ठगी का आंतक

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रेवांचल टाईम्स डेस्क – शीतल तुम ऐसे क्यों उदास बैठी हो? एकदम गुमसुम सी हो गई हो? कोई बात है?
बताना चाहती हो तो बताओ। शायद मैं तुम्हारी मदद कर सकूँ।
नहीं दीदी कोई बात नही है !
फिर ऐसे उदास?
छोटी मोटी बात है जो परेशान कर रही है। समझ नहीं आ रहा है मैं आपको कैसे बताऊं। आप हसोगी मुझपर।
नहीं हंसूगी। बताओ, आखिर मैं तुम्हारी बड़ी बहन जैसी हूँ। हम दोनों को एक साथ इस घर में रहना है। अगर तुम मुझसे बातें छुपाती रहोगी तो हम दोनों दोस्त कैसे बन पाएँगे? और आपस में हंसी-खुशी मिलकर कैसे रह पाएँगे? मुझे आए इस घर में काफी वक्त हो चुका है और तुम अभी नई-नई आई हो तो मुझ पर भरोसा कर सकती हो। हम बहन की तरह बन कर रहें तो ज्यादा अच्छा रहेगा, क्योंकि आपस में जितना प्यार मनोहर होगा, उतना ज्यादा हमारे पास टेंशन कम होगा। और उतनी ही ज्यादा अच्छी हमारे जिंदगी होगी, क्योंकि ज्यादातर लोग आपस में लड़ झगड़ कर अपने घर को लड़ाई का अखाड़ा बना लेते हैं। मगर हम दोनों ऐसा नहीं करेंगे। हम दोनों साथ मिलकर रहेंगे तो हमारा घर स्वर्ग जैसा हो जाएगा। तुम भी फ्री होकर रह पाओगी और मैं भी निश्चित होकर रह पाऊंगी। घर की शांति हमारे हाथ में है।
जी आप बिल्कुल सही कह रहीं हैं। मैं आपसे कोई भी बात नहीं छिपाऊंगीं। आप मेरी बड़ी बहन जैसी हैं। मैं हर बात आपसे शेयर करूंगी और कोशिश करुंगी कि आपके साथ अच्छे से रहूं ताकि आप मेरा मार्गदर्शन करते रहें। कहते हैं ना -“एक से भले दो”।……बात ऐसी है दीदी कि मैं कल शाम को डॉक्टर के यहां गई थी। और लौटते वक्त में एक ही दिन में दो बार ठगी चली गई।
क्या??हा हा हा हा।
तू मोटा के चली गई यह कैसे हो गया???
मैंने कहा था ना आप हंसोगे! इसलिए मैं आपको नहीं बताना चाह रही थी।
अच्छा बताओ मैं नहीं हसूंगी। तुम ठगी चली जाओ यह विश्वास नहीं होता है। इतनी पढ़ी-लिखी समझदार होकर, एक अच्छे पोस्ट पर जॉब कर रही हो और तुम भी ठगी चल गई? यह विश्वास होता?
ऐसा है दीदी आप चाहे जितने भी पढ़े-लिखे होशियार क्यों ना हो, आज समय इतनी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है कि आप सोच नहीं सकते। आप जितना सावधानी बरत रहे होते हो, ठगने वाले उससे ज्यादा होशियार होते हैं। नए-नए तरीके, नए-नए अनुसंधान होतें हैं ठगी के। जब एक रास्ते ठगी के बंद हो जाते हैं, तो दूसरे चार रास्ते लोग निकाल लेते हैं। …. अब मैं ठगी चली गई, इसे आप मेरी कमज़ोरी कहिए या मेरा लोभ।
कई बार लोग हमें जानबूझकर ठगतें हैं और कई बार हम अनजाने भी ठगे चले जाते हैं। और कल मेरे साथ दोनों चीजें हुई। एक बार जानबूझकर ठगी गई और दूसरी बार मैं अनजाने में ठगी गई।
सिरे से बताओ आखिर हुआ क्या था??
