कछवाहा समाज मंडला ने भगवान लवकुश मंदिर में पूजन अर्चन जन्मोत्सव मनाया

रेवाँचल टाईम्स – मंडला, जिले के श्रीराम मंदिर पड़ाव कछवाहा मंगलभवन परिसर में विगत वर्ष निर्मित भगवान लवकुश मंदिर में भगवान लवकुश का जन्मोत्सव श्रावण की पूर्णिमा दिनांक 9 अगस्त, शनिवार शाम 7:30 बजे कछवाहा समाज मंडला के बंधुओं ने एकजुट होकर पूजन अर्चन की।
श्रीराम मंदिर ट्रस्ट अध्यक्ष रंजीत कछवाहा ने बताया-विगत वर्ष निर्मित लवकुश भवन में ही उपरोक्त आयोजन सम्पन्न हुआ ।
कछवाहा समाज अध्यक्ष शशिशंकर कछवाहा ने बताया- श्रवण-पूर्णिमा “कुशवाहों के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है, क्यों कि इसी दिन माता जानकी ने जुड़वां पुत्रों कुश एवं लव को जन्म दिया था। रामचरित मानस में इसका सुंदर उल्लेख है –
“सीता सुंदर दो पुत्र जाये।
कुश-लव जिनके नाम कहाये।”
“कुश” से कुशवाह वंश चला। सभी सनातन कुशवाह इन्हें ही अपना “जनक” मानते है। इस दिन सभी सनातनी कुशवाह परिवारों में घर के पूजा स्थल पर विशेष सजावट की जाती है। विधि विधान से भगवान राम, जानकी एवं कुश-लव की पूजा की जाती है एवं अपने आराध्य का स्मरण कर भजन इत्यादि के आयोजन किये जाते हैं। बड़े-बड़े आयोजन कर अपने आदि पुरूष के प्रति श्रद्धा और आस्था व्यक्त की जाती है। यह परंपरा पौराणिक काल से निरंतर चली आ रही है। जगत जननी माता जानकी कुशवाहों की प्रथम शिक्षिका है. जिसने अपने पुत्रों को पिता भगवान राम के बगैर शिक्षा, संस्कार एवं आचार-विचार से श्रेष्ठ बनाया। ऋषि वाल्मीकि ने उन्हें ज्ञान और धनुर्विद्या में प्रवीण बनाया तो वहीं माता जानकी ने दोनों भाईयों को अन्याय का विरोध संघर्ष करने का ज्ञान भी दिया। कहा गया है कि संतान की पहली गुरु “माता’ और दूसरा गुरु ‘शिक्षा-दीक्षा देने वाला होता है। इस प्रकार ”कुश एवं लव’ दोनों भाई माता जानकी और वाल्मीकि की छत्र-छाया में वन में, आश्रम में, सभी विधाओं में दक्षता प्राप्त की, जो भविष्य में उनके काम आया। “कुश और लव’ संगीत, गायन, धनुर्विद्या, युद्ध क्षेत्र की समस्त कलाओं में ओत-प्रोत प्रवीण होकर वेद शास्त्रों के कुशल ज्ञाता भी बने।
भगवान राम के ज्येष्ठ सुपुत्र “कुश’ का वंश “कुशवाह” के नाम से चला, ऐतिहासिक एवं पौराणिक तथ्यों से पता चलता है कि त्रेतायुग से चला यह वंश अपभ्रंश होकर आगे कछवाहा, कच्छपघात, काछी इत्यादि भी कहलाया। द्वापर युग में महाभारत युद्ध हुआ। यह युद्ध 18 दिनों तक चला। महाभारत काव्य मूल रूप से संस्कृत में लिखा गया था। इसका हिन्दी अनुवाद संस्करण में युद्ध क्षेत्र का वर्णन किया गया है, उसमें एक जगह उल्लेखित है –
अस्त्र शस्त्र घृत सेना आछी।
ये सब एक जाति के काछी ।।
“घृत” संस्कृत में धातु है जिसका अर्थ होता है धारण करना अर्थात् अस्त्र एवं शास्त्रों को धारण कर सेना में जो आच्छादित्त (सुसज्जित) पंक्ति है। वे सब एक ही जाति के कछवाहे हैं। कछवाहों का गौरव पूर्ण इतिहास रहा है। इनका राज्य अयोध्या के बाद रोहतास, नरवरगढ़, ग्वालियर, दौसा, आमेर, जयपुर में रहा है। इसके साथ ही वंश वृद्धि के कारण सैकड़ों जगह इनका परिवार के प्रमुख बनकर पूरे भारत में फैल गये। तदन्तर इस वंश के अनेकों ठिकाने स्थापित हुए। इस वंश में महाराजा नल, राजा मानसिंह, कर्नल भवानीसिंह सहित अनेकों ऐसे शौर्यवान वीरों ने जन्म लिया, जिनका उल्लेख इतिहास के पन्नों में दर्ज है। आज भारत में लोकतंत्र है। भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में झांसी की रानी का सारथी करणसिंह कछवाहा (करणा) का उल्लेख करना आवश्यक है। भारत के द्वितीय स्वतंत्रता संग्राम में जयपुर कछवाहा स्टेट ने लोकतंत्र की स्थापना करने में तत्कालीन गृहमंत्री वल्लभभाई पटेल के आव्हान पर अपना पूरा राज्य भारत गणराज्य में स्वेच्छा से विलीन कर दिया। कछवाहों की गौरव गाथाओं का एक समृद्ध इतिहास है। त्याग और बलिदान के तमाम किस्से है। यही कछवाहा वंश वर्तमान में कुशवाह वंश के नाम से प्रचलित है। भगवान राम के ज्येष्ठ पुत्र कुश को अपना वंशज मानते है। श्रावण पूर्णिमा को उनकी जयंति मनाते है। ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते उन्हें भगवान राम का उत्तराधिकारी होने पर उन्हें “महाराज कुश” के नाम से राजगद्दी पर बैठाया गया। यही महाराज कुश, वर्तमान में कुशवाहों के “आदिदेव” माने जाते हैं।
उपरोक्त आयोजन श्रीराम मंदिर पड़ाव के पुजारी बसंत दीपू तिवारी के द्वारा बड़े विधि विधान से संपन्न कराया गया। उपस्थित सबने माल्यार्पण, तिलक, वंदन, कर भगवान लवकुश जी की आरती की और प्रसाद ग्रहण किया ।