पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग मंडला में खुली लूट छात्रों के नाम पर घटिया कंबल-चादर की खरीदी, जमकर कमीशनखोरी
रेवांचल टाईम्स – मंडला, मध्यप्रदेश: आदिवासी बहुल इस जिले को बार-बार विकास की योजनाओं का लाभ देने की बात की जाती है, लेकिन हकीकत ये है कि यहां का प्रशासन और विभागीय तंत्र इन योजनाओं को ‘कमीशन वसूली’ का साधन बना चुका है। एक ताजा मामला पिछड़ा वर्ग तथा अल्पसंख्यक कल्याण विभाग, मंडला का सामने आया है, जिसने सरकारी भ्रष्टाचार की सड़ी हुई परतें एक बार फिर उघाड़ दी हैं।
बच्चों के हक में सेंध, अधिकारियों की जेब में माल
शासन द्वारा छात्रावासों में रहने वाले पिछड़ा वर्ग के छात्रों के लिए सर्दी के मौसम में कंबल और चादर की खरीदी के लिए राशि जारी की गई थी, लेकिन सहायक संचालक ने इन बच्चों की जरूरतों को नजरअंदाज करते हुए घटिया क्वालिटी की सामग्री खरीदकर मोटा कमीशन डकार लिया।
सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों से साफ हुआ है कि कंबल की खरीदी जबलपुर से की गई, जबकि इसे स्थानीय बाजार मंडला से ही किया जाना चाहिए था। बिल में कंबल की कीमत 775 और चादर की 200 दर्शाई गई है, लेकिन रेवांचल टाईम्स की टीम द्वारा मौके पर छात्रावास में जाकर किए गए निरीक्षण में स्पष्ट हुआ कि दी गई सामग्री की कीमत बाज़ार में महज 250 से 300 (कंबल) और 70 से 75 (चादर) के आसपास है। यानी एक अनुमान के अनुसार 150 सेटों पर लाखों रुपये की हेराफेरी की गई।
क्वालिटी की जगह ‘कमीशन’ बना प्राथमिकता
यह पहला मामला नहीं है, जब विभाग के सहायक संचालक पर सवाल खड़े हुए हों। इससे पहले भी पैरा-मेडिकल छात्रवृत्ति, पिछड़ा वर्ग लोन योजना, और अन्य विकास योजनाओं में उनके द्वारा की गई अनियमितताओं की चर्चा विभागीय गलियारों में होती रही है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि आज तक किसी उच्च अधिकारी ने संज्ञान नहीं लिया। क्या यह मौन समर्थन है?
छात्रावास अधीक्षकों का भी कहना है कि राशि सीधे छात्रावास को दी जाती, तो स्थानीय स्तर पर गुणवत्ता और पारदर्शिता के साथ खरीदी की जा सकती थी। परंतु विभाग ने सामग्री का ठेका खुद रखा ताकि कमीशन का रास्ता खुला रहे।
भ्रष्टाचार की चुप्पी से सड़ रहा सिस्टम
यह सोचने की बात है कि जिन बच्चों के भविष्य को सवारने के लिए सरकार योजनाएं बना रही है, वहां के अधिकारी उन्हीं योजनाओं को चूना लगाने का जरिया बना बैठे हैं। शासन की छवि को धूमिल करने वाले इन अधिकारियों पर अब तक कोई कार्रवाई न होना प्रशासनिक उदासीनता और संरक्षण को उजागर करता है।
जन अपेक्षा: हो तत्काल निष्पक्ष जांच और कार्रवाई
जनता की मांग स्पष्ट है — इस मामले में उच्च स्तरीय जांच हो, कंबल-चादर घोटाले की सूक्ष्मता से जांच कर दोषियों को तत्काल निलंबित किया जाए। छात्रावासों में बच्चों को मिल रही सुविधाओं की गुणवत्ता की स्वतंत्र एजेंसी से जांच करवाई जाए और विभागीय खरीद प्रणाली में पारदर्शिता लाई जाए।
वरना यही सवाल गूंजेगा — क्या मंडला में बच्चों का हक लूटना अब एक स्वीकृत परंपरा बन चुकी है?
यह खबर सिर्फ कंबल की नहीं, सिस्टम के सड़े ढांचे की है। जब तक दोषियों पर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक गरीबों की मदद के नाम पर लूट का ये खेल यूं ही चलता रहेगा।