आखिर कब थमेगा महिला उत्पीड़न का सिलसिला…? राजस्व विभाग की मिलीभगत से दबंगों ने उजाड़ी गरीब महिला की रोजी-रोटी

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रेवांचल टाईम्स – मंडला मध्य प्रदेश का मंडला जिला आज एक गहरी सच्चाई का आईना बनकर सामने खड़ा है, जहां शासन की चुप्पी, प्रशासन की निष्क्रियता और जनप्रतिनिधियों की उदासीनता ने एक बार फिर से साबित कर दिया है कि आम नागरिकों, विशेषकर गरीब और महिलाएं, इस व्यवस्था में कितनी असहाय हैं।

ताजा मामला नैनपुर तहसील के ग्राम पाठासिहोरा का है, जहां वर्षों से एक गरीब महिला अनीता यादव अपनी छोटी-सी जनरल स्टोर से अपने परिवार का पेट पाल रही थी। जमीन शासकीय थी — यह न केवल ग्रामवासियों की सहमति से सिद्ध होता है, बल्कि केंद्र सरकार द्वारा करवाए गए ड्रोन सर्वे के दस्तावेज भी यही दर्शाते हैं। इसके बावजूद राजस्व विभाग और स्थानीय पुलिस की मिलीभगत से एक दबंग कपिल कछवाहा ने इस महिला को उसके अधिकारों से जबरन बेदखल कर दिया।

सवालों के घेरे में राजस्व विभाग

राजस्व विभाग नैनपुर की भूमिका पूरे घटनाक्रम में संदेह से भरी रही। एक तरफ महिला अनीता यादव को महीनों तक बुलाकर ‘पेशियों’ के नाम पर प्रताड़ित किया गया, दूसरी ओर कपिल कछवाहा के फर्जी दावों को तथ्यों से ऊपर रखकर उसे खुली छूट दे दी गई। क्या यह विभाग अब दबंगों और पैसे वालों के इशारों पर नाच रहा है? क्या अब गरीब की आवाज़ सिर्फ सीएम हेल्पलाइन के रिकॉर्ड में ‘निराकृत’ के टैग से शांत कर दी जाती है?

पुलिस बनी मूकदर्शक

सबसे शर्मनाक भूमिका रही पिंडरई पुलिस की। जब एक साल पहले कपिल कछवाहा ने अपने गुंडों के साथ मिलकर महिला की अर्धनिर्मित दुकान तोड़ी थी, तब भी पुलिस ने उसे ‘मामूली विवाद’ मानकर पल्ला झाड़ लिया। और अब, जब बिना किसी लिखित नोटिस के महिला को मौखिक सूचना देकर जेसीबी मशीनों से उसकी दुकान जमींदोज कर दी गई, तब भी पुलिस सिर्फ दर्शक बनी रही।

क्या यह “सुशासन” है?

शासन-प्रशासन का यह हाल है कि एक महिला के सारे दस्तावेज, जनसुनवाई की अर्ज़ियां, सीएम हेल्पलाइन की शिकायतें, ग्रामवासियों के समर्थन पत्र — सबकुछ सिर्फ कागज़ के ढेर में तब्दील हो गए। कार्यवाही हो रही है, लेकिन सिर्फ पीड़िता के खिलाफ। वहीं, कपिल द्वारा लाई गई जेसीबी और उसके गुंडों की खुली दबंगई को संरक्षण मिलता है। क्या यही “सबका साथ, सबका विकास” है?

महिला आयोग और मानवाधिकार आयोग खामोश क्यों?

यह सिर्फ एक महिला की दुकान का मामला नहीं है, यह उस सिस्टम की पोल खोलने वाला उदाहरण है जिसमें पीड़ित को ही अपराधी बनाया जाता है। मानवाधिकार और महिला आयोग की चुप्पी भी उतनी ही चिंताजनक है जितनी कि प्रशासन की निष्क्रियता। क्या सिर्फ शहरों में बैठकर सेमिनार करने से महिला सशक्तिकरण होगा?

जनआक्रोश को नजरअंदाज करना भारी पड़ेगा

ग्रामवासियों में भारी आक्रोश है। ग्रामीणों का साफ आरोप है कि कपिल खुद भी शासकीय जमीन पर अतिक्रमण कर निर्माण करा रहा है। लेकिन उसका कोई सर्वे नहीं होता, कोई नोटिस नहीं दिया जाता। यह दोहरी नीति क्यों? क्या कानून अब पैसे वालों के लिए ढाल और गरीबों के लिए तलवार बन चुका है?

यह खबर सिर्फ अनीता यादव की नहीं है, यह उन हज़ारों महिलाओं की आवाज़ है जिन्हें आज भी व्यवस्था से इंसाफ नहीं मिलता। अब सवाल यह नहीं कि कब कार्रवाई होगी, सवाल यह है कि क्या कोई कार्रवाई होगी भी या नहीं…?

मंडला की सड़कों से लेकर भोपाल के गलियारों तक जब तक यह सवाल गूंजेगा नहीं, तब तक महिलाओं के खिलाफ होता यह प्रशासनिक अन्याय कभी नहीं थमेगा।

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