करने का जो फल होता है वही फल तीर्थराज प्रयाग में माघ मास में तीस दिन (एक मास) स्नान करने का होता है। पौष पूर्णिमा के दिन सूर्योदय के पूर्व स्नानादि करके भगवान मधुसूदन की एवं उसके पश्चात ब्राह्मणों को भोजन एवं आराधना, यथाशक्ति दान देने का विधान है, सायंकाल सत्य नारायण भगवान की कथा भी होती है। धर्मशास्त्रों के अनुसार जो इस स्नान को करता है वह देव-विमान में बैठकर विहार करने के योग्य हो जाता है। इस स्नान का पुण्य अर्जित करने वाले पुण्यात्मा स्वर्ग में विहार करते हैं, ऐसी हिन्दुओं की धार्मिक मान्यताएं हैं। संगम के पवित्र जल में प्राणदायी शक्ति विद्यमान है। पौष पूर्णिमा पर व्रत करने वालों को इस दिन प्रातःकाल नदी आदि में स्नान करके देवताओं का पूजन एवं पितृों का तपृण करना चाहिए, सफेद चन्दन, चावल, सफेद फूल, धूप-दीप, सफेद वस्त्र आदि से चन्द्रमा का पूजन करें।
स्नान के साथ दान का विशेष महत्व- पौष पूर्णिमा से प्रारम्भ कर माघ में स्नान के साथ दान का विशेष महत्व है। मनोवांछित फल की कामना रखने वालों को अपनी शक्ति एवं सामर्थ्य अनुसार दान अवश्य करना चाहिए। जाड़ा होने के कारण कंबल आदि ऊनी वस्त्रों का दान इस समय विशेष महत्वपूर्ण माना गया है। जो लोग पूरे महीने दान न कर पाएं वे कम से कम पूर्णिमा एवं अमावस्या के दिन ही दान करके अपना लोक-परलोक संवार सकते हैं। माघ मास में स्नान, दान, उपवास व भगवान माधव की पूजा अत्यंत फलदायी बताई गई है। महाभारत के अनुशासन पर्व में वर्णित है
पौष पूर्णिमा पर बढ़ाएं चन्द्र बल- जिनके उपर जन्मकुण्डली में चन्द्रमा की महादशा चल रही हो अथवा जिन्हें मानसिक उलझनें अधिक रहती हों, उन्हें नौ रत्ती का मोती दाहिने हाथ की सबसे छोटी उंगली में चांदी की अंगूठी में जड़वाकर प्राण-प्रतिष्ठा करवाकर पौष पूर्णिमा के दिन अवश्य धारण करना चाहिए। विशेष लाभ के लिए हाथ की अपेक्षा गले में अर्द्धचन्द्राकार रूपी लॉकेट में मोती जड़वाकर धारण करें।