खबर का असर: “रेवांचल टाइम्स” की दस्तक से खुली प्रशासन की बंद आंखें
दैनिक रेवांचल टाइम्स – मंडलाआखिरकार वही हुआ, जिसकी उम्मीद थी—और जिसकी जरूरत भी थी। “दैनिक रेवांचल टाइम्स” की खबर ने वो असर दिखाया, जिसने नगर पालिका और बिजली विभाग की सुस्त व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया।
नेहरू स्मारक से बिंझिया तिराहा तक बन रही बीटी सड़क, जो शुरुआत से ही लापरवाही और मिलीभगत की मिसाल बनी हुई थी, अब प्रशासन की हड़बड़ाहट में किए जा रहे सुधारों की गवाह बन रही है। सवाल ये है कि जब सब कुछ पहले से तय था—राशि जमा थी, योजना स्वीकृत थी—तो फिर काम समय पर क्यों नहीं हुआ?
“पहले सड़क, बाद में सुधार”—किसका मॉडल?
बिना बिजली पोल हटाए, बिना पेड़ों की कटाई और बिना उचित अर्थवर्क के सड़क बना दी गई। यानी पहले निर्माण, बाद में सोच—क्या यही विकास का नया फार्मूला है?
यह लापरवाही नहीं, बल्कि सीधे-सीधे जन सुरक्षा से खिलवाड़ है।
जिम्मेदार कौन?
नगर पालिका ने राशि जमा कर जिम्मेदारी पूरी कर दी बिजली विभाग ने महीनों तक फाइल दबाकर रखी ठेकेदार ने बिना मानकों के सड़क बनाकर “काम पूरा” दिखा दिया
तीनों की इस तिकड़ी ने मिलकर शहर को एक संभावित हादसे के मुहाने पर खड़ा कर दिया था।
मीडिया की ताकत या प्रशासन की मजबूरी?
जैसे ही रेवांचल टाइम्स ने इस पूरे मामले को प्रमुखता से उठाया, अचानक:
सड़क किनारे लगे पेड़ काटे जाने लगे
बिजली पोल शिफ्टिंग की प्रक्रिया शुरू हुई
जिम्मेदारों की नींद खुली
अब सवाल उठता है—क्या बिना मीडिया के दबाव के प्रशासन कभी जागता?
जनता पूछ रही है…
अगर खबर नहीं छपती, तो क्या यही खतरनाक सड़क लोगों के लिए छोड़ दी जाती? करोड़ों के विकास कार्यों में क्या इसी तरह “पहले बनाओ, फिर सुधारो” का खेल चलता रहेगा? आखिर कब तक ठेकेदार और विभागीय मिलीभगत जनता की जान से खिलवाड़ करती रहेगी?
वही यह मामला सिर्फ एक सड़क का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की नाकामी और जवाबदेही की कमी का आईना है।
दैनिक रेवांचल टाइम्स ने एक बार फिर साबित कर दिया कि अगर पत्रकारिता ईमानदारी से हो, तो सत्ता के बंद दरवाजे भी खुलते हैं।
वही अब देखना ये है कि जिम्मेदारों पर कोई कार्रवाई होती है या फिर यह भी “सुधार” सिर्फ दिखावे तक सीमित रह जाएगा।
रेवांचल टाइम्स—आपकी आवाज, आपके हक की लड़ाई