आचार्य पद के नहीं, अविनाशी पद के अभिलाषी गुरुशिष्य की बेजोड़ जोड़ी

51 वर्षों तक आचार्य पद को सुशोभित करने वाले सर्वमान्य संत श्रीमद् आचार्य देव श्री १०८ विद्यासागर जी महामुनिराज

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विश्वहित चिंतक, प्रतिभा स्थली के प्राण गुरु, पूर्णायु के महावैद्य, जीवदया के मसीहा, हथकरघा के प्रेरणा स्रोत, पाषाण जिनालय की अलख जगाने वाले, ब्रह्माण्ड के देवता श्रीमद् आचार्य देव श्री १०८ विद्यासागरजी महामुनिराज किसी परिचय के मोहताज नहीं है। आपकी आगम के अनुरूप निर्दोष चर्या की चर्चा तो तीनों लोक में होती आ रही है। आपका अपने गुरु के प्रति समर्पण अद्भुत था। आज वही 22 नवंबर है और आज 53 वर्षों बाद भी उस गुरु शिष्य के अतुलनीय वात्सल्य के अनुपम दृश्य की कल्पना कर आंखे नम हो जाती है और शरीर में रोंगटे खड़े हो जाते है। गुरुवर आचार्य श्रीज्ञानसागरजी महाराज ने अपना उत्तराधिकारी मुनि श्रीविद्यासागरजी को बनाने का मानस तैयार कर लिया था किन्तु निरीह वृत्ति के धारी मुनिवर को आचार्य पद स्वीकार नहीं था.. गुरुवर की पद त्याग के साथ श्रेष्ठ समाधि हो एवं समाज सेवी जनों के विनम्र आग्रह ने मुनिवर श्रीविद्यासागरजी को विवश कर दिया और उन्होंने गुरु दक्षिणा देने के लिए मौन स्वीकृति प्रदान कर दी। वह दिन मगसिर कृष्ण दोज, वीर निर्वाण संवत् 2499, विक्रम संवत् 2029, दिनांक 22 नवम्बर, 1972, स्थान-श्री दिगम्बर जैन नसियाजी मंदिर, नसीराबाद, जिला-अजमेर, राजस्थान, समय- प्रातःकाल लगभग 9 बजे का जब आचार्य श्री ज्ञानसागरजी अपने आचार्य आसन से उठे और मुनि आसन पर विराजमान मुनि श्री विद्यासागरजी को उठाकर अपने आचार्य आसन पर बिठाया। वे स्वयं मुनि आसन पर विराजमान हो गए। तत्पश्चात् उन्होंने आगमानुसार भक्तिपाठ आदि करते हुए, मुनि श्री विद्यासागरजी के ऊपर आचार्य पद के संस्कार किए। संस्कार करने के बाद आचार्य श्री ज्ञानसागरजी ने अपनी आचार्य पिच्छी मुनि श्री विद्यासागरजी को प्रदान की। स्वयं अपने मुनि आसन से नीचे उतरे और

नवोदित आचार्य श्री विद्यासागरजी को त्रयभक्ति पूर्वक नमोऽस्तु किया। आचार्य श्री विद्यासागरजी ने अत्यन्त विनम्र भाव से नम्रीभूत होकर मुनि श्री ज्ञानसागरजी को प्रति नमोऽस्तु निवेदित की। उसी समय मुनि श्री ज्ञानसागरजी ने नवोदित आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज की तीन प्रदक्षिणा लगाईं और आचार्य श्री विद्यासागरजी को नमन करते हुए बोले- “हे आचार्यश्री! मैं आपके आचार्यत्व में सल्लेखना लेना चाहता हूँ। मुझे समाधिमरण की अनुमति प्रदान कीजिए। मैं आपको निर्यापकाचार्य के रूप में स्वीकार करता हूँ। आप मुझे अपना क्षपक बना लीजिए।”

इतनी लघुता वर्तमान में प्रथम बार ऐसा अनुपम, अतुलनीय, अद्भुत, अप्रतिम दृश्य देखने में आया जब एक गुरु स्वयं अपने शिष्य के चरणों में आकर नमस्कार कर अपनी समाधि के लिए निवेदन कर रहा है।

स्वयं शिष्य के चरणों में आ, बैठ अहं को गला दिया..। खूब जले विद्या का दीपक, दुआ ज्ञान की आठों याम..!! -मुनिश्रीप्रणम्यसागरजी

गुरुआज्ञा को शिरोधार्य कर पद की नहीं अविनाशी पद की चाह लिए मन में, आपने संघ को गुरुकुल बनाया और प्राणिमात्र के प्रति कल्याण की भावना से जन-जन का कल्याण किया। इस बात को कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आप आचार्य पद पर सुशोभित नहीं थे आपसे 51 वर्षों तक आचार्य पद सुशोभित होता रहा। आज का यह आचार्य पदारोहण दिवस एवं हमारे सर्व श्रेष्ठ आचार्य सदा सदा इस पृथ्वी मंडल पर जयवंत रहें, जयवंत रहें, जयवंत रहें।

ब्र. साक्षी जैन

लघु तीर्थ क्षेत्र व्रती नगरी पिंडरई

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