सोसायटी प्रबंध के फ़र्जी दस्तावेज़ो में पाई नियुक्ति पर जाँच टीम कब करेगी कार्यवाही या फिर शिकायत खायेगी धूल बड़ा सवाल

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15 से 20 दिन पहले प्रमुखता से खबर प्रकाशित की गई थी इसके बावजूद भी जिम्मेदार अधिकारी कार्यवाही करने पर नाकाम साबित होते नजर आ रहे हैं कहीं गांधी जी के आगे तो नतमस्तक नहीं है

दैनिक रेवांचल टाइम्स डिंडोरी , मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य जिले डिंडोरी में तरह-तरह के भ्रष्टाचार गबन और पद का दुरुपयोग करते हुए जम के फर्जीवाड़ा किया जा रहा है और जब शासन की और जनता के बीच पारदर्शिता के लिए एक अधिनियम बनाया गया है जो वह भी अफसरशाही ने अपना गुलाम बना लिया है और उसे अपने तरीके से पेश करते हैं जहां एक और सरकारे पारदर्शिता और ईमानदारी का दावा करती है वहीं दूसरी ओर डिंडोरी जिले के सहायक आयुक्त सहकारिता विभाग डिंडोरी में सोसाइटी प्रबंधक लखन लाल बचावले की संदिग्ध नियुक्ति ने इन दावों की पोल खोल कर रख दी है आप है कि लखन लाल बचावले नामक व्यक्ति ने प्रथम नियुक्ति के समय कूटरचित दस्तावेजों का उपयोग और अन्य प्रमाण पत्र के सहारे सरकारी नौकरी हासिल की है और हैरानी की बात यहां है कि पूरा सरकारी तंत्र इस घोटाले को दबाने में जुठा नजर आ रहा है वहीं दूसरी और अपनी अफसर ने उसे बचाने हर संभव प्रयास कर रहे लगभग एक महीना बीतने को आ रहा है और विभाग को भी इस मामले में कई बार मौखिक रूप से सूचित किया जा चुका है एवं प्रमुखता से खबर भी प्रकाशित की जा चुकी है इसके बावजूद भी अधिकारी जांच के नाम पर टालमटोल करते नजर आ रहे हैं नई धाराएं नए उपाय ढूंढ रहे हैं इस गंदगी को उजागर करने की कोशिश की आरटीआई कार्यकर्ता प्रमोद पड़वार उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत कार्यालय सहायक आयुक्त सहकारिता डिंडोरी से लखन लाल बचावले के द्वारा प्रथम नियुक्ति के समय विभाग के समक्ष प्रस्तुत अपने शैक्षणिक योग्यता एवं अन्य प्रमाण पत्र की जानकारी मांगी गई थी जो कि वह शासकीय दस्तावेजों की श्रेणी में आते हैं और वह नियम पूर्वक देने योग्य है और शासन के नियम और एक्ट के अंतर्गत वहां एक लोक सेवक के दस्तावेज है और और शासकीय कार्यालय में जमा उपरांत वह शासकीय दस्तावेजों की श्रेणी में आते हैं और वहां मांगे जाने पर देने योग्य है पर जानकारी ना प्रदाय करना इससे स्पष्ट होता है की मांग की गई जानकारी जब सार्वजनिक है लोकहित एवं पारदर्शिता को ध्यान में रखते हुए प्रदाय की जा सकती है तो कहीं ना कहीं वरिष्ठ अधिकारियों के द्वारा अधिनियम को मजाक और अपना गुलाम बनाते हुएआवेदक को भ्रामक जानकारी देने या भ्रामक पत्र जानकारी करना सूचना अधिकार अधिनियम की अवहेलना के अंतर्गत आता है जो की धारा 18 में शिकायत योग्य है जिसमें उन्होंने अधिनियम के तहत दंडित करने का प्रावधान भी बनाया गया है पर एक सीधी स्पष्ट और कानूनी मांग लेकिन जो जवाब मिला वहां सरकारी व्यवस्था की नियत को उजागर करने के लिए काफी था
कानून की आड़ में सच्चाई को दबाने की कोशिश, लोक सूचना अधिकारी ने धारा 8,1 और व्यक्ति का जानकारी का हवाला देकर जवाब देने से इनकार कर दिया और यह भी कहा कि यह जानकारी हमारे पास उपलब्ध नहीं है लिखित लेटर में हैरान कर देने वाली बात तो यहां है कि आखिर विभाग से दस्तावेज जाएंगे कहां वही धारा जो जांच एजेंसियों के लिए बनाया गया है पर उस धारा को जिम्मेदार अधिकारी कर्मचारी उसे अब व्यक्तिगत जानकारी सुरक्षा के लिए और अब वहां फर्जीवाड़ा और भ्रष्टाचार छुपाने का औजार बन चुकी है जब आरटीआई कार्यकर्ता प्रमोद पड़वार सिविल लाइन निवासी डिंडोरी ने संभागीय संयुक्त आयुक्त कार्यालय जबलपुर में प्रथम अपील दाखिल की तो वहां भी फाइल ठंडी पड़ी रही लेकिन निराशा और आहत होकर प्रमोद पड़वार ने राज्य सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाया चहा जैसे ही तुरंत जानकारी मिल गई संभागीय संयुक्त आयुक्त कार्यालय जबलपुर ने स्पष्ट नाराजगी जताते हुए जिम्मेदारों को नोटिस जारी कर एक हफ्ते की भीतर दस्तावेज देने के लिए कहा गया जहां दस्तावेजों ने स्पष्ट कर दिया फर्जी कूटरचित दस्तावेज के आधार पर हुई है जो जांच का विषय है जिसमें एक पत्र भी प्राप्त हुआ है विभाग ने खुद स्पष्ट किया है कि उनकी नियुक्ति फर्जी है

