रेत चोर, आराम कुर्सी और हफ्ता एक्सप्रेस
अवैध रेत उत्खनन पर प्रशासन मौन, रेत माफियाओं के हौसले बुलंद

दैनिक रेवांचल टाइम्स मंडला/जिले में रेत खनन बालू माफिया किस कदर से हावी हैं इसकी बानगी आपको जिलें की लगभग सभी छोटी बड़ी नदियों के साथ ही साथ नालों में भी देखने को मिल सकती हैं।
जिले में अवैध रेत और बालू उत्खनन का कारोबार खुलेआम फल-फूल रहा है। नदियों, नालों और सरकारी भूमि से दिन-रात रेत की चोरी की जा रही है, लेकिन संबंधित विभागीय अधिकारी कार्यालयों में बैठकर केवल फाइलों की धूल झाड़ने में व्यस्त नजर आ रहे हैं।
आज जब दैनिक रेवांचल टाइम्स की हैं टीम ने इसकी पड़ताल की तो पता चला कि कान्हा नेशनल पार्क के नजदीकी गांव कामता पहुंची तो देखा और पता चला कि नर्मदा नदी की सबसे बड़ी सहायक बंजर नदी को रेत माफियों के द्वारा छल्लनी किया जा रहा हैं। रेवांचल की टीम ने इसकी पड़ताल की तो पता चला कि प्रशासन द्वारा जहां पर खनन की विभागीय अनुमति नहीं है वहां पर तो और भी जोरों से अवैध खनन का चलन हैं। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि रेत चोरों को न तो खनिज विभाग का डर है और न ही पुलिस प्रशासन का। क्या रात का अंधेरा और क्या दिन का उजाला अवैध खनन करने वालों के लिए तो बारह मासी चाँद निकला हुआ रहता हैं। दिन दहाड़े भारी मशीनों से नदियों की रेत निकाल कर नदियों की छाती को छल्लनी किया जा रहा हैं।
और भारी डांफरों के साथ ही साथ ट्रैक्टर-ट्रॉलियों से रेत की निकासी की जा रही है। इससे न केवल पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंच रहा है, बल्कि नदियों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ गया है।
सबसे गंभीर आरोप खनिज विभाग और पुलिस प्रशासन पर लग रहे हैं। बताया जा रहा है कि अवैध उत्खनन करने वालों से ‘हफ्ता’ और “महीने” वाला नज़राना तय है, जिसके बदले संबंधित विभाग और पुलिस विभाग कार्रवाई से आंखें मूंदे रहती है। यही वजह है कि रेत माफियाओं के हौसले दिन-प्रतिदिन बुलंद होते जा रहे हैं।
जब इस संबंध में संबंधित विभागीय अधिकारियों से संपर्क करने का प्रयास किया गया, तो किसी ने फोन नहीं उठाया, तो किसी ने “दिखवा लेते हैं” कहकर पल्ला झाड़ लिया। सवाल यह है कि क्या अवैध रेत उत्खनन यूं ही चलता रहेगा या फिर जिम्मेदार अधिकारियों पर भी कभी कार्रवाई होगी?
*रेत चोर, आराम कुर्सी और हफ्ता एक्सप्रेस*
जिले में रेत नहीं, सिस्टम की खुदाई हो रही है। रेत चोर नदी से रेत निकाल रहे हैं और अधिकारी कुर्सी से पसीना—वो भी बिना मेहनत के।
खनन विभाग के दफ्तरों में ऐसी शांति है मानो वहां “ध्यान केंद्र” चल रहा हो। बाहर जेसीबी नदियों का पेट चीर रही है और अंदर अधिकारी फाइलों पर आंखें मूंदकर ‘मौन व्रत’ धारण किए बैठे हैं।
उधर पुलिस का हाल और भी दिलचस्प है। कानून की रखवाली करने वाली गाड़ी रेत से भरी ट्रॉलियों को देखकर अचानक दाईं-बाईं देखने लगती है। कहते हैं न—“जब जेब भारी हो, तो कानून हल्का लगने लगता है।”
रेत चोर अब डरते नहीं, बल्कि मुस्कुराते हैं। उन्हें पता है कि नदी चाहे सूख जाए, लेकिन हफ्ता समय पर पहुंच जाए तो कोई उनका बाल भी बांका नहीं कर सकता।
आखिर में सवाल वही पुराना है—
क्या रेत अवैध है या चुप्पी वैध?
क्या चोरी अपराध है या सुविधा शुल्क के बाद ‘सेवा’?