छात्रों की मजबूरी या प्रशासन की मनमानी?
एनएच-30 पर चक्का जाम ने खोली शिक्षा विभाग की संवेदनहीनता

दैनिक रेवांचल टाइम्स – मंडला, जिले के विकास खंड नारायणगंज,में बोर्ड परीक्षा जैसे संवेदनशील समय में विद्यार्थियों को राहत देने के बजाय शासन-प्रशासन की अदूरदर्शी और तानाशाही नीतियों ने छात्रों को सड़क पर उतरने को मजबूर कर दिया। विकासखंड नारायणगंज अंतर्गत राष्ट्रीय राजमार्ग-30 पर स्थित लालीपुर तिराहा उस समय रणक्षेत्र में बदल गया, जब स्कूली छात्र-छात्राओं ने अपनी जायज मांगों के समर्थन में चक्का जाम कर दिया।
सवाल यह नहीं है कि जाम क्यों लगा, सवाल यह है कि छात्रों को जाम लगाने पर किसने मजबूर किया?
शिक्षा विभाग द्वारा बिना जमीनी हकीकत, ग्रामीण परिस्थितियों और परिवहन व्यवस्था का आकलन किए बोर्ड परीक्षा केंद्र को बम्हनी हायर सेकेंडरी स्कूल से हटाकर मंगलगंज स्कूल (लगभग 10 किमी दूर) कर दिया गया। इस फैसले ने यह साफ कर दिया कि विभागीय आदेश फाइलों में तो बनते हैं, लेकिन विद्यार्थियों की वास्तविक समस्याएं अधिकारियों की नजरों से कोसों दूर हैं।
ग्रामीण अंचल के विद्यार्थियों के लिए 10 किलोमीटर की दूरी केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि आर्थिक बोझ, असुरक्षा और मानसिक दबाव है। परीक्षा के तनाव के बीच रोजाना लंबी दूरी तय करना कई छात्रों के लिए असंभव जैसा है। क्या शासन-प्रशासन को यह भी नहीं दिखा कि परिवहन सुविधाओं की कमी, गरीबी और समय की बाधा छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है?
प्रशासनिक हठधर्मिता का खामियाजा केवल छात्र ही नहीं, बल्कि आम जनता को भी भुगतना पड़ा। एनएच-30 पर लगे घंटों लंबे जाम में बीमार मरीज, नौकरीपेशा लोग, व्यापारी और यात्री फंसे रहे। कोई समय पर अस्पताल नहीं पहुंच सका तो कोई ट्रेन छूटने की पीड़ा झेलता रहा। क्या यह सब प्रशासन की संवेदनहीनता का प्रत्यक्ष परिणाम नहीं है?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि एनएच-30 पर आए दिन जाम लगना अब सामान्य बात हो गई है, लेकिन शासन-प्रशासन हर बार आश्वासन देकर अपनी जिम्मेदारी से बच निकलता है। न स्थायी समाधान, न जवाबदेही, बस औपचारिकताएं।
सूचना मिलने के बाद प्रशासन और पुलिस मौके पर पहुंची, और कलेक्टर द्वारा समाधान का आश्वासन दिया गया, जिसके बाद जाम समाप्त हुआ। लेकिन बड़ा सवाल अब भी कायम है—क्या छात्रों की समस्याओं का समाधान वास्तव में होगा या यह भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दफन कर दिया जाएगा?
जब तक शिक्षा व्यवस्था में फैसले लेने से पहले जमीन पर हालात नहीं देखे जाएंगे, तब तक छात्र सड़कों पर उतरते रहेंगे और शासन-प्रशासन संवेदनहीनता का तमगा ढोता रहेगा।