अगर दस्तावेज असली है तो चुप्पी क्यों.. यह सवाल अब पूरे सिस्टम से पूछा जाना चाहिए अगर दस्तावेज सही है तो उन्हें देने में हिचक क्यों और अधिनियम की अवहेलना क्यों यदि फर्जी है तो अफसरशाही उन्हें बचाने में क्यों लगी है यहां मामला सिर्फ एक व्यक्ति की फर्जी नियुक्ति का नहीं है यहां पूरे सरकारी तंत्र के चरित्र का आईना है कार्यालय सहायक आयुक्त सहकारिता डिंडोरी उसे समय राजेश सिंह को कंप्यूटर ऑपरेटर के पद पर भर्ती किया गया था जो नियम अनुसार न होने से अवैध बताकर उसे निकाल दिया गया तो फिर सवाल यहां उठता है कि सेल्समेन लखन लाल बचावले को पद से क्यों नहीं हटाया गया और उन्हें लगातार कैसे पदोन्नति मिल रही है आखिर विभाग ने तो जांच में खुद स्पष्ट कर दिया है कि उनकी नियुक्ति फर्जी है हर कार्यालय ने एक अपना अलग नियम कानून बना रखा है और देश में अधिनियम लागू हुए लगभग 20 वर्ष बीतने के बाद भी अधिनियम की जानकारी से विभाग की जिम्मेदार अनाविज्ञ है और भिन्न-भिन्न धाराओं और का हवाला देकर बचनेऔर बचाने की कोशिश करते आ रहे हैं आज एक आवेदन महज केवल अफसर शाही के हाथों तक सीमित रह गया है कार्यकर्ता को अपनी बात कहने के लिए जबलपुर संयुक्त आयुक्त सहकारिता संभागीय आयुक्त कार्यालय जाना पड़े तो समझ लेना चाहिए कि नीचे से लेकर ऊपर तक कुछ ना कुछ सड़ रहा है

क्या अभी न्याय रुकेगा या इस बार कोई उदाहरण बनेगा….

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