सरपंच–सचिव–उपयंत्री की तिकड़ी ने सामुदायिक भवन को बनाया भ्रष्टाचार का अड्डा
घटिया सामग्री, बिना जांच मटेरियल और खुलेआम कमीशनखोरी ने खोली सिस्टम की पोल

रेवांचल टाइम्स | मंडलाआदिवासी बाहुल्य मंडला जिले में पंचायत स्तर पर हो रहे निर्माण कार्य अब अपनी बदहाली की कहानी खुद बयां कर रहे हैं। गुणवत्ताविहीन निर्माण, घटिया सामग्री और खुलेआम कमीशनखोरी अब अपवाद नहीं बल्कि व्यवस्था का हिस्सा बनती जा रही है। कागजों में पंचायत द्वारा कराए जा रहे निर्माण, हकीकत में निजी ठेकेदारों और कथित “सप्लायरों” की जेब भरने का जरिया बन चुके हैं।
ताजा मामला तहसील मुख्यालय घुघरी की ग्राम पंचायत ढेंको का है, जहां लगभग 30 लाख रुपये की लागत से बन रहे सामुदायिक भवन में भ्रष्टाचार की नींव खुद जिम्मेदारों ने रख दी है। निर्माण कार्य में उपयोग हो रही मिट्टी मिश्रित घटिया रेत, बिना जांच के सामग्री और तकनीकी मापदंडों की अनदेखी सीधे-सीधे सरपंच, सचिव और उपयंत्री की मिलीभगत की ओर इशारा कर रही है।
ठेकेदारी की आड़ में सप्लायर बना ठेकेदार
रेवांचल टाइम्स की टीम ने जब मौके पर जाकर ग्रामीणों से बात की, तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। नाम न छापने की शर्त पर ग्रामीणों ने बताया कि निर्माण कार्य ठेकेदारी में चल रहा है, लेकिन मटेरियल सप्लायर जयसिंह कुशराम ही ठेकेदार की भूमिका में नजर आ रहे हैं।
इतना ही नहीं, मिट्टी युक्त रेत खुद उपसरपंच द्वारा डलवाई जा रही है, जिससे निर्माण की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
उपयंत्री की ‘क्लीन चिट’ से और गहराया शक
वही ग्रामीणों का आरोप है कि उपयंत्री अजय बघेले ने बिना किसी जांच-पड़ताल के सामग्री को सही बताकर न केवल मौके पर आंख मूंद ली, बल्कि अपने वरिष्ठ अधिकारियों को भी गलत और भ्रामक रिपोर्ट सौंप दी। इससे यह स्पष्ट होता है कि तकनीकी प्राक्कलन और गुणवत्ता मानकों को ताक पर रखकर पूरे निर्माण कार्य का बंदरबांट किया जा रहा है।
जिम्मेदारों के बयान
इस पूरे मामले पर जब उपयंत्री से सवाल किया गया तो उन्होंने सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा—
“मेरे द्वारा पूरी सामग्री का निरीक्षण किया गया है। सारी सामग्री सही है और काम भी अच्छा चल रहा है। कहीं कोई गड़बड़ी नहीं है, मैंने पूरी जांच कर ली है।”
— अजय बघेले, उपयंत्री, जनपद पंचायत घुघरी
वहीं इस गंभीर मामले पर पक्ष जानने के लिए जब एसडीओ मैडम से संपर्क किया गया, तो उनका फोन रिसीव नहीं हुआ, जिसके चलते उनका पक्ष सामने नहीं आ सका।
अब सवाल ये है…
क्या 30 लाख की राशि से बन रहा सामुदायिक भवन कागजों में मजबूत और हकीकत में खोखला होगा?
क्या जिला प्रशासन और जनपद के वरिष्ठ अधिकारी इस “कमीशन मॉडल” से अनजान हैं?
या फिर आदिवासी क्षेत्रों के विकास के नाम पर भ्रष्टाचार को मौन सहमति मिल चुकी है?
रेवांचल टाइम्स इस मामले की परतें खोलता रहेगा।