बताती हूं दीदी। शाम में जब डॉक्टर के यहां गई तो काफी लेट हो गया। चारों तरफ अंधेरा हो चुका था। मैं एक चौराहे पर घर आने के लिए ऑटो का इंतजार कर रही थी। तभी एक लड़का आया और कहने लगा- “दीदी मेरे पास कुछ साड़ियां है ले लीजिए। बहुत अच्छी साड़ियां है। मैं बाहर से लेकर आया हूं और अभी मुझे तुरंत ट्रेन पकड़ना है। आप देख लीजिए, पूरे 2000 की साड़ियां है पर आप मुझे 1800 देकर यह तीनों साड़ी ले लीजिए। आपका बहुत-बहुत आभार होगा।
मैं समझ गई कि यह चोर है। किसी दुकान से चोरी करके लाया है और यहाँ सस्ते दामों में बेच रहा है। मैंने एक झटके में उसे मना कर दिया- “जा यहां से मुझे कोई साड़ी नहीं लेनी है। चोरी करके लाए हो और सड़क पर भेजते हो।”
…”नहीं दीदी मैं चोरी करके नहीं लाया हूं। देखो मेरी आई-डी” उसने कहा। उसने मुझे अपना आधार कार्ड निकाल कर दिखाया। फिर भी मैं उसे जाने के लिए कहती रही, पर वह सुनने के लिए तैयार नहीं था। जैसे उसने जीद ठान ली थी। मुझे घर आने में देर हो रही थी और ये पीछे पर गया और तभी हर-हर बारिश की बूंदे बरसने लगी। अंधेरा तो था ही, बारिश की वजह से लाइन कट गई, और अंधेरा चारों तरफ फैल गया।
मुझे समझ नहीं आ रहा था क्या करूँ। उसकी जीद़ के आगे जैसे मैंने घुटने टेक दिए।
मेरे मन में यह लोभ आ गया कि चलो चोरी की साड़ी है, तो कहीं ना कहीं तो काम आ ही जाएंगी, एक बार देख लेती हूँ। साड़ियों के 100 काम लगते हैं। कहीं निमंत्रण देने में, शादी में, पार्टी फंक्शन में, कहीं भी गिफ्ट में साड़ियां दी जाती हैं। यही सोचकर मैंने कहा ठीक है दे दो पर मैं तुम्हें उसके 1800 नहीं दूंगी।
उसने कहा- “कितना दीजिएगा?”
मैंने कहा – “1000 ले लो, ये साड़ियां मुझे दे दो।”
उसने कहा- “ठीक है दीदी। मुझे ट्रेन पकड़ना है जल्दी घर के लिए। मुझे आप जल्दी से रुपए दे दो।”
उसकी हड़बड़ी और मेरे टाइम की कमी, दोनों मेरे ठगे जाने का बहुत बड़ा कारण बना।
मुझे लगा कि उसके पॉलिथीन में चार साड़ियां हैं। अंधेरा और वक्त की कमी दोनों उसके साथ थी और मेरी समझ मेरे खिलाफ। उतनी ही देर में ऑटो भी मुझे मिल गई। मैंने उसे पैसे दिए और मैं साड़ियां लेकर ऑटो में बैठकर घर की ओर चल दी।
जब थोड़ा आगे बढी तो लाइट आ चुकी थी। और थोड़ा उजाला चारों ओर फैल चुका था। मैंने थैली खोल कर देखा तो तीन ही साड़ियां थी और तीनों अच्छी लग रही थी। मैंने कहा चलो कोई बात नहीं, चार की जगह तीन है मगर साड़ियां तो अच्छी है। कहीं ना कहीं काम आ ही जाएंगे। 1000 में तीन साड़ियां भी सही है।
थोड़ी दूर आगे बढी तो मेरे बगल में एक औरत बैठी हुई थी। उसने कहा- “बहन मुझे आगे उतरना है। यह ऑटो वाला मुझे खुल्ले नहीं दे रहा। आप ये पैसे ले लो और इसे दे देना। उसके बदले आप मुझे रूपया काटकर खुल्ला दे दो। मैं उतर जाती हूं और आप ऑटो वाले को हम दोनों का भाड़ा दे दीजिएगा।” उसने मेरी तरफ 50 का नोट बढ़ाया वह मुंडा चुरा था और थोड़ा फटा हुआ भी लग रहा था। मैंने उससे कहना चाहा कि, यह नोट नहीं चलेगा मगर उसने कहा कि नहीं बहन चलेगा। मैंने 50 का नोट रखकर उसे 40 रुपए दे दिए वह आगे थोड़ी दूर जाकर उतर गई और मैं अपने गंतव्य तक पहुंच कर जब ऑटो वाले को वह ₹50 देकर 20 काटने को कहा तो उसने कहा कि यह नोट नहीं चलेगा।
