सैला त्यौहार का जगह-जगह आयोजन आदिवासी समुदायों में
_लाफन गांव में मनाया गया नए साल में सैला त्यौहार
रेवांचल टाइम्स – मण्डला। गुरुवार एक जनवरी नए साल के अवसर पर घुघरी विकासखंड के लाफन गांव में सैला त्यौहार का आयोजन बड़े धूम-धाम से किया गया। जिसमें गांव में रहने वाले सभी जाति, समुदायों और सभी उम्र के लोग सामिल हुए।काम धंधे की तलाश में दूसरे जिलों और राज्यों में गए कुछ ग्रामीण भी वापस गांव आकर उत्सव में सामिल हुए। ग्रामीण सामाजिक परंपराओं के जानकार पी.डी.खैरवार के अनुसार हमारे पुरखों ने अनादि काल से खेती-किसानी को अपने साथ-साथ सारे प्राणियों के लिए भी जीवन यापन का मुख्य साधन बनाया था। हजारों साल पहले से आज भी यह परंपरा जारी है। खेती-किसानी पर ही आधारित सैला त्यौहार किसान और आदिवासी समुदाय का एक महत्वपूर्ण उत्सव होता है। जो खरीफ फसल की कटाई और रबी फसल की बोनी से फुर्सत पाने के बाद मनाया जाता है। इसके पीछे मान्यता है,कि जब किसान मक्का,धान, कोदो, कुटकी जैसी मुख्य खरीफ की फसलों को खेतों से काटकर अपने खलिहान में ले आते हैं,इस दौरान फसल की जो बालियां टूटकर जमीन में गिरकर तितर-बितर हो जाती हैं, उन्हें एकत्र होकर सय या उत्पादन बढ़ाने का आशीष मांगा जाता है।मान्यता यह भी है,कि इस उत्सव के मनाने से किसानों के खलिहानों में फसल की मात्रा में बढ़ोतरी होती है। सैला शब्द का ही मतलब सय या बढ़ना होता है। यह पर्व अन्न माता की एकजुटता और अन्न आने की खुशी में मनाया जाता है। इस पर्व के दौरान, हमारे पुरखे सैला गीत गाकर नृत्य करते थे,जो संस्कृति आज भी प्रचलित है। जहां पुरुष सैला तो वहीं महिलाएं रीना गीत गाकर रीना नृत्य करती हैं, मांदल की थाप, टिमकी की तीव्रगामी आवाज और बांसुरी के स्वर से स्वर मिलाकर हर नृतकों के हाथों में चटकोला या डंडे होते हैं जिनको खुद बजाते भी हैं। पैरों में सभी पैजनी पहने होते हैं।जिसकी झंकार मनभावन लगती है। सैला हमारी आदिवासी संस्कृति और परंपरा का मुख्य हिस्सा भी है। यह पर्व हमें अपने पुरखों की याद दिलाता है और हमें अपनी जमीनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा भी देता है।सैला त्यौहार के दिन पूरे गांव के महिला-पुरुष और बच्चे सभी अपने-अपने काम धंधे में नहीं जाकर ग्राम के ही किसी एक स्थान चौक चौराहे पर एकत्र होकर प्रातःकाल से ही देर शाम तक बड़े हर्ष उल्लास के साथ सैला गीत और नृत्य करते हैं, पुरुष एक के कंधे के ऊपर दूसरे और दूसरे के कंधे पर तीसरे चढ़कर बेंवर नृत्य करके इस उत्सव का समापन करते हैं। फिर गुड़ या मिठाई का प्रसाद बांटा जाता है। इस उत्सव स्थल पर बड़े बूढ़ा देव का आगमन होने का भी अनुभव किया जाता है। इस त्यौहार को कम से कम दो दिन तक मनाये जाने का प्रचलन है। एक दूसरे परिवार को पहले से ही अपने सैलार के रूप में चुन लिया जाता है। दोनों परिवार एक-दूसरे के घरों में दो दिनों तक सुबह-शाम का भोजन पारी-पारी से करते हैं। भोजन में उड़द की दाल से बने बड़े, गेहूं आटे से बने गुलगुले,चावल के आटे से बने बबरा चीला आदि व्यंजन अपने सैलारों के लिए मुख्य रूप से तैयार किए जाते हैं। इस दिन ग्रामीण सबसे पहले अपने खलिहानों में अन्न माता की पूजा करते हैं। उनकी कृपा के लिए धन्यवाद देते हैं।यह उत्सव का सिलसिला माघ के महीने भर चलता रहता है। सैला और रीना गीत के साथ ही इस पर्व को धूमधाम से मनाया जाता है और अपनी एकता और सौहार्द को निखारा जाता है।