जंगल का रखवाला ही बना लुटेरा! मंडला के जंगलों में वन विभाग की खुली लूट घटिया मुनारों के नाम पर बंदरबांट, जंगल के पत्थरों से बनाई जा रही फर्जी सुरक्षा

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दैनिक रेवांचल टाइम्स – मंडला।मध्यप्रदेश का मंडला जिला, जो आदिवासी बाहुल्य होने के साथ-साथ अपनी वन संपदा, जैव विविधता और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है, आज उन्हीं जंगलों में लूट का गवाह बन रहा है। हैरानी की बात यह है कि जंगलों की रक्षा की जिम्मेदारी जिनके कंधों पर है, वही वन विभाग के अधिकारी-कर्मचारी जंगलों को खोखला करने में जुटे हैं।

तस्वीर में साफ दिखाई दे रहा है कि वन ग्रामों और वन सीमा में बनाए जा रहे विभागीय मुनारे (सीमा चिन्ह) पूरी तरह घटिया, नियमविरुद्ध और दिखावटी हैं।
जहाँ नियमों के अनुसार सीमेंट, गिट्टी और मजबूत मसाले से पक्के मुनारे बनाए जाने चाहिए थे, वहाँ जंगल के अंदर बिखरे पड़े पत्थरों को बीनकर बिना नींव, बिना गुणवत्ता, ऊपर से हल्की-सी मसाले की परत चढ़ाकर
मुनारों की खानापूर्ति की जा रही है।
यह पूरा काम वन सुरक्षा समिति के अध्यक्ष, वनपाल और वन परिक्षेत्र अधिकारी के कथित मार्गदर्शन में कराया जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, एक-एक मुनारे में 8 से 10 हजार रुपये तक का फर्जी खर्च दिखाया जा रहा है, जबकि ज़मीनी हकीकत तस्वीरों में साफ उजागर है।
यह केवल भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि जंगल की हत्या है। जिस जंगल को बचाने के लिए योजनाएं बनती हैं, उसी जंगल से पत्थर उठाकर “सुरक्षा” के नाम पर सरकारी धन की लूट की जा रही है।
यहां वह कहावत पूरी तरह सच साबित होती दिख रही है—
“जंगल में मोर नाचा, पर देखा कौन?”
लेकिन इस बार मोर नहीं, वन विभाग का भ्रष्ट तंत्र नाचता नजर आ रहा है, और तस्वीरें खुद गवाही दे रही हैं।
अब सवाल सीधे-सीधे हैं—
क्या मंडला वन मंडल के जिम्मेदार अधिकारी इस घटिया निर्माण से अनजान हैं?
क्या यह सब उनकी मौन स्वीकृति से हो रहा है?
क्या दोषी वनपाल, समिति अध्यक्ष और परिक्षेत्र अधिकारी पर कार्रवाई होगी?
या फिर आदिवासी अंचल के जंगलों को यूं ही लूटा जाता रहेगा?
यदि समय रहते जांच नहीं हुई, तो यह साफ माना जाएगा कि
वन विभाग में संरक्षण नहीं, बल्कि संगठित भ्रष्टाचार चल रहा है। अब जरूरत है
स्वतंत्र जांच, तकनीकी मूल्यांकन,और जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई की,
ताकि मंडला के जंगल कागजों में नहीं, हकीकत में भी सुरक्षित रह सकें।

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