जनपद पंचायत में हुए भ्रष्टाचार की चार सप्ताह में नही हो सकी जाँच उच्च न्यायालय में लगी अवमानना उच्च न्यायालय ने लगाई फटकार
रहली जनपद पंचायत का ‘इन-हाउस वेंडर घोटाला’: अफसर, कर्मचारी, ठेकेदार …. सब एक ही घर के…
भ्रष्टाचार की कहानी अगर फ़िल्म होती तो इसका टाइटल होता, घर के लोग ही माल ले गए। जिम्मेदार कोमे
और लोकेशन? जनपद पंचायत रहली, जिला सागर।
सरकारी धन में लूट ग़बन भ्रष्टाचार को लेकर हुई शिकायत में जिम्मेदारो कार्यवाही न करते हुए केवल खाना पूर्ति की गई जिसको लेकर जाँच और कार्यावाही करने के लिए रेवांचल टाइम्स के संपादक मुकेश श्रीवास का आरोप लगाते हुए उच्चन्यायालय जबलपुर में याचिका दायर की आवेदक की याचिका में माननीय न्यायालय ने उक्त याचिका में सागर के आयुक्त को आदेश दिया कि जनपद पंचायत रहली में हुए भ्रष्टाचार की जांच कर चार सप्ताह में आवेदक को अवगत कराते हुए रिपोर्ट न्यायालय में पेश करने का आदेश पारित किया परन्तु चार सप्ताह बीतने के बाद भी जिम्मेदार अधिकारी कर्मचारी के विरुद्ध कोई कार्यवाही न होना और न ही हुई कार्यावाही से याचिकाकर्ता मुकेश श्रीवास को अवगत कराया गया और न कोई रिपोर्ट उच्च न्यायालय में पेश की गई।
उच्च न्यायालय से याचिकाकर्ता ने माँग कि यहां के सीईओ राजेश पटेरिया और लेखपाल अधिकारी प्रदीप पाठक ने ‘भ्रष्टाचार’ को महज़ पेशा नहीं, पारिवारिक परंपरा जैसा बना दिया। और भय मुक्त सरकारी धन में होली खेल कर स्वयं और अपने रिश्ते नाते दारो को वेंडर बनाकर और फर्जी बिलो के माध्यम से सरकारी धन आहरण कर भ्रष्टाचार ग़बन किया गया हैं।
स्क्रिप्ट कुछ यूँ है, मनरेगा और वित्त आयोग की योजनाओं में करोड़ों रुपये का खेल हुआ। ठेकेदार बाहर से बुलाने की जहमत ही क्यों उठानी? अपने ही दफ़्तर के दो प्यादों को ‘वेंडर’ बना दो गोविंद प्रसाद प्रजापति (असिस्टेंट ग्रेड-3) और आशुतोष नेमा (क्लर्क)। साल 2016-17 से 2025 तक दोनों के नाम पर करोड़ों रुपये के बिल पास होते रहे और पैसे बहते रहे।
वही ये सब ‘सरकारी धन की लूट एक ही छत’ के नीचे होता रहा और किसी ने आंख नहीं खोली। शिकायतें लोकायुक्त, EOW, कमिश्नर सागर, कलेक्टर सागर, हर दफ़्तर में गईं, लेकिन वहां का जवाब वही, जांच जारी है।
जांच जारी है यानी घोटाला सुरक्षित है।
जब सीईओ पटेरिया रिटायर हुए, तभी ये काला चिट्ठा खुला।
जनहित याचिका के ज़रिये मामला माननीय उच्च न्यायालय पहुंचा। अदालत ने कमिश्नर सागर को आदेश दिया – 4 हफ्ते में जांच पूरी कर रिपोर्ट दो।
लेकिन चार हफ्ते बीत गए, रिपोर्ट गायब, जांच नदारद, और आदेश को ऐसे टाल दिया जैसे यह व्हाट्सऐप फॉरवर्ड हो।
अब पत्रकार समाजसेवी मुकेश श्रीवास ने अवमानना याचिका ठोक दी।
माननीय उच्च न्यायालय ने कमिश्नर सागर को नोटिस देकर साफ़ कह दिया 4 हफ्ते में जवाब दो, वरना अगला पन्ना अदालत लिखेगी।
वही इस कानूनी लड़ाई में पैरवी कर रहे हैं अधिवक्ता गोपाल सिंह बघेल (मो. 9229653295)।
अब सवाल जनता का है ….
जब शिकायत का पता लोकायुक्त, EOW, कमिश्नर और कलेक्टर सबको था, तो कार्रवाई का पता सिर्फ़ लापता क्यों है?
क्या यह रिश्ता सिर्फ़ ‘जनपद पंचायत रहली’ का है या यह बीमारी पूरे सिस्टम में फैली हुई है?
और अगर कर्मचारी ही वेंडर हैं, अफसर ही भुगतानकर्ता तो ये सरकारी दफ़्तर हैं या ‘भ्रष्टाचार लिमिटेड कंपनी’?
क्योंकि यहां फाइलें सिर्फ़ धूल नहीं खातीं, यहां माननीय उच्च न्यायालय के आदेश भी मजाक बन जाते हैं।
और यह मजाक अब अदालत में सुनाई देगा, कसम से, बिना हंसे नहीं रह पाएंगे, लेकिन आंख में पानी हंसी से नहीं, गुस्से से आएगा।
मुकेश श्रीवास