काग़ज़ों में चमकती सरकारी शिक्षा नीति, ज़मीन पर दम तोड़ती आदिवासी पीढ़ी!
जल्लाद शिक्षकों के भरोसे आदिवासी बच्चों का भविष्य—कलेक्टर, सहायक आयुक्त से लेकर BEO तक मौन क्यों?

दैनिक रेवांचल टाइम्स – मंडला।आदिवासी अंचलों के बच्चों को “मुख्यधारा से जोड़ने” के दावे करने वाली सरकार की शिक्षा नीति मंडला जैसे आदिवासी बहुल जिले में पूरी तरह खोखली और बेनकाब हो चुकी है। हालात इतने बदतर हैं कि स्कूल अब शिक्षा के मंदिर नहीं, बल्कि डर, लापरवाही और उत्पीड़न के केंद्र बनते जा रहे हैं—और जिम्मेदार अधिकारी आंख मूंदे बैठे हैं।
वही सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार घुघरी विकासखंड के नेझर संकुल अंतर्गत खालेटोला उन्नत प्राथमिक शाला से सामने आया मामला केवल एक स्कूल की कहानी नहीं, बल्कि पूरे जिले की शिक्षा व्यवस्था की सड़ांध को उजागर करता है। यहाँ पदस्थ शिक्षक या तो कई-कई दिनों तक स्कूल नहीं आते, या फिर स्कूल खुलते ही घर जाकर सो जाते हैं, और मासूम बच्चे पढ़ाई के बजाय खेलने या डर में जीने को मजबूर हैं।
वही सबसे गंभीर और शर्मनाक पहलू यह है कि बच्चों ने कैमरे के सामने शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना की बात स्वीकार की—
50-50 उठक-बैठक, डराना-धमकाना, सज़ा का खौफ—
शिक्षक बच्चों के साथ जिस तरह ली सजा दे रहे है और यह सब आदिवासी बच्चों के साथ, जिनके नाम पर सरकार करोड़ों की योजनाएँ चलाने का दावा करती है।
अब सवाल सीधे जिले के कलेक्टर से है—
क्या आपको आदिवासी अंचलों के स्कूलों की जमीनी हकीकत की जानकारी नहीं है?
या जानकारी होते हुए भी केवल फाइलों और बैठकों तक सीमित रहना ही प्रशासनिक संवेदनशीलता है?
सहायक आयुक्त (आदिवासी विकास) से सवाल—
जिन बच्चों के अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी आपके विभाग की है,
उन पर हो रहे अत्याचार की निगरानी कौन करेगा?
क्या आदिवासी बच्चों की तकलीफें सिर्फ़ रिपोर्ट तक सीमित हैं?
और सबसे अहम सवाल खंड शिक्षा अधिकारी घुघरी (BEO) से—
आपके क्षेत्र के स्कूलों में शिक्षक नियमित हैं या नहीं,
इसकी निगरानी की जिम्मेदारी किसकी है?
क्या निरीक्षण केवल रजिस्टर और फोटो खिंचवाने तक सीमित रह गया है?
जमीनी सच्चाई यह है कि आदिवासी इलाकों में संचालित स्कूलों में
शिक्षक नियमित नहीं
शिक्षा की गुणवत्ता शून्य
बच्चों में डर का माहौल
और अधिकारियों की जवाबदेही गायब
सरकार की नई शिक्षा नीति, डिजिटल एजुकेशन, स्मार्ट क्लास और गुणवत्ता सुधार के दावे इन मासूम बच्चों की सिसकियों के सामने बेमानी साबित हो रहे हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि ऐसे मामलों के सामने आने के बाद भी
प्रशासनिक स्तर पर तत्काल और कठोर कार्रवाई के बजाय
“जांच करेंगे” और “देखा जाएगा” जैसे घिसे-पिटे बयान दिए जाते हैं।
यही ढिलाई आगे चलकर बड़े हादसों की नींव बनती है।
यह मामला एक खुली चेतावनी है—
यदि समय रहते कलेक्टर, सहायक आयुक्त और शिक्षा विभाग ने
आदिवासी अंचलों के स्कूलों में व्याप्त अराजकता पर लगाम नहीं लगाई,
तो आने वाली पीढ़ी न शिक्षा पाएगी, न सुरक्षा।
अब सवाल यह नहीं है कि क्या कार्रवाई होगी,
सवाल यह है कि—
कब तक आदिवासी बच्चों का भविष्य यूँ ही प्रयोगशाला बना रहेगा?
और क्या जवाबदेही सिर्फ़ काग़ज़ों तक ही सीमित रहेगी?