जबलपुर में स्वास्थ्य सेवा के नाम पर बड़ा खेल : निजी अस्पतालों में बढ़ती ‘कमीशनखोरी, सरकारी एंबुलेंस भी सेटिंग में शामिल

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जान जाए, कमीशन न जाये!

दैनिक रेवांचल टाइम्स जबलपुर
जबलपुर शहर, जहां चिकित्सा सेवाओं की समृद्ध विरासत रही है, आज वहीं के प्रमुख निजी अस्पतालों में जान जाए पर कमीशन न जाये की तर्ज पर ‘कमीशनखोरी’ का ऐसा जाल फैला है कि मरीज की जान से ज्यादा अहम हो गया है उसका रैफरल, चाहे वह रिक्शा वाला करे या फिर सरकारी एंबुलेंस वाला। ये अस्पताल अब सिर्फ इलाज नहीं कर रहे, बल्कि हर जांच, हर भर्ती, हर ऑपरेशन में कमीशन का खेल खेल रहे हैं।
सरकारी एंबुलेंस भी बनी दलाल*
जबलपुर के कई सरकारी एंबुलेंस चालकों पर आरोप है कि वे आपातकालीन मरीजों को जिला या शासकीय अस्पताल ले जाने के बजाय सीधे निजी अस्पतालों में रैफर कर रहे हैं। वजह मोटा कमीशन।

एक मामले में मेडिकल कॉलेज अस्पताल की एंबुलेंस सीधे एक प्राइवेट मल्टीस्पेशियलिटी अस्पताल में मरीज को लेकर पहुंची, जबकि सरकारी अस्पताल में सभी सुविधाएं मौजूद थीं।
जानकारी के मुताबिक प्रति मरीज 500 रुपये से लेकर 2000 रुपये तक का कमीशन एंबुलेंस ड्राइवर को मिल रहा है।
जांच, भर्ती, ऑपरेशन – हर चीज़ में तय रेट

निजी अस्पतालों ने अब अपने ‘फिक्स्ड एजेंट’ तैयार कर रखे हैं

रिक्शा व ऑटो चालकों को प्रति मरीज 200–300 रुपये
एंबुलेंस वालों को 1000–1500 रुपये तक का कमीशन
पैथोलॉजी, MRI और CT Scan जैसी जांच में डॉक्टरों को 20-30% का हिस्सा

यह पूरा तंत्र मिलकर मरीज को उस जगह ले जाता है जहां कमीशन ज्यादा मिलता है, न कि जहां इलाज बेहतर हो।

डॉक्टरों की चुप्पी और अस्पताल प्रबंधन की मिलीभगत
कई निजी डॉक्टर भी अब ‘प्रोफेशनल एजेंट’ के साथ काम कर रहे हैं। मरीज़ को जब पहली बार परामर्श के लिए लाया जाता है, तभी डॉक्टर उसे महंगे पैकेज में शामिल करने की कोशिश करते हैं और मुनाफा बढ़ाते हैं।
एक सूत्र के अनुसार निजी हॉस्पिटलो और किलीनिकों में इलाज से ज्यादा ज़रूरी है कि कौन लाया, क्योंकि उसी के आधार पर भुगतान तय होता है।

सरकारी अस्पतालों की गिरती छवि का फायदा
जब सरकार के अस्पतालों में डॉक्टर नहीं, संसाधन नहीं, दवाएं नहीं – तो मरीज मजबूरी में प्राइवेट जाता है। इस ‘मजबूरी’ को ही सेटिंग-बेस्ड नेटवर्क ने धंधा बना लिया है।
सरकारी स्तर पर कार्रवाई की बजाय, शिकायत करने वालों को ही फालतू के सवालों में उलझाया जा रहा है।
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
जबलपुर जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग इस पूरे मामले पर चुप्पी साधे बैठा है।
क्या ये चुप्पी किसी बड़े गठजोड़ की ओर इशारा कर रही है?
क्या प्रशासन को भी इस गोरखधंधे की भनक है – लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हो रही?

जनता की मांग: हो निष्पक्ष जांच, बने हेल्पलाइन
शहर के जागरूक नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है:
1. स्वास्थ्य विभाग जांच टीम गठित करे।
2. सभी सरकारी एंबुलेंस को GPS ट्रैकिंग से जोड़ा जाए।
3. निजी अस्पतालों की रेफरल हिस्ट्री की जांच हो।
4. कमीशन आधारित इलाज पर बने कठोर कानून।
समाधान-
जबलपुर में स्वास्थ्य सेवा का गिरता स्तर और बढ़ती कमीशनखोरी एक गंभीर सामाजिक संकट है। अगर समय रहते इसकी जड़ पर प्रहार नहीं किया गया, तो इलाज के नाम पर व्यापार और लूट का यह मॉडल पूरे प्रदेश में फैल सकता है। मरीज की जान की कीमत न तय हो कमीशन की दरों पर – यह सुनिश्चित करना अब प्रशासन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी हैl

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