एक रोटी भले कम खाएं, लेकिन बच्चों को शिक्षित बनाएं “” -कुर्मी समाज की कथा वाचिका देविका पटेल।
*रेवाँचल टाईम्स – मंडला के ग्राम करिया गांव में कुर्मी समाज की देविका पटेल जी की मधुर वाणी से श्रीमद् भागवत कथा का वाचन किया जा रहा है। कथा के तीसरे दिन उपस्थित जनमानस को देविका पटेल ने बताया कि आज हमें बच्चों को शिक्षित करना अत्यंत जरूरी है। लेकिन बच्चों को शिक्षित करने के साथ-साथ उनमें संस्कारों की भावना भी जगाना उतना ही महत्वपूर्ण है ,क्योंकि बगैर संस्कार के शिक्षा का कोई महत्व नहीं रह जाता । कथा के दौरान देविका पटेल ने समस्त श्रद्धालुओं ,धर्म प्रेमी बंधुओ से आग्रह किया कि आप भले जीवन में एक रोटी कम खाएं अर्थात अपनी भौतिक आवश्यकताओं को भले आप कम कर दें, लेकिन बच्चों को जितना ज्यादा से ज्यादा शिक्षित बना सके बनाएं । उससे न सिर्फ आपके परिवार में सम्पन्नता आएगी बल्कि समाज और राष्ट्र भी विकास के मार्ग पर प्रशस्त होंगे। देविका ने कहा कि लोगों में भ्रांति है कि सिर्फ हमें अपने बेटों को ही शिक्षित करना चाहिए । बेटियों का क्या ? बेटियों को तो एक दिन शादी होकर दूसरे के घर जाना ही हैं । लेकिन आपने कहा कि बेटियों को भी वर्तमान समय में हमें हर पहलू से सशक्त बनाना होगा। तभी समाज का संतुलन बना रह सकता है । अपनी कथा के दौरान देविका पटेल ने बताने का प्रयास किया कि पहले हमारे समाज को शिक्षा का अधिकार प्राप्त नहीं था । लेकिन सावित्रीबाई फुले ,ज्योतिबा फुले जैसी मातृ शक्तियों ने महिलाओं सहित पिछड़े वर्गों को शिक्षा के अधिकारों से जोड़ने का जो एक अथक प्रयास किया । उसके परिणाम स्वरूप ही हम आज सशक्त समाज का हिस्सा बन पाए हैं । डॉ भीमराव अंबेडकर की जीवन शैली पर भी आपने प्रभाव डालते हुए बताया कि बाबा साहब की ही देन है कि हमें संविधान में शिक्षा और समानता का अधिकार मिला । बाबा साहब ने संविधान में लिखा है कि ” शिक्षित बनो – संगठित रहो और संघर्ष करो ” । देविका पटेल ने उपस्थित जनों को बताने का प्रयास किया कि शिक्षा से ही समाज और राष्ट्र का उत्थान हो सकता है । यदि हमें आज शिक्षा और समानता का अधिकार मिला है तो कहीं न कहीं हमारे समाज के ज्योतिबा फुले , सावित्री फुले और बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की महान अनुकंपा रही है। इसलिए आपने समस्त अभिभावकों , पालकों, धर्म प्रेमी बंधुओ, मात्रृ शक्तियों से आग्रह किया कि आपका प्रयास होना चाहिए कि आपके बच्चे इन महापुरुषों के बारे में अधिक से अधिक अध्ययन करके इनके बारे में जानकारी हासिल करें। देविका पटेल ने बलि प्रथा को भी समाज के लिए एक अभिशाप मानते हुए इसे समाप्त करने का पर बल दिया । आपने बताया कि पहले हमारे समाज में बलि प्रथा को मान्यता थी या फिर अभी भी कहीं-कहीं हमें आंशिक रूप में बलि प्रथा का नाम सुनाई देता है। देविका पटेल ने बताया कि इस जगत में जो भी जीव जंतु , प्राणी है वह सब परमपिता परमेश्वर के द्वारा बनाई गई सुंदर कलाकृतियों के ही रूप है ,तो फिर ईश्वर अपनी ही कलाकृतियों को समाप्त होते हुए देखकर हमसे कैसे प्रसन्न हो सकता है ? या फिर हमें कैसे वरदान या आशीर्वाद दे सकता है ? इसलिए सभी से अपेक्षा है कि किसी भी जीव की बलि देने के पहले ईश्वर की सुंदर कलाकृति को ध्यान में रखें और बलि की जगह अपने कुविचारों की बलि दें । जिससे समाज में नवीन चेतना का संचार होगा । देविका पटेल ने बताया कि संसार में जो भी सुख है वह क्षणिक मात्र लेकिन यदि हम राम नाम संकीर्तन करते हैं तो हमें जीवन का सच्चा सुख प्राप्त होता है। देविका जी ने बिहार में जो गया जी है उस गया जी के महत्व को बताते हुए आपने कहा कि गया जी को यह वरदान प्राप्त है कि जो व्यक्ति सामर्थवान नहीं है अर्थात वे मनुष्य जो अपने माता-पिता ,अपने पितरों की मृत्यु पश्चात श्राद्ध आदि का अनुष्ठान नहीं कर पातें वे सिर्फ गया जी के नाम से या गया जी की पवित्र भूमि का इतना आवाहन ईश्वर से करते हैं कि आप उनके पितरों को मोक्ष प्रदान करें, तो गया जी का नाम लेने मात्र से ही उनके पितरों को मोक्ष की प्राप्त हो जाती है। देविका पटेल ने वर्तमान समय में आधुनिक जमाने के माता-पिता से भी आग्रह किया कि जिस तरीके से आधुनिकीकरण के जमाने में हम अपने बच्चों का नामकरण ना जाने किस-किस रूप में कर देते हैं। जिस नाम का कोई अर्थ ही नहीं होता । ऐसे नामकरण से भी हमें बचना चाहिए। हमें अपने बच्चों का नाम ईश्वर, प्रकृति आदि के नाम पर रखना चाहिए । क्योंकि इससे हमारे अंत काल में जब हम अपने परिवार को अपने करीब पाते हैं, तो अनायास ही हमारे मुख से अपने आराध्य का नाम स्वत: निकल जाता है और हमें मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है । कुल मिलाकर देखा जाए तो देविका पटेल जी अपनी कथा के दौरान समाज में व्याप्त रूढ़िवादिताओं के खिलाफ सशक्त वार करते हुए समाज में नवीन चेतना लाने का प्रयास करती हैं।*
*विगत दिवस मंडला नगर से बड़ी संख्या में कुर्मी समाज की महिलाओं ने भी कारियागांव जाकर श्रीमद् भागवत कथा का श्रवण किया साथ ही भारत के संविधान की मूल भावनाओं को समझा।*