पंचायतें खोखले दावों की शिकार….आत्मनिर्भरता कागज़ों में, सच में बदहाली!

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70 साल बाद भी ‘विकास’ लापता — करोड़ों का बजट, फिर भी गांव तरस रहे मूल सुविधाओं को

रेवाँचल टाईम्स – मंडला, मध्यप्रदेश सरकार गांवों को आत्मनिर्भर बनाने की बड़ी-बड़ी घोषणाएं करती है, लेकिन हकीकत में मंडला जिले की पंचायतों की स्थिति देखकर साफ होता है कि ये दावे सिर्फ भाषणों और फाइलों में चमकते हैं। जिस आत्मनिर्भरता का नारा नेताओं की जुबान पर चढ़ा रहता है, वह मंडला की ज़मीन पर कहीं दिखाई नहीं देती।

महाराष्ट्र की पंचायतें करोड़ों कमा रहीं, मप्र की पंचायतें अनुदान के बिना एक कदम नहीं चल सकतीं
पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र की पंचायतें सालाना 10 से 12 करोड़ तक का राजस्व कमा रही हैं। पुणे की माण, हिंजवाड़ी और अहमदनगर की हिवरे बाजार पंचायतें देश का मॉडल हैं, जहां पंचायत खुद की कमाई से विकास कर रही है। वहीं मंडला की पंचायतें आज भी अनुदान, योजनाओं और जुगाड़ के भरोसे मौत-सा जीवन जी रही हैं।

मंडला की लगभग 430 पंचायतों में से एक भी आत्मनिर्भर नहीं—खाली वादे, अधूरी योजनाएं, टूटा सिस्टम
पंचायत राज का वास्तविक अर्थ मंडला में गायब है। करोड़ों का बजट हर साल आता है—
सड़कें,नालियां, आंगनबाड़ी, पेयजल, सामुदायिक भवन लेकिन नतीजा?
गांवों की हालत जस की तस। न सड़कें सुधरीं, न पानी की समस्या खत्म हुई। कई पंचायतों में शौचालयों का 75 फीसदी हिस्सा धराशायी हो चुका है—घोषित ‘ओडीएफ’ गांव सिर्फ कागज़ों में बचे हैं।

मंडला जिला : विकास के नाम पर करोड़ों बहाए गए, पर गांव आज भी बदहाल
वही ग्रामीण विकास विभाग और पंचायत विभाग को 2025–26 में कुल 32,329 करोड़ मिले हैं। लेकिन क्या इस राशि का प्रभाव मंडला में दिखाई दे रहा है?
जवाब है — नहीं!

बिलकिसगंज और मुरवारा जैसे मॉडल गांव भी पूरे प्रदेश की तुलना में नाममात्र उजले हैं — और मंडला इनमें कहीं भी खड़ा नहीं।

सांसदों और जनप्रतिनिधियों के गोद लिए ‘आदर्श गांव’ भी आदर्श बन नहीं पाए
आदर्श ग्राम योजना के तहत जनप्रतिनिधियों ने कई पंचायतें गोद ली थीं। वादा था — शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, स्वच्छता और बुनियादी ढांचे में बड़ा बदलाव।
लेकिन हुआ क्या?
दो-चार नालियांकुछ फुटपाथ,अधूरे शौचालय और कागज़ की रिपोर्ट
यही बन गया पूरा ‘विकास’।
वही आज जिले se लेकर ग्रामीण क्षेत्र स्थिति यह है कि कई आदर्श ग्रामों में मूल सुविधाएं तक नहीं बची हैं।
मंडला की पंचायतें कहाँ फेल हो रही हैं?
राजस्व सृजन की क्षमता शून्य
सरपंच–सचिव रोजगार सहायक उपयत्री की मनमानी और इनके फर्जीबाड़ा से जनता त्रस्त हो चुकी है और जिम्मेदार जान कर भी अनजान बैठे हुए है
सामाजिक अंकेक्षण केवल औपचारिकता
स्थानीय नेताओं की कोई जवाबदेही नहीं
स्वच्छता और पेयजल व्यवस्था ध्वस्त
भ्रष्टाचार पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं
जिन अधिकारियों ने करोड़ों की राशि का हिसाब देना था, वे आज भी कुर्सियों पर आराम से बैठे हैं। जिनसे वसूली होनी चाहिए थी, उनसे पूछताछ तक नहीं की गई।

विशेषज्ञों का सख्त मत — यदि मंडला की पंचायतें नहीं बदलीं, तो आने वाले वर्षों में विकास पूरी तरह ठप हो जाएगा
इसके लिए ज़रूरी है :

हर पंचायत का 10 वर्षीय मास्टर प्लान
सरपंच–सचिव की जवाबदेही तय हो
पंचायतों को दी जाने वाली राशि का जमीनी ऑडिट
भ्रष्टाचार में लिप्त कर्मचारियों से तुरंत वसूली
युवाओं की सीधी भागीदारी
आत्मनिर्भर पंचायतों को विशेष प्रोत्साहन बजट

निष्कर्ष — मंडला की पंचायतें जागेंगी नहीं तो पूरा जिला पिछड़ता जाएगा
आज मंडला को दिखावा नहीं, वास्तविक बदलाव चाहिए।
चाहिए ऐसे प्रयास जो गांवों को सिर्फ कागज़ों में नहीं, जमीनी स्तर पर आत्मनिर्भर बनाएं।
फिलहाल स्थिति इतनी खराब है कि सवाल उठना स्वाभाविक है
क्या मंडला की पंचायतें कभी आत्मनिर्भर बन पाएंगी, या वे हमेशा की तरह अनुदानों और फर्जीवाड़ा भ्रष्टाचार ग़बन के सहारे चलती रहेंगी? और ये सब मूक वधिर की तरह अपने अपने कार्यालय में बैठे जिम्मेदार उनके कारनामो में जांच के नाम पर अपनी रोटी सेकते रहेंगे और जनता दर दर भटकती रहेगी क्योकि इस जिले के मूलनिवासियो और प्रशासन में बैठे अधिकारियो विधायक मंत्रियो को ईमानदार अधिकारी रास नहीं आते है!

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