क्योंकि उसके भी पैसे और मेरी भी पैसे 10-10 रुपए हुए थे तो मैंने सोचा 50 देती हूं तो वह मुझे तीस रुपये लौटा देगा मगर ऑटो वाले ने तो साफ मना कर दिया।
तब मुझे समझ आया कि उसे औरत ने वह 50 का नोट पहले ऑटो वाले को दिए होंगे जब उसने नहीं लिया तब उसने बुद्धि लगाकर मुझे थमा दिया और मैं बेवकूफ बन गई।
घर आते आते मेरा मूड खराब हो चुका था।
घर आकर मैंने पहले से साड़िया निकाली तो देखा कि,सभी साड़ी अच्छी लग रही थी मैं खुश हो गई चलो कम से कम अच्छी साड़ियां मुझे मिल गई हैं। एक-एक करके मैंने साड़ी खोलने शुरू कर दी सारे बिल्कुल नए जैसी थे। अंदर में पेपर डालकर प्लास्टिक से अच्छे से पैक किया गया था जैसे बिल्कुल नई साड़ियां होती हैं एक-एक करके मैं साड़ियां खोलने शुरू कर दी ,जब मैं पहले साड़ियां खोली तो आधा साड़ी तक तो फ्रेश लग रहा था उसके बाद देखा तो एक जगह एक दो जगह लाल लाल दाग लगे हुए थे मुझे शक हुआ कि यह पुरानी साड़ियां है फिर मैं साड़ी का किनारा देखा तो फाल के धागे लगे हुए थे मेरा शक यकीन में बदल चुका था, यह साड़ी साड़ियां पुरानी थी
₹1000 मेरे पानी में चले गए और मैं एक ही दिन में दो बार ठगाने के रिकॉर्ड से नवाजी जा चुकी थी।
अब आप ही बताओ दीदी आप क्या कहोगी?
मेरी मूर्खता या मेरी लापरवाही या मेरा सॉफ्ट नेचर! मेरा लोभ मेरी ठगी का कारण बना।
कोई बात नहीं जाने दो कभी-कभी परिस्थितियों हमारे सामने ऐसी खड़ी हो जाती हैं कि चाहे हम कितना भी होशियार समझदार और पढ़े-लिखे क्यों ना हो शिकार हो जाया करते हैं! तुम्हारे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ शाम का वक्त ,बारिश और अंधेरा था साथ ही तुम्हारी तबीयत भी इन सब का कारण बन गया।
जाने दो दिमाग से निकाल दो और आगे से सतर्क रहना क्योंकि ठगी के बहुत सारे तरीके ईजाद हो चुके हैं हम जितना सोचते हैं ठगने वाले उससे कहीं ज्यादा सोचते हैं।
ऐसा लगता है जैसे आधी दुनिया मेहनत संघर्ष करके अपना जीवन चलने के लिए रात दिन एक कर रही है और दूसरी आधी दुनिया चोरी डकैती छीनतई करने में लगी है।
नए-नए तरीके सोच कर अपनाकर जीवन यापन कर रही है। बढ़ता अपराध ठगी इन सब का उदाहरण है।
जाने दो दिल पर मत लो आगे से सावधान रहना जब भी रास्ते में रहो तो हमेशा से तर्क होकर चला कर।
ठीक है दीदी आप किसी से मत कहना नहीं तो सब हम पर हंसेंगे। लेकिन इन साड़ियों क्या-क्या करूं
यह साड़ियां अपनी काम वाली को दे दो और उनसे कह देना कि गरीबों में बांट दे क्योंकि पहनी हुई साड़ियां है तो इसे पहनना कहीं से अच्छा नहीं होगा हमारी कामवाली भी इन पहनी हुई साड़ियों को नहीं पहनेगी, इसलिए उसे कह देना कि इसे किसी गरीब स्त्री को देखकर दे दे जो लाचार और मजबूर हो।

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